राजा महेन्द्र का सैनिक तानाशाही : मधेसियों ने लड़ी लड़ाई

madhesh-martyr-durgananda-jhaवि.सं. २०१७ साल पुस १ गते के दिन राजा महेन्द्र ने सैनिक कू किया । इस के वाद निर्वाचित संसद को भंग कर दिया । नेपाल के सभी राजनीतिक दलों को अवैध घोषित करके उनकी सम्पूर्ण गतिविधिया समाप्त कर दी गई । प्रजातन्त्र के हत्या के प्रतिरोध में सम्पूर्ण मधेस में विरोध प्रदर्शन हुआ । वी.पी. कोइराला गिरफ्तार किये गए । सुवर्ण शमसेर भारत में थे । सुवर्ण शमसेर नेपाली कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष बनाए गए । वि.सं. २०१७ साल माघ १२–१४ गते तक पटना में नेपाली कांग्रेस का सम्मेलन हुआ । कांग्रेस ने देशव्यापी सशस्त्र आन्दोलन चलाने का निर्णय लिया । इस सम्मेलन में तत्कालीन नेपाल प्रजा परिषद –मिश्र) के अध्यक्ष भद्रकाली मिश्र, संयुक्त प्रजातन्त्र पार्टी के महासचिव काशीप्रसाद श्रीवास्तव और नेपाल तराई कांग्रेस के महामंत्री रामजनम तिवारी ने भी भाग लिया था । नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में हुए सशस्त्र संघर्ष में वि.सं. २०१९ में सुखदेव सिंह को राजविराज के सैनिक बैरक में गोली का शिकार बनाया गया । राजा विरोधी कार्यों का व्यवस्थापन करने के आरोप में रक्सौल में कांग्रेसी नेता विश्वनाथ प्रसाद अग्रवाल पर प्रहार किया गया । वि.सं. २०१८ साल माघ ९ गते को छात्र नेता दुर्गानन्द झा ने जनकपुर भ्रमण के दौरान राजा महेन्द्र पर घातक बम फेंका ।

विस्फोट से राजा की कार क्षतिग्रस्त हुई किन्तु राजा बच गये । कुछ महीनों के वाद दुर्गानन्द झा को मृत्युदण्ड दिया गया । इसी मुकदमे में अरविन्द कुमार ठाकुर को आजीवन कारवास की सजा हुई । बीरगंज में बम बिस्फोट किया गया । इस काण्ड में दल सिंह मगर और दुःखा सहनी को १६ वर्ष तक जेल में रहना पड़ा । योगी साह को १० वर्ष कैद भुगतना पड़ा । कपिलेश्वर झा, कपिलेश्वर लाल को आजीवन कैद की सजा दी गई । पंचायत व्यवस्था के दौरान कई नेताओं को भारतीय सीमा क्षेत्र में मार दिया गया । वि.सं. २०१८ साल के संघर्ष में बारा में भागवत यादव और रुपन्देही में सत्यनारायण मल्लिक ने अतुलनीय भूमिका निर्वाह किया ।
मधेसी समुदाय ने राजा महेन्द्र के द्वारा लागू किये गये सर्वसत्तावादी पंचायत व्यवस्था को स्वीकार नही किया । राजा के दृष्टिकोण में भी मधेसियों के प्रति घोर अविश्वास उत्पन्न हुआ । इस के परिणामस्वरूप पंचायत व्यवस्था के दौरान कई मधेस विरोधी नीति और निर्णय लिया गया । मधेस के दक्षिणी क्षेत्राें में पहाड़ और भारत के कई जगहों से पहाड़ी समुदाय के लोगों को लाकर बसाया गया । नेपाल में मधेसी समुदाय को लक्षित कर वि.सं. २०२० साल में नागरिकता कानून लागू किया गया । इस कानून के लागू होने से लाखों मधेसियों को नागरिकता देने से इन्कार कर दिया गया । परिमाणस्वरूप मधेस के कई भाग में नेपाल नागरिकता कानून की प्रतियों को जलाया गया । मधेस मुक्ति मोर्चा के नेता सत्यदेव मणि त्रिपाठी एवं विश्वनाथ तिवारी के नेतृत्व में रूपन्देही में विरोध प्रदर्शन हुए । इस आन्दोलन के दौरान लक्ष्मी नारायण झा, श्यामलाल मिश्र, देवकी नन्दन गुप्ता, परमहंस यादव आदि को दण्डित किया गया । पंचायती व्यवस्था के दौरान सर्वप्रथम मधेस में भूमिसुधार और इस के तहत अनिवार्य बचत कार्यव्रmम लागू किया गया था । भूमिसुधार कार्यव्रmम का मुख्य उद्देश्य ही मधेस में रह रहे जमिन्दारों का जमीन हड़प कर पहाड़ी समुदाय के लोगों को बसाना था । पंचायत सरकार की नीति के चलते मधेसियों में आक्रोश फैलता गया । अनेक जिलों में विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ । वि.