राजपा को देश की दूसरी ताकतवर पार्टी के रुप में स्थापित करना होगा : बृजेशकुमार गुप्ता

आवश्यकता है पार्टी में सामूहिक निर्णय की परंपरा स्थापित हो । क्योंकि निर्णय देना या निर्णय में सहभागी होना सभी का लोकतांत्रिक अधिकार है । यह नहीं कि शीर्ष नेता जो कहेंगे उसी में हम ‘हां’ कह देंगे

बृजेशकुमार गुप्ता पूर्व मन्त्री, सभासद एवं राजपा नेपाल के नेता हैं

बृजेशकुमार गुप्ता, कपिलवस्तु, ५ मई | मधेशी जनता व शहीद परिवारों की भावनाओं को कदर करते हुए वैशाख ७ गते छह दलों के बीच एकीकरण हुआ । एकीकरण तो हुआ लेकिन बहुत सारी चुनौतियां हैं हमारे सामने । एकीकरण से पूर्व यह एक गांव की क्लब थी लेकिन अब यह एक लायन्स क्लब बन गयी है । जनता में अभी भी आशंका है कि कहीं  यह लायन्स क्लब पुनः क्लब न बन जाए । अगर यह पुनः क्लब बन गयी तो पार्टी का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाएगा । इस पर ध्यान देने की सख्त जरुरत है । दूसरी जरुरत यह है कि एकीकरण से पूर्व हम मधेश के एजेंडों को लेकर नहीं, बल्कि हम अपने–अपने स्वार्थों के लिए पृथक थे । आज हम एकीकृत हुए हैं । एकीकृत होने के लिए अगर अपना त्याग दिखाएं हैं, तो आनेवाले दिनों में भी इसी त्याग को जीवित रखते हुए राजपा नेपाल को देश की एक ताकतवर दूसरी पार्टी के रुप में स्थापित करने के लिए आगे बढ़ना होगा । अगर हम त्याग करने में असफल होते हैं, तो फिर दुर्घटना हो सकती है, ऐसा मुझे लगता है ।
तीसरी आवश्यकता है पार्टी में सामूहिक निर्णय की परंपरा स्थापित हो । क्योंकि निर्णय देना या निर्णय में सहभागी होना सभी का लोकतांत्रिक अधिकार है । यह नहीं कि शीर्ष नेता जो कहेंगे उसी में हम ‘हां’ कह देंगे । आशय यह है कि हम जिस कमेटी में हैं उसी कमेटी की बैठक में अपना सुझाव अवश्य रखें । सुझाव देते वक्त यह नहीं सोचना चाहिए कि मेरी बात रहेगी या नहीं रहेगी या मेरी बात से शीर्ष नेता रुष्ट हो जाएंगे । दूसरी तरफ शीर्ष नेताओं को भी उनकी बातों को सुननी चाहिए । इस प्रकार की परंपरा पार्टी में रही, तो मुझे लगता है कि ज्यादा कारगर सिद्ध हो सकता है ।
अब रही बात संविधान संशोधन व चुनावी प्रक्रिया की तो, मेरे ख्याल से कथित बड़ी पार्टियां अभी भी मधेशी, जनजाति, अल्पसंख्यक, पिछड़ावर्ग आदि समुदायों की मांगों को संशोधन करने के पक्ष में नहीं हैं । अर्थात् ईमानदारी की भावना उन पार्टियों में नहीं दिखाई दे रही हैं । बाध्य होकर मजबूरी में संशोधन कर दे, तो अलग बात है लेकिन ईमानदारी से संशोधन के पक्ष में नहीं हैं ।
विमर्श करने वाली बात यह है कि अगर संविधान संशोधन नहीं हुआ तो हम क्या करें, हमारी रणनीतियां क्या हों ? क्योंकि संविधान तो जारी हो गया । संशोधन की आवश्यकता पड़ने पर संशोधन किया जाएगा, आवश्यकता नहीं पड़ने पर नहीं भी किया जा सकता है । निश्चित है कि मौजूदा चुनाव में अगर पांच प्रतिशत भी वोटिंग हो जाती है, तो उसकी मान्यता तो मिलेगी ही । अतीत को अगर देखें तो २०५९ साल में तत्कालीन पार्टियों के विरोध के बावजूद भी राजा ज्ञानेन्द्र ने चुनाव करवाया था । अगर सत्ता परिवर्तन नहीं होता तो स्थानीय निकाय जीवित तो रहता । उसे खारिज नहीं किया जा सकता था ।
हालिया चुनाव पहले का जैसा न होकर ज्यादा शक्तिशाली बन गया है । पांच साल के लिए कोई स्थानीय निकाय स्थापित हो जाता है, तो हमारे लिए बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है । अगर हम चुनाव में भाग नहीं लेते हैं, तो जनसंख्या के आधार पर संख्या बढ़ाने की जो बात है, कहीं वह भी हाथ से निकल न जाए, ऐसा मुझे लगता है । ऐसे हालात में हमारे लिए यह खतरा सिद्ध हो सकता है । इसमें भी गंभीर रुप से सोचने, समझने व चिंतन करने की आवश्यकता है ।
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(बृजेशकुमार गुप्ता पूर्व मन्त्री, सभासद एवं राजपा नेपाल के नेता हैं ।)
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