राजनेता ! दलाल बन गए : गंगेशकुमार मिश्र

 

राजनेता ! दलाल बन गए …

गंगेशकुमार मिश्र

°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
बात एक ही जगह पर,
आकर अटक जाती है;
जब बात !
कुर्सी की आती है;
कौन करे त्याग ?
कौन दे ?
महत्वाकांक्षाओं की आहूति।
कौन करे ?
इच्छाओं का दमन;
गाड़ी-घोड़ा,
महल-अटारी;
कहाँ, दे पाती, ईमानदारी ?
महँगाई !
कमर तोड़ रही है;
आकांक्षाएँ !
आसमान छू रही हैं;
कौन चढ़े ?
नैतिकता की भेट;
यही सोच, डुबो रही है।
राजनीति !
व्यवसाय बन गई;
राजनेता !
दलाल बन गए।
जिसे देखो आतुर हैं;
इसमें;
निवेश करने को;
ये ऐसा धन्धा है;
जो कभी, मंदा न हुआ।

 

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz