राजनीति में छुआछूत के लिए जगह नहीं है

संविधान सभा द्वारा पेश किए गए मसौदे के साथ ही मधेश में विरोध की लहर फैल गई, जनता विचलित और अपने आपको पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रही है । स्वतःस्फूर्त रूप में इन्होंने सड़क पर उतर कर मसौदे का विरोध किया । सुझाव संकलन के नाम पर राज्य ने अपनी औपचारिकता पूरी कर ली है । इस दौरान जो दिखा उसने साफ तौर पर यह बता दिया कि मधेश ने मसौदे को नकार दिया है । मधेशवादी दलों में इस समय एकता की आवश्यकता थी, वैसे तो यह आवश्यकता पहले से ही समय की माँग थी किन्तु पहले ऐसा हो नहीं पाया । परन्तु आज मधेशवादी दल एकजुट होकर आगे आ रहे हैं किन्तु आंतरिक तौर पर कितनी ईमानदारी है इसपर मधेश की जनता शंकित है । स्वार्थ की राजनीति , जातीय राजनीति इन सब से ऊपर उठकर मधेशी दलों को मधेश की जनता अपने आगे देखना चाहती है । विगत के दिनों में जो हुआ इसका आक्रोश उनके मन में आज भी है, उसकी वजह से अपने ही नेताओं से उनका भरोसा उठ चुका है । आज मधेश को एक सशक्त नेतृत्व की अपेक्षा है, किन्तु जनता तय नहीं कर पा रही है कि किस पर यकीन करे । ऐसे ही कुछ सवालों के साथ तराई मधेश लोकतांत्रिक पार्टी के अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता माननीय महन्थ ठाुकर जी से हिमालिनी संपादक श्वेता दीप्ति के साथ हुई विशेष बातचीत का सम्पादित अंश ः
० पिछले कुछ दिनों से मधेश के सन्दर्भ में ओली जी का जो भी वक्तव्य आ रहा था, वो मधेशवादी दलों को अच्छा नहीं लग रहा था, फिर ऐसा क्या हुआ कि आप उनकी ओर आकर्षित हो रहे हैं ?
– ऐसी कोई बात नहीं है कि मैं उनकी ओर आकर्षित हो रहा हूँ । हाँ पिछले दिनों प्रधानमंत्री जी का आमंत्रण मिला । ऐसी अवस्था में ना जाने

