राजपा प्रतिबद्ध है, विभेद को हटाकर रहेगी : महन्थ ठाकुर से श्वेता दीप्ति की बातचीत

मधेश के मुद्दों के साथ राजपा, सरकार से कोई गलत सौदा नहीं करेगी 


हमने पहले भी पूरे देश को लेकर चलने की कोशिश की है और आज भी राजपा नेपाल समग्र नेपाल को साथ लेकर चलने की धारणा के साथ एकीकृत हुई है और यही हमारी मजबूती का आधार भी बनेगा ।


सुरक्षा, प्रशासन और नीति से मधेशी जनता आतंकित है । सत्ता ने जो बर्बरता का खेल मधेश की जनता के साथ खेला है, इस सब का हिसाब राज्य को देना होगा और अगर ऐसा नहीं हुआ तो देश विभाजन की कगार पर पहुँच जाएगा

डा.श्वेता दीप्ति, काठमांडू , “डूबते को तिनके का सहारा” निराश मधेश की जनता के हाथों में मोर्चा का एकीकरण वही तिनका है जिसके सहारे सदियों से बहती आ रही शोषण की नदी को पार करने की उम्मीद बँधी हुई है । अब यह नेतृत्व पर निर्भर करता है कि वो मधेश की नौका को किनारे तक ले जाते हैं या साहिल को मझदार में छोड़ देते हैं । पीढ़ी–दर–पीढ़ी दर्द और विभेद को मधेशियों ने झेला है, जिसकी वजह से उनका मन सहज ही किसी पर यकीन करने की मनःस्थिति में नहीं है । हर बार एक आश्वासन और उम्मीद की डोर थमाई जाती है और फिर वही उम्मीद, सत्ता की माँझे से या अपनों की स्वार्थ की वजह से बीच में ही उलझ कर रह जाती रही है । मधेशी मोर्चा का एकीकरण मधेश की राजनीति में ही नहीं नेपाल की

सिंह दरबार विगत २८ वर्षों से मधेश के लिए विभेद की राजनीति करता आया है और राजपा प्रतिबद्ध है कि इस विभेद को वह हटाकर ही रहेगी
राजनीति में ही एक ऐतिहासिक कदम है, जिसने कहीं ना कहीं सत्ता और मुख्य विपक्षी दलों की पेशानी पर बल ला दिया है । किन्तु इन सबके बीच मधेशी मन शंकित भी है कि कहीं यह महज छलावा तो नहीं ? एकीकरण के पश्चात् राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल के नाम से नवगठित दल ने मधेश की जनता को जहाँ एक ओर खुशी दी, वहीं एक कसक उनके दिलों में है कि नामकरण में मधेश शामिल नहीं है । हालाँकि यह एक भावानात्मक पहलू मधेशी जनता की उन्हें यह लग रहा है कि जिस मधेश शब्द को संविधान में शामिल करने की बात थी, पहचान दिलाने की बात थी, उसे ही गौण कर दिया गया । मधेश की इस शिकायत को राजपा नेपाल अब सिर्फ अपनी कार्यशैली से ही दूर कर सकती है और करेगी यह पूर्ण विश्वास भी है । क्योंकि पार्टी के नाम में मधेश हो ना हो, राजपा की नींव मधेश और मधेश का मुद्दा ही है जिसे नजरअंदाज करने की वो सोच भी नहीं सकते हैं । पार्टी के नामकरण की सोच में दूरदृष्टि शामिल है, जिसमें सम्पूर्ण नेपाल को समेटने की परिकल्पना की गई है । फिलहाल तो इसकी सम्भावना दूर दूर तक नहीं है, परन्तु यह यथार्थ में भी बदल सकती है बशर्ते इस एकीकरण की उम्र लम्बी हो जाय ।

