राजनीति में भ्रष्टाचार ही प्राथमिकता !

लिलानाथ गौतम
काठमांडू, २८ श्रावण । संगठित राजनीति से बाहर रहनेवाले प्रायः हर नागरिक के लिए ‘राजनीति’ एक घिनौना खेल है । वे लोग सोचते हैं कि राजनीति में ईमानदार, नैतिकवान और आदर्श जीवन की परिकल्पना नहीं की जाएगी । समग्र राजनीति में यह बात लगाू नहीं हो सकता । लेकिन नेपाल के सन्दर्भ में तो बहुत कुछ सच हो सकता है । क्योंकि राजनीतिक पार्टी से आवद्ध नेता÷कार्यकर्ता को एक संयुक्त परिचयन देने के लिए अगर बोला जाए तो प्रायः सभी का जवाब होता है– ‘वे सभी भ्रष्टाचारी’ और नैतिकताहीन हैं ।’
हमारे राजनीतिक पार्टी और नेताओं की कारण से ही अधिकांश लोगों में ऐसी मानसिकता का विकास हो रही है । यहां प्रतिनिधिसभा निर्वाचन विधेयक सम्बन्धि प्रसंग सान्दर्भिक हो सकता है । उक्त विधेयक महिनों पहले संसद् से पारित होना चाहिए था । लेकिन अभी तक नहीं हो पाया है । क्योंकि वहां भ्रष्टाचारी नेताओं की स्वार्थ जुड़ा हआ है । उक्त विधेयक अभी राज्य व्यवस्था समिति में रुका हुआ है । कारण है– विधेयक में ऐसी व्यवस्था की गई है, जो पारित हो जाएगा तो भ्रष्टाचारी प्रमाणित नेताओं की राजनीति समाप्त हो सकता है ।
यह विधेयक भी राजनीति करनेवाले नेता ही बनाए हैं । विधेयक बनाने में जो नेता शामील हैं, उन सभी को भ्रष्टाचारी करार देना ठीक नहीं है । लेकिन विधेयक पास होने से जो रोक रहे हैं, वे सभी भ्रष्टाचार के पक्ष पोषक है, इसमें शंका नहीं है । विधेक पास नहीं होने के कारण निर्वाचन संबंधी अन्य कामकारवाही भी रुका हुआ है । निर्वाचन आयोग ने कहा है कि भाद्र १ गते के भीतर प्रदेशसभा तथा केन्द्रसभा की निर्वाचन–तिथि घोषणा होनी चाहिए । लेकिन जब तक विधेयक पास नहीं होगा, तब तक निर्वाचन घोषणा असम्भव है ।
कहा जाता है कि स्वयम् प्रधानमन्त्री शेरबहादुर देउवा ही विधेयक पास करने में रुकावाट पैदा कर रहे हैं । कांग्रेस नेता तथा पूर्व गृहमन्त्री खुमबहादुर खड्का लगायत कुछ व्यक्तियों की दबाव में ही यह सब हो रहा है । विहीबार सम्पन्न राज्य व्यवस्था समिति बैठक को विशेष कारण दिखाकर स्थागित किया गया था । स्रोत बताता है कि उसके लिए प्रधानमन्त्री देउवा ने ही दबाव दिया था ।
उक्त विधेयक के विरुद्ध अधिकांश नेपाली कांग्रेस के सांसद हैं । उन लोगों का कहना है कि विधेयक में शामील भ्रष्टाचार विरुद्ध में जो प्रावधान है, उस को संशोधन कर ही पास किया जा सकता है । वे लोग मांग कर रहे हैं– ‘अगर कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार होेते हैं, तो ३ साल कैद होने के बाद वह निर्वाचन में सहभागी हो सकते हैं । ऐसी प्रावधान रखना चाहिए ।’ ऐसे ही लोगों के कारण आम मानसिकता बन रहा है कि राजनीति करनेवाले प्रायः सभी लोगों कि नस–नस में भ्रष्टाचार है ।
कुछ नेताओं ने विधेयक तो बनाए हैं । लेकिन पास करने के लिए सभी सहमत नहीं हैं । जिसके चलते अभी विधेयक पास नहीं हो पा रहा है । इसका मतलब होता है– वहां अधिकांश त भ्रष्टाचारी ही हैं । अगर नहीं हैं तो विधेयक को क्यों रोक कर रखा गया है ?

दूसरी प्रमाण है, डा. गोविन्द केसी का अनसन तथा स्वास्थ्य शिक्षा विधेयक । स्वास्थ्य शिक्षा को व्यवस्था करने के लिए और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार और व्यापारीकरण को अंत करने के लिए डा. केसी २०वें दिन से आमरण अनसन में हैं, और उनका जीवन कष्टकर होता जा रहा है । तब भी हमारे नेता लोग जनपक्षीय उक्त विधेयक पास करने में असफल हो रहे हैं । इसका मतलब क्या है ? मतलब है, राजनीति में सिर्फ भ्रष्टाचारियों का बोलवाला है ।

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