राज्य द्वारा उपेक्षित दलित बस्ती ने दिखाया नमूना

कैलास दास
मजदूरी और चूहे के बिल से धान निकालकर जीवन चलाने वाला मुसहर समुदाय में ऐसी जनचेतना आएगी ये किसी ने सोचा भी नहीं होगा । जिस समुदाय को नेपाल सरकार ने वि.सं. २०१७ साल में जिला सदरमुकाम से ३० किलोमीटर उत्तर और राजमार्ग से १० किलोमीटर पूर्व में ‘दलित बस्ती’ नामकरण कर बसाया था । उस समय वह जगह बाढ क्षेत्र और खेत योग्य भूमि मात्र थी । गाँव के उच्च कोटि के लोगों के दिलों में उनके लिए छुआछुत की भावना थी और जिनके साथ उनका अभद्र व्यवहार हुआ करता था । आज उसी समुदाय ने अपने बस्ती में ऐसा सन्देश दिया है कि वो जिला के नमूना बस्ती के रूप में जाना जा रहा है ।
पाठको में जिज्ञासा अवश्य बढ़ी होगी कि वो कौन सा जिला और कौन सी बस्ती है । तो वह है—महोत्तरी का गाँव विकास समिति हतिसर्वा ७ का श्रीनगर टोल । वहाँ पर बिजली बत्ती तो क्या सवारी साधन तक नहीं जाती है और न कोई रास्ता ही है । सीमित सरकारी जमीन में फिलहाल ५० बस्ती है और उनकी जनसंख्या ४ सौ है । मुसहर समुदाय दिन भर मजदूरी करते हंै और अपना पेट भरते हैं । लेकिन वि.सं. २०६६ साल से निरन्तर रूप में अपने बच्चो को विद्यालय अवश्य भेज रहे हंै । अपना घर कचड़ा रखकर सड़क साफ करनेवाला समुदाय आज शिक्षा और सफाई के मामले में एक पहचान बना चुकी है ।
उन लोगाें के लिए इससे पहले न तो राज्य ने शिक्षा पर जोर दिया था और न ही वहाँ पर राजनीति करनेवाले नेतागण ने । स्थानीय उपेन्द्र महरा का कहना है कि एक गैर सरकारी संस्था ‘आफन्त नेपाल’ के प्रतिनिधि जय प्रकाश मण्डल हमारे बस्ती में आया और कहा कि तुम लोग जमीन उपलब्ध करा दोगे तो हम इस बस्तीवालो के लिए विद्यालय निर्माण करबा देंगें । लेकिन हम लोग मजदूरी कर खानेवाले व्यक्ति को शिक्षा से क्या लेना देना । फिर उन्हाेंने हम लोगो को सफाई और शिक्षा के बारे में जनचेतना बढ़ाया और विद्यालय निर्माण के लिए इस गाँव के कुछ लोग सिग्याही ८ के रहने वाले पप्पु यादव से आग्रह किया और उन्होंने २०६६ साल में दो कठ्ठा जगह विद्यालय के लिए सहयोग में दिया हैं जिनमें गैर सरकारी संस्था आफन्त नेपाल ने १६ लाख आर्थिक सहयोग में तीन भवन निर्माण किया है ।
शिक्षा, राजनीति और सफाई का शब्द तक नही सुना था यहाँ के मुसहर समुदाय ने । दिन रात चूहे के बिल से धान निकालने वाला मुसहर समुदाय अब उतना ही सफाई और शिक्षा में लीन हो चुका है । उस बस्ती से एक सौ १० बालबालिका नित्यदिन विद्यालय जाते हैं । अब विद्यालय के अलावा सफाई में भी उतना ही ध्यान रखते हैं । उन लोगों की झोपड़ी टूटी—फूटी है । बरसात में पानी सीधे घर में जाता है, लेकिन प्रत्येक घर के आगे एक शौचालय अवश्य निर्माण किया गया है । खुला मैदान होने के वावजूद भी इस बस्ती के लोग शौचालय में ही नित्य क्रिया करते हैं । यह छोटी बस्ती है लेकिन अभी तक राजनीतिक भाइरस मुक्त है । इतना बड़ा मधेश आन्दोलन हुआ है किन्तु यहाँ के लोग मधेश आन्दोलन से बिलकुल अनभिज्ञ हैं । इस बस्ती के लिए निर्माण किया गया श्रीनगर सामुदायिक विद्यालय में प्रत्येक दिन पढ़ाई होती है ।