सं. २०२३ साल में नवलपरासी जिला के परासी में हजारों किसानों ने सरकारी अधिकारियों के समक्ष विरोध प्रदर्शन किया । इस दौरान पुलिस की गोलियों से ९ किसान मारे गये । आन्दोलन को कुचल दिया गया । किसानाें का शोषण करने के लिए वि.सं. २०२१ साल में ही अनिवार्य बचत योजना शुरू की गई । वि.सं. २०२६ साल में कपिलवस्तु जिला के तौलिहवा में किसानों ने इस सरकारी नीति के विरोध में कड़ा प्रदर्शन किया । पुलिस का हिंसक दमन चव्रm चला, जिसमें २३ किसानों की मृत्यु हुई । इन सभी घटनाओं से मधेसी समुदाय में एक विश्वास बना कि सर्वप्रथम अधिनायकवादी पंचायत व्यवस्था का खात्मा हो फिर मधेसियों के अधिकार की लड़ाई लड़ी जाएगी ।
नेपाल के राजनीतिक इतिहास में नेपाली कांग्रेस की उल्लेखनीय भूमिका रही है । राणा शासन के खिलाफ हुआ आन्दोलन व्रmांग्रेस के ही नेतृत्व मे हुआ था । उस वक्त राणा शासन से मुक्ति चाहने वालों के लिए नेपाली कांग्रेस ही एक मात्र पार्टी थी । वि.सं. २००७ साल से पहले मधेस के बड़े जमीन्दार भी भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन से प्रभावित होकर नेपाल में राणा शासन से मुक्ति चाहते थे । पढ़े लिखे नौजवान में तो यह चाहना थी ही । मधेसी समुदाय के लोगों का नेपाली कांग्रेस से पुराना और गहरा ताल्लुकात का यही मुख्य कारण रहा है । सम्बन्ध और सरोकार के इन्ही तथ्यों के आलोक में मधेसी लोग पुश्त दर पुश्त नेपाली कांग्रेस में लगते गए । नेपाली कांग्रेस द्वारा संचालित २००७ साल के, २०१८ साल के, २०२९–३० साल के सशस्त्र आन्दोलनों में और २००७ साल से लेकर २०६२–६३ साल तक के सभी शांतिपूर्ण जन आन्दोलनों में मधेसी समुदाय से आये हुए युवाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है । नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में हुए सशस्त्र संघर्ष के व्रmम में वि.सं. २०१८ साल में ही रौतहट के बंकुल में रामविलास राय यादव, पर्सा में सुलेमान मियां, बारा के भोला शाह कानू और सप्तरी सूवर्णपट्ी के कैलु चौधरी थारू शहीद हुए । इसी साल रौतहट के शेष पांचू और गणेश राउत कुर्मी की हत्या करवायी गयी । वि.सं. २०२० साल में सेन्ट्रल जेल में बन्दी रहे भरत गोपाल झा को मार दिया गया । २०१९ साल में बारा के हरि सहनी मल्लाह, परीक्षण ठाकुर लोहार, मोहन शाह कानू, रामचन्द्र महतो कोइरी और रौतहट के सुखारी हजरा पासवान शहीद हुए । इसी दौरान वि.सं. २०१९ साल आश्विन २४ गते धनुषा के सम्सी में शिवचन्द्र मिश्र शहीद हुए । रौतहट के जलील मियां को वि.सं. २०१९ साल में गिरफ्तार कर २०२० साल में बीरगंज जेल में मारा गया ।
वि.सं. २०१८ के वाद पंचायती व्यवस्था के विरुद्ध का आन्दोलन में बडी तेजी आई । पूरे देश के साथ मधेस में भी हजारों लोग गिरफ्तार किये गए । सैकड़ोें की संख्या में लोग भारत प्रवास में गए । नेपाली कांग्रेस के साथ तथा अन्य प्रतिबन्धित संगठनों से संलग्नता के आरोप में मधेसी समुदाय के कई व्यक्ति बर्षों तक जेल में रहे । झापा के तुरसा हेमरम सतार, गुलुम राजवंशी, डिगेन्द्र राजवंशी, मंगल मर्दी सतार, चेर्खा टुडु सतार, छेना सतार, छोटका सतार, गोपाल सतार, घुमा सतार, देनावास्के सतार, नारायण सतार, मोरंग के गौराचन्द्र वेरा बंगाली, हदराज बोहरा, शिवेस्वर मण्डल, उमेश गिरी, डा. चन्द्रनारायण मल्लिक, युगल किशोर राय, किशोर सिंह खवास, ज्ञानलाल सिंह खवास, यदुनन्दन गच्छदार, बिजय सिंह खवास, चेत नारायण खवास, हरिनारायण चौधरी, जोगीलाल यादव, सुनसरी के