Mahanta_Thakur

महंथ ठाकुर

का तो कोई औचित्य नहीं था । मतभेद अपनी जगह है और औपचारिकता अपनी जगह । राजनीति में ऐसा नहीं होता कि आप की किसी से राजनीतिक मसले पर विभेद है तो आप उनसे मिले हीं नहीं क्योंकि राजनीति में छुआछूत के लिए जगह नहीं होती और फिर अगर बातें नहीं हों, मुलाकात नहीं हो तो किसी भी समस्या का समाधान नहीं निकल सकता है क्योंकि बातों से ही बड़े–बड़े मसले सुलझाए गए हैं । इसलिए जब मुझे बुलाया गया तो मैं वहाँ गया । वहाँ और भी अन्य दलों के नेता उपस्थित थे, किन्तु मुझे इसकी पूर्व जानकारी नहीं थी । सब से अलग–अलग कमरों में बातें हुईं ।
० फिर मुलाकात का क्या असर रहा ?
– कुछ खास नहीं । अभी तक उनके मिजाज वही हैं । जिस सहमति की बात वो करना चाहते हैं, उसमें पूरी तरह ईमानदारी नहीं दिख रही, ऐसे में किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँचा जा सकता है । उनके सुर अब तक बदले नहीं हैं और हम अपने मुद्दों से हटकर कोई समझौता नहीं कर सकते हैं ।
० एक बात तो है कि अगर आप मधेशवादी दलों का नेतृत्व नहीं कर रहे होते तो आप आज एक राष्ट्रीय नेता के तौर पर जाने जाते और राज्य में एक सशक्त और प्रभावशाली भूमिका का निर्वाह कर रहे होते । क्या आज के परिदृश्य में आपको इस बात का मलाल है ?
– बिल्कुल नहीं । मुझे अपने निर्णय पर कोई मलाल नहीं है । मैंने जिस सोच के तहत वर्षों पहले एक राष्ट्रीय पार्टी को छोड़ने का निर्णय लिया मै आज भी अपनी उसी सोच पर अडिग हूँ । मैं मधेश के लिए हूँ, मधेश की जनता के लिए हूँ और मधेश के लिए ही कुछ करना चाहता हूँ । एक लम्बा संघर्ष मधेश ने देखा है और भोगा है । यह संघर्ष आगे भी बहुत लम्बा जाने वाला है । मधेश की मिट्टी ने जो कुर्बानी दी है, उसे हम कभी भुला नहीं सकते और न ही मधेश की जनता की इच्छा के विपरीत जाकर हम कोई समझौता कर सकते हैं । मैं फिर कहूँ कि विगत में मैंने जो निर्णय लिया मुझे उसका तनिक भी अफसोस नहीं है ।
० क्या आपको नहीं लगता कि आप संविधान सभा से अधिक सड़क पर मजबूत हैं ?
– मैं मानता हूँ कि हमारी स्थिति संविधान सभा से अधिक सड़क पर मजबूत है । चार दलों के द्वारा पेश किए गए मसौदे से मधेश की जनता और हमारा मोर्चा दोनों असंतुष्ट हैं । चार दलों के समझौते ने अंतरिम संविधान के सभी उन मुद्दों को अनदेखा किया है जो मधेश को मजबूत करता और विकास की ओर ले जाता । ऐसे में असंतोष और आन्दोलन का होना स्वाभाविक है । जनता हमारे साथ है । यह भी सच है कि आज तक जो भी प्राप्ति मधेश को हुई है वह सड़क से ही मिली है । आगे की संभावना भी वही दिख रही है फिर भी प्रयास जारी है कि मधेश को उसका अधिकार मिले, और जल्द मिले ।
० प्रचण्ड जी के भारत भ्रमण की वापसी के बाद मधेशवादी दलों से मिलने मिलाने का दौर जो शुरु हुआ है उसे किस रूप में लिया जाय ? ये सहमति के लिए है या महज औपचारिकता ?
– सही कहा आपने मिल तो रहे हैं और बातचीत की कोशिश भी हो रही है किन्तु मैंने पहले भी कहा कि इनके तेवर में बदलाव नहीं आया है ऐसे में किसी भी मुलाकात या बातचीत का कोई अर्थ नहीं रह जाता है । संघीयता, सीमांकन, समानुपातिकता, राज्यपुनर्संरचना जब तक इन मुद्दों पर सरकार ईमानदारी से सामने नहीं आएगी तब तक कोई निदान नहीं निकलने वाला है । अब तक उनकी जुबान से संघ शब्द नहीं निकल रहा तो और आगे क्या उम्मीद की जा सकती है ? हमारी बस यही मांग है कि सीमांकन के साथ संघ बने, शक्तिनिहित संघीयता मिले, नागरिकता की समस्या हल हो और शासकीय स्वरूप में एमाओवादी को पूर्व में हुए सहमति पर दृढ़ होना पड़ा । किन्तु इन मुलाकातों में ये बातें देखने को नहीं मिली ऐसे में मुलाकात का क्या औचित्य रह जाता है ?
० बदले हुए परिदृश्य में मधेश शंकित है कि कहीं पदों का लोभ देकर मधेशी नेताओं को मिलाने की कोशिश तो नहीं की जा रही है, इस सन्दर्भ में आप क्या कहेंगे ?
– मैं मधेश की जनता से यही कहना चाहुँगा कि वो शंकित न हों । मैं मेरी पार्टी और मोर्चा मधेश के साथ है, उनकी इच्छा के साथ है । ऐसा कोई समझौता मोर्चा नहीं करने वाली जो मधेश के हक में नहीं होगा । किन्तु बात–चीत के द्वारा समस्या का समाधान हो यह हम अवश्य चाहते हैं । मधेश ने बहुत बलिदान दिया है, वो फिर दे सकती है परन्तु अगर समाधान की कोई सही राह निकलती है तो हम जरुर उस राह पर चलना चाहेंगे । मैं बार बार मधेश की जनता से यह अपील करुँगा कि उनकी कुर्वानी बेकार नहीं जाएगी । हाँ संघर्ष की राह लम्बी है तत्काल परिणाम की सम्भावना नहीं दिख रही । पर हम अपने मुद्दे से पीछे हटनेवाले नहीं हैं ।
० बहुमत के दम्भ से अगर संविधान लागू होता है तो मोर्चा का क्या कदम होगा ?
– मधेश की जनता ने मसौदे को नकार दिया है और अगर सीमांकन और संघीयता के बिना संविधान बनता है तो उसे मोर्चा कभी नहीं मानने वाली है । संघीयता भी मधेश को वैसी चाहिए जिसमें शक्ति निहित हो । शक्तिविहीन संघीयता के साथ हम समझौता नहीं कर सकते । संविधान का निर्माण बहुमत से नहीं सहमति से होनी चाहिए और अगर यह नहीं हुआ तो संघर्ष तो तय है ।
० ऐसी स्थिति में क्या आप सड़क पर आएँगे ?
– मधेश के विरोध में अगर यही स्थिति बरकरार रही तो यह भी हो सकता है । कई दशकों का संघर्ष रहा है मधेश का और आज भी मधेश का हाथ खाली है । नेपाली समाज में हरेक हिसाब से हीनता का शिकार और राज्य के द्वारा सुनियोजित ढंग से मधेश को अधिकारों से वंचित किया जाता रहा है । अपने अधिकार, पहचान, समानुपाती और विकास इन सब के लिए लड़ाई जारी है । जब तक यह नहीं मिल जाता यह लड़ाई जारी ही रहेगी । यह भी जानी हुई बात है कि आसानी से यह प्राप्त होने वाला नहीं है क्योंकि यह आज का दौर ही बता रहा है कि चार दलों की नीयत क्या है ? जन आन्दोलन के बाद जिस संघीयता शब्द को अांतरिक संविधान में जगह मिली उसे ही नकार कर आज का मसौदा सामने आया है और इसे ज्यों का त्यों मानकर मधेश आत्मघात नहीं कर सकता । इसलिए राज्य का कदम ही हमें सड़क पर लाने की राह दिखाएगा और उस वक्त हमारी पार्टी या मोर्चा पीछे हटने वाली नहीं है । हम मधेश के साथ थे, हैं और आगे भी रहेंगे ।
० आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।
– आपका भी धन्यवाद । मैं पुनः कहूँगा कि मधेश की जनता को शंकित होने की आवश्यकता नहीं है हम पूरी तरह से मधेश के बलिदान और उसकी इच्छा का सम्मान करके ही आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे क्योंकि यह लड़ाई हमारी अपनी लड़ाई है

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