राज्य उत्तर-दक्षिण ही होना चाहिए:प्रा. डा. चैतन्य मिश्र

प्रा. डा. चैतन्य मिश्र
समाजशास्त्री

नेपाल में अभी जातीय अधार में संघीय राज्य निर्माण करने पर बहस जारी है। संघीयता कहने पर जात, जगह, इस आधार पर नक्सा बनाने का काम चल रहा है। जनसंख्या शास्त्री, भूगोलशास्त्री, मानवशास्त्री, पत्रकार सभी जनसांखिक आधार पर नक्सा बना रहे है। मगर यह तो साधन मात्र है, साध्य नहीं है।
जातीय बातें परिवर्तनशील होते है। यह जातीय भिन्नता दैवीय नहीं है, प्राकृतिक है। सामाज ने राज्य व्यावस्था और सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था को जन्म दिया है। सामाजिक रुप में इन चिजों को सृष्टि हर्ुइ तो इन को घटना-बढÞाना भी समाज ही कर सकता है। खास राजनीतिक व्यावस्था, खास सामाजिक और आर्थिक नीति द्वारा इस असमानता को न्यून किया जा सकता है। संघीयता में हमें जाना चाहिए, यह ठीक है मगर जातीय संघीयता ठीक नही हैं। क्योंकि प्राकृतिक रुप से हम फरक नहीं है। एक ही जगह में हम लोग अनेक जाति के लोग रह सकते है, काम कर सकते है, आपस में शादी विवाह कर सकते है तो जाती के आधार पर संघीयता क्यों –
अभी हम लोग राज्य पर्ुनर्सरचना को विलकुल संकुचित बनाकर संघीयता में ले जा रहे है। उस में भी जातीय संघीयता में सिमित कर रहे है। ऐसा करना विलकुल गलत है। संघीयता एक पक्ष है। मगर अर्थतन्त्र कैसे बढावा दिया जाए, रोजगारी को कैसे बढाया जाए, आदी महत्वपर्ूण्ा प्रश्न है। मजबूत अर्थतन्त्र, रोजगारी वृद्धि आदि से जातीय भेदभाव को घटाया जा सकता है। हम लोगो के यहाँ लम्बे समय से उच्च जाति का वर्चस्व रहा। यद्यपि कतिपय उच्च जाति के लोग विल्कुल गरीब भी है। कर्ण्ााली में जा कर देखिए। मगर राजनीति, सरकारी सेवा लगायत में उच्च जाति के पहुँच रही। संस्कृति में भी वही हाबी रही मगर यह खास परिस्थिति की बात है। राजतन्त्र स्वयं एक उचच कूल वंश, जात और परम्परा में आधारित राजनीतिक संरचना था। अब हम सन् २००६ से उस राजनीतिक व्यावस्था से बहुत दूर जा चुके है। अभी की चुनाव प्रक्रिया समावेशी चुनावी प्रक्रिया से विभिन्न जात-जाति वाले लोग खुलकर राजनीति में आ सकते है। इस लिए जातीय आधार में ही संघीयता बनाना विल्कुल उपयुक्त नहीं होगा।
पहचान और सामर्थ्य की बात करते है। कितने तो सिर्फपहचान को जोडÞ दे रहे है। मगर सिर्फइन दोनों की बात नहीं है। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय एकता को कहाँ रखिएगा – राष्ट्रीय एकता अन्तर्रगत सामर्थ्य और सहचान को राखना चाहिए। राष्ट्र को कैसे अक्षुण रखा जाए, राष्ट्रीय एकता कैसे और मजबुत हो, इस बात को सबसे ज्यादा महत्व देना चाहिए। उसी तरह से लोकतन्त्र को दाव में रख कर सामर्थ्य और पहचान नहीं, राष्ट्रीय एकता, लोकतन्त्र, आर्थिक विकास अर्न्तर्गत सामर्थ्य और पहचान होना चाहिए।