सुकदेव मेहता, नकछेदी महत्तो, बिजय गच्छदार, सुलेमान मियां, लक्ष्मण मेहत्ता, खुशीलाल चौधरी, गुलेस्वर खवास, लक्ष्मण साह हलुवाई जैसे लोग लगातार वर्षौं तक जेल में रहे । सप्तरी जिला के इन्द्रदेव सिंह, रामराजा प्रसाद सिंह, गंगाधर झा, चन्द्र शेखर झा आजाद, मधुकान्त सिंह, खुशीलाल मण्डल, अनिस अंसारी, भोला ठाकुर, डा. दिवाकर दत्त, गणपति मण्डल, राजेस्वर प्रसाद साह, जय प्रकाश आनन्द, मधुरी मुसहर, जगन्नाथ दास, विश्वनाथ गुप्ता, जय सुन्दर यादव, खुशीलाल सदा मुसहर, झमेली सदा मुसहर, धनेस्वर सदा मुसहर आदि बर्षों तक जेल में रहे । श्रीकांत मंडल, कमल सहनी, गंगाराम साह, विश्वेस्वर साह, लाल बहादुर राय, बीरेन्द्र सिंह ननकू, रघुनन्दन गुप्ता, कुसुमलाल कामी लगायत के व्यक्ति कई बर्षों तक जेल तथा भारत प्रवास में रहे । रँज्ाँ के आदेश से सैकड़ों लोगाें की सम्पत्ति को जब्त किया गया । मधेसी समुदाय से धनुषा के ज्ञानीशंकर गिरी, निर्गुण यादव, रामचन्द्र अधिकारी, मौना धामी, राजदेव यादव, महन्थ यादव, बहरु यादव, कपिलेस्वर झा, महोत्तरी के रामचन्द्र सिंह, जोगेन्द्र सिंह, महावीर सिंह, भद्रकाली मिश्र, चिन्ताहरण सिंह, सियावरण, सप्तरी के जुगेश्वर गुप्ता, रामेस्वर प्रसाद सिंह, केदार प्रसाद सिंह, देवनाथ दास यादव, रामएकबाल, सुनसरी के रामेस्वर यादव, मोरंग के सुलेमान मियां, झापा के तुरसा हेमरम सतार, रौतहट के रामस्वरुप यादव, बृषनन्द वर्मा, शेख अब्दूल मजीद, शेख इद्रिस, शेख फरमान, सर्लाही के रामचन्द्र राय, पर्सा के केदार गिरी, रामजनम तिवारी, बारा के भागवत प्रसाद यादव, रुपन्देही के काशीप्रसाद श्रीवास्तव जैसे लोगों की सम्पूर्ण सम्पत्ति को सरकार ने जब्त कर लिया । सिरहा के सूर्यनाथ दास यादव, नथुनी सिंह दनुवार, प्रमोद ठाकुर, बलदेव दास यादव जेल में रहे । धनुषा के महेन्द्र नारायण निधि, ज्ञानीशंकर गिरी, विमलेन्द्र निधि, दिगम्बर राय, स्मृति नारायण चौधरी, महादेव साह, रामचन्द्र मण्डल, राम इकवाल मण्डल, जगदीशचन्द्र गुप्ता, बृषेशचन्द्र लाल, महेशशंकर गिरी, रविन्द्र ठाकुर, राम नारायण मण्डल, चन्द्रेस्वर मण्डल केवट, चन्द्रदेव ठाकुर, देवली मण्डल धानुक, राजेश्वर ठाकुर बडही, महोत्तरी के महन्थ ठाकुर, महेस्वर प्रसाद सिंह, महेन्द्र कुमार मिश्र, सुरेश आजाद, रामचन्द्र तिवारी, सर्लाही के राम जीवन सिंह भूमिहार, भीखारी मंसुर, रामचन्द्र राय यादव, बिजय प्रताप सिंह, रौतहट के शेख इद्रिश, शेख फजले हक, चन्द्रशेखर प्रसाद ठाकुर, भरत प्रसाद यादव, बिन्दा सहनी, परदेशी राउत कुर्मी, भगल साह कलवार, मगनी साह तेली, सूर्यराय यादव, बारा के युगल किशोर चौधरी, भोला मियां ठकुराई, भिखारी पण्डित, राम बिलास गुप्ता कलवार, रामजनम बड़ही, श्याम किशोर कुसवाहा, पर्सा के दुःखा सहनी, आत्माराम ओझा, डा. जमुना प्रसाद, रामजनम तिवारी, सुरेन्द्र चौधरी, मगनी साह, गोपाल राउत कुर्मी, विश्नाथ महतो कोइरी, लोचन हजरा दुसाध, चितवन के बलराम बंगाली, नवलपरासी के नरबहादुर चौधरी, रुपन्देही के लाल चौधरी, टेनइ चमार, पल्टन थारु, काकुर नाउ“, बिव्रmम थारु, दांग के अशोक कुमार चौधरी, बांके के हिरा सिंह पंजाबी जैसे मधेसी समुदाय के लोगों ने कई बर्ष तक कठोर कारबास का सजाय भोगा । यह तो एक अपूर्ण तथ्यांक है, जिस का उल्लेख स्मरण के आधार पर यहां किया गया है । पंचायत व्यवस्था के दौरान जेल जाने बाले मधेसीयों का संख्या इस से कई गुणा ज्यादा है । इस पर खोज करना होगा । व्
क्रमशः अगले अंक में पढेंÞ ःमधेशी युवाओं का अतुलनीय बलिदान

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