राजपा अध्यक्ष की नीति बिल्कुल साफ है कि मधेश केन्द्रित दल के साथ जो सहमति सरकार की हुई है, उसके कार्यान्वयन के पक्ष में कार्यपालिका और न्यायपालिका को एक साथ आना होगा । अगर ऐसा नहीं होता है तो पहले चुनाव का तो बहिष्कार हमने किया ही है दूसरे चरण के स्थानीय चुनाव में तो क्या प्रान्तीय और केन्द्रीय चुनाव में भी शामिल होने की संभावना न्यून है ।
एक सक्षम और दृढ़ नेतृत्व
राजपा नेपाल का नेतृत्व एक सक्षम, अनुभवी और दृढ़ हाथों में है । राजपा के अध्यक्ष श्री महन्थ ठाकुर अपने शाँत, सौम्य तथा दृढ निश्चय के लिए जाने जाते हैं पर उनकी प्रखरता भी समय समय पर राज्य के विभेद के खिलाफ उभर कर आती रही है । सामान्यतया एक ऐसा व्यक्तित्व जो विवादों से परे अपनी शालीनता और मितभाषी व्यवहार के लिए जाने जाते हैं । आज उनके समक्ष राजपा के नेतृत्व की बहुत बड़ी चुनौती है । उनके कार्यकाल में छ पार्टियों का एक बृहत संगठन बनना इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो चुका है । किन्तु इस संगठन को साथ लेकर चलना आसान नहीं होगा यह तो तय है । मोर्चा का एक महत्वपूर्ण घटक संघीय समाजवादी फोरम इससे बाहर है और स्थानीय निकाय के चुनाव में शामिल होने के निर्णय की वजह से संघीय गठबन्धन के संयोजक पद से उन्हें मुक्त कर दिया गया है । जबकि मधेश यह उम्मीद कर रहा था कि फोरम एकीकरण का एक महत्तवपूर्ण हिस्सा अवश्य बनेगा । वैसे उम्मीद यह भी थी कि मधेशी जनअधिकार फोरम लोकतांत्रिक भी इसमें शामिल होता परन्तु फिलहाल विजय गच्छदार जी सत्ता में शामिल होकर और मनोनुकूल पदों को पाकर इस सोच पर पूर्णविराम लगा चुके हैं ।

राज्य हमेशा से मधेश का नजरअंदाज करता आया है । मधेश की जनता यह अनुभूति ही नहीं कर पा रही है कि यह देश उसका भी है ।

चुनाव में नहीं जाने का कारण, सिंहदरबार
देश स्थानीय निकाय के पहले चरण के चुनावी प्रक्रिया में व्यस्त है परन्तु राजपा इससे बाहर है । इसके कई तकनीकी कारण हो सकते हैं । राजपा नेपाल के अध्यक्ष श्री महन्थ ठाकुर से हुई विशेष मुलाकात में उनके जो विचार सामने आए इस सन्दर्भ में, उसमें उनका स्पष्ट मानना है कि देश के इस हालत और चुनाव से राजपा के बाहर रहने की जिम्मेदार सरकार स्वयं है । सरकार कह कुछ रही है और कर कुछ और रही है । गत श्रावण में जो सहमति सरकार के साथ हुई थी न तो उसे पूरा किया गया है और न ही संविधान संशोधन की प्रक्रिया आगे बढ़ी है । ऐसे में चुनाव में जाने का सवाल ही नहीं उठता है । संविधान संशोधन के सम्बन्– में भी सरकार कभी गम्भीर नहीं हुई है यह उनका मानना है और इस बात को जनता भी देख ही रही है । सरकार और एमाले के द्वारा जो भ्रम की खेती की जा रही है वह समयोचित तो बिल्कुल नहीं है । संविधान संशोधन की बात को देश विखण्डन से जोड़कर प्रचार किया जा रहा है और इसी आधार पर सत्ता तक पहुँचने की कोशिश भी जारी है जबकि संविधान संशोधन से देश की ही जनता संतुष्ट होगी और इससे एकता और सद्भाव ही फैलेगा विखण्डन नहीं क्योंकि, विखण्डन की भावना तो वहाँ जड़ पकड़ती है, जहाँ असंतोष की ज्वाला भड़कती है । इस सन्दर्भ में देखा जाय तो हैसत्ता और पार्टी विशेष की नीति ही असंतोष की आग को और भी ज्यादा भड़का रही । राजपा अध्यक्ष की नीति बिल्कुल साफ है कि मधेश केन्द्रित दल के साथ जो सहमति सरकार की हुई है, उसके कार्यान्वयन के पक्ष में कार्यपालिका और न्यायपालिका को एक साथ आना होगा । अगर ऐसा नहीं होता है तो पहले चुनाव का तो बहिष्कार हमने किया ही है दूसरे चरण के स्थानीय चुनाव में तो क्या प्रान्तीय और केन्द्रीय चुनाव में भी शामिल होने की संभावना न्यून है । राजपा के गठन के बाद उसकी आगे की कार्यदिशा क्या होगी यह सवाल आम जनता और खास कर मधेश की जनता के जेहन में है । इस सन्दर्भ में उनके विचार थे कि कार्यदिशा जो पहले थी, वही आज भी है । हम मधेश की पहचान और अधिकार के लिए सदियों से लड़ते आए हैं और जब तक यह हमें मिल नहीं जाता तब तक यह लड़ाई अनवरत रूप से जारी रहेगी । उनका अनुरो– था कि इसमें न तो मधेश की जनता को कोई शक होनी चाहिए और न ही सरकार को यह भ्रम कि हम अपने मुद्दे से हटने वाले हैं । यह तो तय है कि अगर संविधान संशोधन नहीं हुआ तो देश के अन्दर जो द्वन्द्ध है वह और भी गम्भीर रूप धारण करेगा अगर सरकार इस विषय पर गम्भीर नहीं हुई तो । सिंह दरबार विगत २८ वर्षों से मधेश के लिए विभेद की राजनीति करता आया है और राजपा प्रतिबद्ध है कि इस विभेद को वह हटाकर ही रहेगी