बस्ती से करीब दो सौ मीटर दूरी पर यह विद्यालय निर्माण किया गया है । वैसे इस विद्यालय तक जाने के लिए भी सड़के तक नही है । खेतों की पगडण्डी होते हुए बच्चे विद्यालय जाते हं । इस विद्यालय में तीन वर्ष से लेकर १८ वर्ष के बालबालिका पढ़ते हैं । हमेशा धूल और मिट्टी में खेलनेवाले मुसहर समुदाय के बच्चे फिलहाल कलम काँपी लेकर विद्यालय जाया करते हैं । आज मधेश में बहुत सारे दलित बस्ती हैं लेकिन यह बस्ती एक नमूना बस्ती के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है ।
मुसहर समुदाय के रामपलटन सादा कहते हैं ‘दैनिक मजदुरी करके लाते थे और परिवार चलाते थे । इतना फुर्सत कहाँ था कि पढ़ाई लिखाई पर ध्यान दें । पढ—लिख भी लिया तो कौन हम लोगो को नौकरी देगा । अभी तक राज्य का एक भी निकाय इस बस्ती के लोग कैसे रहते हैं यह देखने तक नही आया है, तो नौकरी की आस कैसे रखें । किन्तु जब विद्यालय निर्माण के लिए सदरमुकाम कार्यालय में दौड़धूप करना पड़ा तो हम लोग शिक्षा और सफाई क्या होती है समझे ।’ इस बस्ती के प्रत्येक घर से बालबालिका विद्यालय जाते हैं । वह आगे कहते हैं ‘हमें चिन्ता है कि कक्षा पाँच तक जैसे तैसे अपने बच्चों को पढ़ा—लिखा लेगें, लेकिन इससे आगे कौन देखभाल करेगा ।’
महोत्तरी क्षेत्र नं. १ में यह बस्ती है जहाँ से शरदसिंह भण्डारी और गृहराजमणि पोखरेल चुनाव जीतकर जाते हैं । यह भी नही है कि यह बस्ती बडेÞ राजनीतिकर्मी से अछूता है । चुनाव में यहाँ पर बड़े—बड़े नेतागण वोट मांगने आते हंै, कुछ लोभलालच देकर विजय होकर जाने के बाद एक बार भी पलटकर नही देखा है । हम लोग शरद सिंह भण्डारी, गृहराजमणि पोखरेल सहित के नेताओं को वोट दिया है । सभी यहाँ से चुनाव जीतकर जाने के बाद घूमकर भी नही देखा है दलित बस्तीवालों का आरोप है ।
स्थानीय मुक्को देवी सादा का कहना है कि ‘आफन्त नेपाल हम लोगों के लिए विद्यालय, शौचालय तो बना दिया है । लेकिन अब सबसे बड़ी समस्या यहाँ पर बिजली और सड़क की है । इस बस्ती में आने के लिए दो—दो नदियाँ पार कर आना पड़ता है । खासकर बरसात में आने—जाने में सबसे बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ता है । टूटे—फूटे घर में किसी प्रकार रह जाते हैं लेकिन सड़क और बत्ती बिना बड़ी मुश्किल है ।
फिलहाल इस क्षेत्र से जीतकर गए एमाओवादी नेता गृहराजमणि पोखरेल शिक्षा मन्त्री हैं । शिक्षा और सफाई में दलित बस्ती महोत्तरी और धनुषा के लिए भी नमूना बस्ती होने के वावजूद भी राज्य का ध्यान नहीं गया है । करीबन दो सौ से ज्यादा वोट यहाँ पर है । १० वर्ष के दरमियान में एक सार्वजनिक दलान निर्माण किया गया है ।
धनपत सादा कहते हंै ‘कागज में तो बहुत बार हस्ताक्षर हुआ है । लेकिन किस कार्य के लिए मालुम नही । जो भी नेता यहाँ आए है हम लोगो को प्रशंसा करने से नही चूकते हंै । अपना फोन नम्वर भी लिखा देते है लेकिन फोन करने पर अभी तक एक बार भी नही उठा है ।’ बाबा—दादा जो पेशा करते थे अब उस पेशा से परिवार चलाना मुश्किल है । पहले जैसी जमीन्दारी प्रथा है नही कि किसी में कामधन्धा करके जीवन कट जाऐगा । पुर्खौली पेशा को निरन्तरता देने पर हम लोग भूखे मर जाएँगे । अब शिक्षित होकर नौकरी करना चाहते हैं । समाज में अच्छा व्यक्ति बनना चाहते हंै । शिक्षित बनकर अधिकार लेना चाहते हंै ।

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