राज्य पूनर्संरचना की नेपाली बहस और मधेश का भविष्य : कैलाश महतो

कैलाश महतो, पराशी,१३ अगस्त | भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के दुरदर्शी लोकमान्य योद्धा बाल गंगाधर तिलक ने कहा था, “स्वतन्त्रता में ही विकास अन्तर्निहित है । स्वराज के बिना औद्योगिक विकास संभव नहीं, न तो कोई शैक्षिक क्रान्ति ही लाभदायी होगा । …सामाजिक सुधार के तुलना में आजादी के लिए योगदान देना ज्यादा महत्वपूर्ण है ।”
“सम्मानित विकास के लिए स्वतन्त्रता को प्रथम स्थान मिलनी चाहिए ।” अमत्र्य सेन (भारतीय विद्वान् एवं अर्थशास्त्री)

Oxford के Concise Dictionary of Politics के अनुसार, “Freedom is the absence of interference or impediment.”

Gerald Mac Callum के अनुसार, “Freedom can be cast in the same form- A is free from B…”
उपरोक्त उद्धरणों से प्रष्ट होता है कि स्वतन्त्रता क्या होती है और इसकी आवश्यकता क्यूँ होती है । कुछ विश्लेषकों को मानें तो आज भी भारत किसी न किसी रुप में अंग्रेजों के ही पञ्जों में होने की बात कही और सुनी जाती है ।

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अगस्त १०, २०१६ के दैनिक भाष्कर के अनुसार भारत को आजाद हुए ६९ साल गुजर जाने के बाद भी १०० साल पहले अंगे्रजों द्वारा अमरावती से मिर्जापुर के १८९ कि.मी के दुरी पर शकुन्तला एक्सप्रेस नामक एक रेल की शुरुवात की गयी थी, और ताज्जुब की बात यह है कि अंग्रेजों ने जिस स्तर पर रेल की शुरुवात की थी, जिस तरीके से अंग्रेजी अधिकारी उसकी निरीक्षण किया करते थे, आज भी वह स्तर और तरीका कायम है । उतना ही नहीं, उस दैनिक के अनुसार हरेक वर्ष भारत सरकार को आज भी १ करोड २० लाख की रोयल्टी ब्रिटेन के एक प्राइवेट कम्पनी को देनी पडती है जबकि अंग्रेजों के शासनाधिन रह चुके फ्रान्स, अमेरिका और हंगकंग लगायत के देशों ने उसके सारे पोलिसी तथा प्रकियाओं को पूर्ण रुपेण खारेज कर अपनी पोलिसी और सिस्टम को लागू कर लिया है । वह संभव इसलिए हुआ, क्यूँकि उन देशों के जनता और नेतृत्व एक दुसरे के साथ रहे ।
भारत में ही जे.एन.यू के छात्र कन्हैया आजादी की बात कर रहा हैं तो दिल्ली के मुख्यमन्त्री आज भी स्वराज की तलाश में हैं । अंग्रेजों द्वारा भारतीय प्रहरीयों के हाथों मेें थमाये डण्डे और किसानों से लगान वसूल करने के लिए बनाये गये कलेक्टर आज भी उसी पोज में दिखते हैं । इसिलिए एक अंग्रेजी पत्रकार “अंग्रेजों ने भारत से क्या लिया और क्या दिया ?” के सवाल पर तत्कालिन भारतीय प्रधानमन्त्री श्रीमति इन्दिरा गाँधी ने कहा था, “अंग्रेजों ने हमारी असंख्य बहुमूल्य सम्पत्तियाँ ले गयीं, मगर हमें उन्होंने रेल और शासन तथा प्रशासन के तरीके दे गये जिसके बलपर आज भारत प्रगति पर है । भारत ही एक ऐसा देश है जो जेराल्ड म्याक क्यालम के अनुसार ए से बी को पूर्ण स्वतन्त्र नहीं होने देने की राह अपनायी है । और हो सकता है, इसी कारण भारत भले ही अमेरिका, जापान, अफ्रिका, यूरोप या फिर ब्रिटेन नीतियों में पूर्ण सफल हों, मगर अपने पडोसियों के साथ के नीति में असफल रही है ।