मधेश की जनता ने हमेशा अपनी असीम धैर्य का परिचय दिया है और विगत को भूल कर इन्हें दिल से अपनाया है जिसका खयाल राजपा से आबद्ध हर घटक को रखना होगा
राजपा की अपेक्षा, बौद्धिक वर्ग का सहयोग
राजपा की एक उम्मीद जहाँ सत्ता से है वहीं मधेश की जनता से सहयोग की अपेक्षा भी है । राजपा अध्यक्ष की चिन्ता जाहिर हुई कि मधेश की आम जनता जिस तरह अधिकार की लड़ाई में स्वतःस्फूर्त रूप से शामिल हो जाते हैं, उस तरह से मधेश के बौद्धिक वर्ग का सहयोग हमें जितना मिलना चाहिए उतना नहीं मिल पाता है । जबकि इस लड़ाई में उनका सहयोग अपेक्षित है । इतिहास गवाह है कि किसी भी लड़ाई में बौद्धिक वर्ग की सहभागिता निर्णायक सिद्ध हुई है । वो मानते हैं कि यह लड़ाई जारी है और लम्बे समय तक जारी रहेगी इसलिए पार्टी की एकता और मधेश की जनता का धैर्य आवश्यक है । क्योंकि मधेशी कार्यकर्ता, किसान, मजदूर, युवा और महिलाओं की समवेत आवाज ही पार्टी की एकता का आधार है । उन्होंने राजपा की नीति के सम्बन्– में कहा कि हमने पहले भी पूरे देश को लेकर चलने की कोशिश की है और आज भी राजपा नेपाल समग्र नेपाल को साथ लेकर चलने की धारणा के साथ एकीकृत हुई है और यही हमारी मजबूती का आधार भी बनेगा । उन्होंने आगाह करते हुए कहा कि आज तक हमारे अस्तित्व पर और हमारी राष्ट्रीयता पर शक किया जाता रहा है । जबकि सम्भव हो तो ऐसी सोच वालों से अपील है कि, वो इतिहास के पन्नों को जरा खंगाल कर देखें आइना खुद ब खुद दिख जाएगा और आइना कभी झूठ नहीं बोलता । इसलिए मधेश की राष्ट्रीयता पर शक और मधेशी जनता पर विखण्डन का आरोप लगाने की बजाय इन बड़ी पार्टियों को आत्मविश्लेषण की आवश्यकता है, क्योंकि इनकी नीति ही देश को तोड़ रही है, जो निःसन्देह देश हित में तो कदापि नहीं है । हमारी भाषा, सभ्यता, संस्कृति सभी को इन्होंने गिरवी रख दिया है । किसी भी समुदाय पर न तो भाषा लादी जा सकती है और न ही उन्हें उनकी संस्कृति और सभ्यता से अलग किया जा सकता है । जबकि वर्तमान में इनकी नीति यही है कि ये भाषा के नाम पर भी मधेश में फूट डालने की कोशिश कर रहे हैं । इन्हें समझना होगा कि भाषा हमारी पहचान है और हम इसे चुनने के लिए आजाद हैं कि हम कौन सी भाषा चुनें । वह भाषा कोई भी हो सकती है । उन्होंने कहा कि हिन्दी के नाम पर आज जो राजनीति कर रहे हैं उन्हें समझना होगा कि यही हिन्दी सदियों से नेपाल के आन्दोलन की भाषा रही है और इसका इतिहास गवाह है । फिर आज ये चाहे जितनी भी कोशिश कर लें हिन्दी को यहाँ से निर्मूल नहीं कर सकते हैं । इन्हें आज या कल जिस तरह भारत में नेपाली को संविधान में मान्यता प्राप्त है उसी तरह हिन्दी को भी यहाँ मान्यता देनी होगी ।
हर निकाय में मधेश की उपस्थिति
वर्तमान परिस्थिति में राजपा अध्यक्ष की धारणा स्पष्ट नजर आई कि सत्ता से लड़ने के लिए मधेशी दल की एकता पर्याप्त है । अगर सरकार अपनी की गई सहमति से पीछे हटती है तो आन्दोलन अवश्यम्भावी है । राजपा जनता के घर–घर तक जाएगी और इस लड़ाई को जारी रखेगी । जातीय, क्षेत्रीय, भाषिक, धार्मिक विभेद का अन्त सरकार को करना होगा । आन्दोलन की माँग पहचान सहित की संघीयता और संघीयता सहित का संविधान है और जब तक यह माँग पूरी नहीं होगी देश को कोई निश्चित दिशा मिल ही नहीं सकती है । राज्य हमेशा से मधेश का नजरअंदाज करता आया है । मधेश की जनता यह अनुभूति ही नहीं कर पा रही है कि यह देश उसका भी है । राज्य के हर निकाय में मधेश की उपस्थिति न्यून है । सुरक्षा, प्रशासन और नीति से मधेशी जनता आतंकित है । सत्ता ने जो बर्बरता का खेल मधेश की जनता के साथ खेला है, इस सब का हिसाब राज्य को देना होगा और अगर ऐसा नहीं हुआ तो देश विभाजन की कगार पर पहुँच जाएगा और इसकी जिम्मेदारी राज्य की होगी । आज जिस तरह देश की तीन मुख्य पार्टियाँ अपने स्वार्थ के लिए देश के महत्तवपूर्ण निकायों के साथ खिलवाड़ कर रही है वो देश की दुर्दशा का कारण बनेगा । देश का विभाजन मधेश की वजह से नहीं होगा इनकी नीतियों की वजह से होगा ।
राजपा से मधेश की अपेक्षा
राजपा अध्यक्ष महन्थ ठाकुर की दृढता ने यह तो जाहिर कर दिया कि मधेश के मुद्दों के साथ राजपा, सरकार से कोई गलत सौदा नहीं करेगी । परन्तु राजपा के साथ संघीय समाजवादी फोरम का अलगाव संदेह पैदा कर रहा है कि कहीं राजपा अभी से तो कमजोर नहीं पड़ रही है ? यह आम जनता की भावना है । मधेश की जनता की यह अभिलाषा थी कि फोरम भी इस अभियान में साथ हो और इस एकीकरण को और भी मजबूती प्रदान करें । किन्तु फोरम के चुनाव में हिस्सा लेने के निर्णय ने जहाँ उनकी इस अभिलाषा को आहत किया है, वहीं एक तबका ऐसा है जो खुश हो रहा है यह सोचकर कि, राजपा बहुत जल्द कमजोर हो जाएगी । उनकी यह सोच उन्हें मानसिक तोष दे रहा है । पर यह भी कटु सत्य है कि यह राजनीति है, जहाँ हर क्षण जोड़–तोड़ की सम्भावना बनी रहती है । वर्तमान में जो स्थानीय निकाय के चुनाव का परिदृश्य है, वही इस बात की पुष्टि कर रहा है कि पद और पावर के लिए नैतिकता के विरुद्ध भी जाकर समझौते होते हैं । जहाँ सोच एक नहीं है, विधान एक नहीं है वो एक दूसरे से गलबहियाँ किए हुए हैं और जनता बेवकूफ बन रही है उनके हाथों में एकबार फिर खुद को गिरवी रखने की तैयारी कर के । फिलहाल तो राजपा नेपाल की राजनीति में एक मजबूत शक्ति बनकर पैदा हुई है । हाँ, चुनौतियाँ इनके समक्ष है परन्तु देश की भावी राजनीति और मधेश के भविष्य की बागडोर सम्भालने के लिए इनकी दूरदर्शिता और अटूट धैर्य की आवश्यकता है । मधेश की जनता ने हमेशा अपनी असीम धैर्य का परिचय दिया है और विगत को भूल कर इन्हें दिल से अपनाया है जिसका खयाल राजपा से आबद्ध हर घटक को रखना होगा । बेवजह के आरोप प्रत्यारोप की बजाय अपने नेतृत्व पर विश्वास करना होगा क्योंकि जिस तरह जनता की भावनाओं को साकार करने की जिम्मेदारी नेतृत्व की होती है, उसी तरह नेतृत्व की नीति को साकार करने के लिए जनता के धैर्य और विश्वास की आवश्यकता होती है । राजपा को अगर एक लड़ाई सत्ता से और राज्य के विभेद से लड़ना है तो दूसरी मुख्य लड़ाई स्वार्थ और परिवारवाद की राजनीति के खिलाफ भी लड़ना होगा तभी वो अपनी जनता का विश्वास और साथ पा सकते हैं ।

डा. श्वेता दीप्ति, सम्पादक , हिमालिनी |

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1 Comment on "राजपा प्रतिबद्ध है, विभेद को हटाकर रहेगी : महन्थ ठाकुर से श्वेता दीप्ति की बातचीत"

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मनीषा गुप्ता
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मनीषा गुप्ता

सत्ता में आने के बाद 60 % बाते सिर्फ बातें होती है । आम जनता सिर्फ विस्वास पर उन वादों के अमल होने की प्रतीक्षा करती है । फिर भी यह उम्मीद लगानाही एक विकल्प मात्र रह जाता है उन लोगो के लिये जो अपने अधिकार का प्रयोग कर सत्ता में ऐसा उम्मीद वार चाहते जो उनको पार लगाए …..

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