भारत और चीन दोनों हमारे र्सवकालिक और शक्तिशाली पडÞोसी है। हम लोगों की संघीयता ऐसी होनी चाहिए, जिससे दोनों महाशक्ति के साथ कदम मिलाकर चल सके। मर्ूत शब्द में कहा जाए तो हमारी संघीयता प्रान्त के तह में उत्तर-दक्षिण की ओर होनी चाहिए। तीसरे तह में जाने पर हम भाषा की बात कर सकते है, लिम्बु, गुरुंङ, मैथिली नेपाली आदि आदि। यह प्राप्त से नीचे की बात हर्ुइ। अभी तो हम केन्द्र और प्राप्त के बात कर रहे है। उस के नीचे नहीं पहुँच रहे है। पहचान की बात तीसरे, चौथे पैदान पर जा कर की जा सकती है। दक्षिण अप्रिmका में भी ऐसा ही किया गया है। वहा दस आधार बनाए गए थे। उन में से सिर्फजातिय आधार के थे, जिस में भाषा और स्थानीय बहुल्यता को स्थान दिया गया था। संसार की इतिहास में सबसे बढी फुटवाली सरकार ने कानूनी रुप से रंगभेद दिखाने पर भी काले और गोरे लोग अलग-अलग नहीं बैठे। काले ने कभी यह माँग नहीं की कि गोरों को अलग रखा जाए। हम लोगों को यहाँ तो इतना बढा विभेद नहीं है। फिर जातीय आधार पर विभाजन क्या जरुरी है –
जातिय कहने पर वंश की बात आती है। इससे आदमी रक्त, वर्ीय आदि की बात तक पहुँचता है। हम लोगों को इससे ऊपर उठना चाहिए। इसलिए तो हम ने राजा और राजतन्त्र को फेंका है। वंश और कुल भी रखेंगे और लोकतन्त्र में भी जाएंगे यह दोनों एक साथ नहीं हो सकता। लोकतन्त्र का मतलव ही है जातीयता को फेकना। जातीय अहंकार और उत्पीडन को फेकन। लोकतन्त्र में दलित और ब्राम्हण नहीं होते है, सिर्फनागरिक होते है। इसीलिए संघीयता कहने पर वंश और जातीयता का आधार नहीं, भाषागत आधार भी नहीं, -क्योंकि भाषा कोई सिख और पढÞ सकता है) यह तीसरे पायदान पर आनेवाली बात है। पहचान, सामर्थ्य आदि की बात ठीक है, मगर इसको अग्रभाग में रखना उचित नहीं है। हम लोग असमान पहचान की बात कर रहा है, जिससे हटाना जरुरी है। उसके लिए जातीय राज्य बनाना आवश्यक नहीं है।
हमें नदी, जंगल, उर्वरा भूमि चाहिए। विभिन्न जगह में विभिन्न स्रोत साधन उपलब्ध है, जिन्हे एकीकृत करना होगा। एकीकरण से उत्पादकत्व बढÞेगा। राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रुप में भी समन्वयात्मक होगा। इसलिए मेरो विचार में केन्द्र के बाद राज्य सब उत्तर-दक्षिण ही होना चाहिए। नाम कुछ भी रखा जा सकता है। पर्ूव में लिम्बुवान कहने पर भी चाहे कोशी कहने पर भी चलेगा। मगर वह राज्य एकल जातीय नहीं होना चाहिए। वास्तव में वहा बहु जाति के लोग रहते है। उन लोगों को वहा से हटाकर हम कहा लेजाएंगे – सब से निचले तीसरे और चौथे पायदान में जातिबहुल जिला को स्वायत्त क्षेत्र वा जिला बनाया जा सकता है।
उत्तर-दक्षिण राज्य बनाते समय मधेशी सब को विखण्डित किया हुआ जैसा दिखेगा, मगर वहाँ मैथिल भाषी लोग बहुसंख्यक हो सकती है। इसलिए मधेश कहते बख्त मैथिल वा अवधि जिला के रुप में पहचाने जा सकते है। हम लोग वंश, कुल छोडÞने की हिसाब में ही गए है। नहीं तो श्रीपेच लगानेवाले राजा को क्यों हटाया गया – अब वंश और कुल छोडÞने को प्रक्रिया को तीव्रता मिलना चाहिए। नागरिकत्व को सघन बनाना और जन्म लेते ही प्राप्त होने वाले अधिकारों को प्रष्ट रुप से संघीयता वाले संविधान में दिखाना चाहिए।
मेरे विचार में चार से छह तक प्रान्त उपयुक्त होगा। काठमांडू को अलग ही बनाना हो तो छह नहीं तो चार वा पाँच प्रान्त उपयुक्त होगा। राज्य का काम भारत और चीन से डिल करना, हिमाल, पहाड और तर्राई का संयोजन करना और राष्ट्रीय एकता के लिए काम करना, जो उत्तर-दक्षिण रुप में उचित रहेगा। पहचान, जातीयता, भाषा, संस्कृति का आधार तीसरे, चौथे तह में रखना चाहिए। ±±±

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