कुछ ही विगत के नेपाली सरकारों द्वारा अनावश्यक रुप में बढाये गये नगरपालिकाओं के संख्या से पहले रहे ३,९०५ गा.वि.स.ओं को हाल फिलहालों के सरकारों द्वारा ५६५ या १,००० के संख्या में लाकर गाँवपालिका बनाने का ढाँचागत प्रस्ताव लाने की बात सुनी जा रही है । वैसे ही, राज्य पूनर्संरचना अन्तर्गत नगरपालिका के लिए हिमाली क्षेत्रों में २५,०००, पहाडी क्षेत्रों में ५०,००० और मधेश(तराई) में ९५,००० जनसंख्या रहने की बातों को मसाला बनाने की संभावना प्रवल है जिसे एमाले और माओवादी केन्द्र ने लगभग तैयारी कर ली है । क्यूँकि ओली के सरकार ने ही इस ढाँचे को निर्माण किया है जिसमें माओवादी भी सामेल रहा है । काँग्रेस की जहाँतक बात है तो वह एक चारा मधेश में फेकने का काम कर रहा है कि इन ढाँचों पर पूनर्विचार किया जायेगा । वह यह ढाँचा मधेश विरोधी होने की बात नहीं कहता है ठीक वैसे जैसे ओली के सरकार में अपने शक्ति बहादुर को गृहमन्त्री बनाकर प्रचण्ड ने मधेशियों को जानवर के तरह हत्या करबाया और आज उसी प्रचण्ड को मधेशी नेता अपना आला अधिकारी मानकर उनके छत्रछायाँ में सत्ता पाने की ख्वाहिस बनाये बैठे हैं । संविधान में मधेशियो का गला काटकर संविधान घोषणा करने बाले मधेशद्रोही विद्वान् नेता बाबुराम भट्टराई मधेशियों को उल्लू बनाने मधेश चले हैं और कहते फिरते हैं कि मधेश का ही नहीं, नेपाल के आदिवासी भी मधेशी ही हैं । और उन्हें मधेश में स्वागत करवाने में मधेश के ही क्रान्तिकारी नेतागण मौजुद हैं ।
और यह निश्चित है कि काँगे्रस भी वही करेगा जो ओली और प्रचण्ड ने कर चुका है । हाँ, कुछ संसोधन होगा । ५६५ को ७६५ करेगा या १,००० को १,२०० करेगा और मधेशी नेता सही छाप मारेगा, सत्ता भोगेगा और मधेशी जाए भाँड में । और यह जब होगा तो मधेशियों को कंगाल बनना निश्चित हो जायेगा । गाँवपालिका और नगर पालिका के नाम पर जर्जर होते जा रहे किसान, घाटे के शिकार होते जा रहे व्यापारियों तथा बेरोजगारी के चपेटे में रहे मधेशी यूवाओं को समान्य से कार्यालीय कामों के लिए भी कोशों दुर कार्यालय जाना पडेगा । अधिकारियों के तलबे मालिश करने पडेंगे । समय नष्ट करना होगा । यातायात के साधनों में थप लगानी करने होंगे । घुस का मात्रा बढेगा । उन दयनीय मधेशियों के उपर उनके देहाती जीवन के बावजुद अनेकों प्रकार के करों के मात्रायें बढाये जायेंगे । हर गाँवपालिका में पहाडों से नेपाली कर्मचारियों को मधेश में लाया जायेगा । भ्रष्टाचार का दायरा बढेगा । मधेशी उनके शिकार जल्द ही हो जायेंगे और मधेश तथा मधेशियत को चन्द वर्षों में समाप्त कर दिया जायेगा । मधेशियों का भविष्य वैसा ही होना तय है जैसे वर्मा के रोहिंग्या समुदाय के हुए हैं अगर मधेशी सचेत नहीं हुए तो ।
बिते कुछ दिनों में हुए बातचित के अनुसार गैर मधेशी दलों में रहे कुछ मधेशी नेताओं का कहना है कि मधेशियों के अस्तित्व की जब बात आयेगी तो वे नेपाली दलों को छोड कर मधेश के साथ हो जायेंगे । सबाल अब यह उठता है कि मधेश विरोधी संविधान बनना, समानुपातिकता और समावेशिता के लिए आवाज उठाने तथा आन्दोलित होने बाले सैकडों मधेशियों को गोली मारना, मधेश के ही जमीन पर रहे वन जंगलों से मधेशियों को बेदखल करना, मधेश के नदियाँ मधेश को ही नसीब नहीं होने देना, मधेश के भंसार लगायत के सम्पूर्ण कार्यालयों को कब्जा करना, व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका लगायत सुरक्षा अंगों में अघोषित रुप से मधेशियों पर बन्देज लगाना, मधेशियों को अवसरहीन बनाना, मधेशी यूवाओं को विदेश में भी कमजोर अवसर उपलब्ध करवाने का माहौल रचना, मधेश के कृषि, व्यापार तथा शिक्षा का धरातल कमजोर करते जाना, मधेश के पाकृतिक श्रोत एवं साधनों पर गैर मधेशियों का राज होना, मधेश की जमीन ही नहीं, अपितु उनकी भाषा, संस्कृति, रीतिरिवाज, सम्मान, पहचान तथा आत्म सम्मान का धजियाँ उडाना, मधेश में अनावशयक बसाई सराई कराकर उसके वातावरण एवं पर्यावरणों को बिमार करना, यातायात के साधनों में मधेशियों को आज भी प्रताडित होना, बडे बडे तकनिकी शिक्षण संस्थान मधेश से बाहर खोलना और जमीन मधशियों का, लेकिन इसका पूनर्संरचना नेपालियों द्वारा होना क्या मधेश के अस्तित्व के खिलाफ नहीं है ?
हमें अपने अस्तित्व के रक्षा करने एवं विकास को अपने अनुसार अपने लिए आरम्भ करने हेतु हमें अमेरिका बनना होगा, फ्रान्स बनना होगा, चीन बनना होगा जिसने अपने उपर रहे उपनिवेश के सारे तन्त्रों को खारेज कर अपना फ्रान्स बनाया, अग्रेजीविहीन अमेरिका बनाया और चीन का अपना सिस्टम बनाया ।
किसी समाज, समुदाय या धर्म की अस्तित्व और विकास स्वतन्त्रता से बचती है परतन्त्रता में नहीं । हम विचार करें, निकास खोजें और निर्णय लें ।

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