Tue. Sep 25th, 2018

राजनीति से नीति गायब हो चुकी है सिर्फ राज करने की भावना रह गई है : श्वेता दीप्ति

मजे की बात तो यह है कि घोषणापत्र में इतने हवाई किले बाँधे गए हैं जो आम जनता की आम जरुरतों को तो बिल्कुल भी सम्बोधित नहीं करता है । फिर भी कैसी बाध्यता है कि अपनी और अपने जरुरतों को भूल कर जनता ऐसे उम्मीदवार को चुनेगी जिनसे किसी परिवर्तन या क्षेत्रीय विकास की सम्भावना या अपेक्षा नहीं है ।

election-nepal-vote

श्वेता दीप्ति, काठमांडू , १० मई | देश के किसी भी चुनाव को लोकतंत्र का महापर्व माना जाता है । जहाँ जागरुक जनता अपने बहुमूल्य मतों का उपयोग करती है । चुनाव चाहे संसदीय हो या स्थानीय दोनों का महत्व होता है । एक के ऊपर अगर सम्पूर्ण देश के सर्वांगिन विकास की जिम्मेदारी होती है तो दूसरे के ऊपर शहर और क्षेत्र विशेष की जिम्मेदारी होती है । परन्तु अगर लोकतंत्र पर ही सवाल उठने लगे तो चुनाव का औचित्य कहाँ रह जाता है ? स्थानीय निकाय का निर्वाचन जहाँ देश की आवश्यकता है वहीं निर्वाचन के परिप्रेक्ष्य में मौसमी गठबन्धन ने आमजनता में चुनाव के मद्देनजर वितृष्णा के भाव को ही भरा है । करीब पन्द्रह वर्षों से स्थानीय निकाय रिक्त है । निर्वाचन की घोषणा कर के प्रचण्ड सरकार ने एक महत्तवपूर्ण निर्णय लिया है हालाँकि यह अलग बात है कि इस निर्णय के पीछे देश के एक महत्तवपूर्ण हिस्से को हाशिए पर रख दिया गया है । क्योंकि जितना आवश्यक यह निर्वाचन है उतना ही आवश्यक देश के आन्दोलित और असंतोष पक्ष की समस्या का समाधान करना भी था । पर सत्तापक्ष इस ओर गम्भीर नहीं और एमाले संविधान संशोधन को राष्ट्रीयता से आबद्ध कर और इस संशोधन से देश विखण्डन का भ्रम फैलाकर अपनी स्वार्थसिद्धि में लगी हुई है ।

मधेश की माँग आज भी पूर्ववत है, आज भी वहाँ की जनता खुद को अवहेलित महसूस कर रही है । वो भी इस देश के नागरिक है इस भावना की अनुभूत वो नहीं कर पा रहे हैं । निर्वाचन सम्पन्न कराने की जिद में कई तकनीकी कमियों को भी नजरअंदाज किया जा रहा है ऐसे में निष्पक्ष चुनाव और उसके सही परिणाम की तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती है । उस पर से स्थानीय निकाय के चुनाव में जिस तरह के गठबन्धन हो रहे हैं, उसे देखते हुए तो यही लग रहा है कि राजनीति से नीति गायब हो चुकी है वहाँ सिर्फ राज करने की भावना रह गई है जिसे साम दाम दण्ड भेद से हासिल करने के पीछे सभी लगे हुए हैं । जनता का रुझान न तो दल विशेष की तरफ दिख रहा है और न ही उम्मीदवार विशेष की तरफ । फिर भी मतदान में भाग लेने की बाध्यता तो हमारे साथ है । अगर मतदानपत्र में एक कालम ऐसा होता कि आप किसी के पक्ष में नहीं हैं तो मतदाता सबसे ज्यादा उपयोग इसी कालम का करते ताकि वो अपना विरोध जता सकें । स्थानीय चुनाव में दलों की जो मानसिकता सामने आ रही है वह एक मजाक ही बन गया है । असमान विचार धारणा और सैद्धान्तिक मान्यता के बीच का यह मौसमी समझौता मौसम के साथ ही रंग बदलने वाला है और उम्मीदवारों के दावे भी मौसमी मेढकों की ही तरह मौसम गुजरने के बाद कहीं गुम हो जाने वाला है । जनता के मन में एक अहम सवाल है कि क्या पद के लिए जो तालमेल किया गया है यह तालमेल आगे के लिए एक स्वच्छ राह निर्माण करेगा ? क्योंकि बँटवारे की राजनीति ही भ्रष्टाचार का मूल होती है । पद पाने के बाद विकास के नाम पर बजट और बजट के बाद बँटवारा यही कटु सत्य है इस अनपेक्षित गठबन्धन का । उससे भी मजे की बात तो यह है कि घोषणापत्र में इतने हवाई किले बाँधे गए हैं जो आम जनता की आम जरुरतों को तो बिल्कुल भी सम्बोधित नहीं करता है । फिर भी कैसी बाध्यता है कि अपनी और अपने जरुरतों को भूल कर जनता ऐसे उम्मीदवार को चुनेगी जिनसे किसी परिवर्तन या क्षेत्रीय विकास की सम्भावना या अपेक्षा नहीं है ।

 

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

1
Leave a Reply

avatar
1 Comment threads
0 Thread replies
0 Followers
 
Most reacted comment
Hottest comment thread
1 Comment authors
दिल बहादुर थारु Recent comment authors
  Subscribe  
newest oldest most voted
Notify of
दिल बहादुर थारु
Guest
दिल बहादुर थारु

बहुत अच्छा बिचार