राज्य विप्लव, राज्य द्रोह, देश द्रोह तथा राउत का स्वतन्त्र मधेश : कैलाश महतो

march-4

पृथ्वीनारायण शाह ने सिर्फ गोर्खा राज्य का विस्तार किया, एकीकरण नहीं । शाह के विस्तारीकरण नामक एकीकरण से सैकडों गुणा सहानुभूतिपूर्ण शासन भारत में अंगे्रजों का रहा जिसने भारत के भौतिक वैभवों को लुटने बावजुद वहाँ के भाषा, संस्कृति, परम्परा, रीतिरिवाज, रहनसहन, खानपान आदियों को संरक्षण दिया, उनका अनुसंधान किया और बढावा दिया । मगर शाह ने तो मधेशियों के राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, भाषीय लगायत सारे वैभवों को मिटाने का षडयन्त्र ही किया ।
कैलाश महतो,परासी, २० फरवरी | मधेश, नेपाल तथा विश्व के कैयन देशों में मधेश और डा.सि.के राउत की चर्चा गरम होता जा रहा है । एक अति समान्य परिवार में जन्में चन्द्रकान्त राउत आज एक तरफ नेपाली शासन की निन्द उडा दी है, वहीं मधेश के नाम पर लुट खा रहे जमातों के रास्तों का काँटा बनता सावित हो रहा है तो तीसरे ओर विश्व के वे नामुद देशों के कानों के नैतिक धरातलों पर हथौडें पडने लगे हैं जिनके कारण मधेश आज चरम उपनिवेश का शिकार बना हुआ है ।
नेपाली राज्य और उसके सारे आयाम इतने बौखला गये हैं कि अगर राष्ट्रिय तथा अन्तर्राष्ट्रिय मानव अधिकार संस्थाये नहीं होते तो हिटलर के तरह मधेशियों को दहकते आग के भट्ठियों में जला देते । मधेश के विद्वानों द्वारा हस्त लिखित हजारों साहित्य और ऐतिहासिक दस्तावेजों को पृथ्वीनारायण शाह द्वारा भष्म किए जाने के बाद अपने इतिहास के अभाव में दास, गुलाम और औपनिवेशिक जीवन जीने को बाध्य मधेशियों ने डा.राउत के वैज्ञानिक खोजों के साथ अब स्वतन्त्र मधेश की माँग करने लगे हैं ।
स्वतन्त्र मधेश की माँग सिर्फ माँग ही नहीं, यह एक आन्दोलन भी है । यह आन्दोलन बिल्कुल शान्तिपूर्ण है । यद्यपि नेपाली शासक इसे बदनाम करने के लिए अनेक आरोप लगाने तथा उसे सावित करने के भ्रामक प्रयास भी कर रहे हैं । इस न्यायपूर्ण आन्दोलन को बदनाम करने के कोशिशों में सबसे ज्यादा नेपाली मीडिया आगे हैं । इस आन्दोलन का थप जिम्मेबारी यह भी बन गया है कि यह नेपाली मीडियों को भी विश्व के सामने नंगा करें ।
स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन के आन्दोलन को नेपाल सरकार राज्य विप्लव, राज्य द्रोह तथा देश द्रोह का पैजामा पहनाने के कोशिश में हैं ।
क्या हैं ये राज्य विप्लव, राज्य द्रोह तथा देश द्रोह… ? नेपाली तथा विश्व के कुछ चर्चित शब्द कोषों के अनुसार ः–
राज्य विप्लव ः यह वह अवस्था है जब कोई व्यति या समूह किसी राज्य में ध्वंसात्मक कृयाकलाप या राज्य के साथ कोई आतंककारी गतिविधी करता है । मगर सि.के राउत और उनके अभियान इस परिभाषा के तनिक भी नजदिक दिखाई नहीं देते ।
राज्य द्रोह ः राज्य द्रोह राजा महाराजाओं के दरबारी शब्द है । राज्य द्रोह तब माना जाता है जब कोई व्यति या समूह राजा, उसके परिवार, दरबार या फिर उसके राजकीय शासन पद्धतियों के विरुद्ध खडा होता है । परन्तु सि.के राउत का अभियान किसी तानाशाही राजतन्त्र या उसके विरुद्ध न होकर लोकतान्त्रिक गणतन्त्रात्मक राज्य के साथ एक अनुरोधपूर्ण आन्दोलन है जो लोकतान्त्रिक सरकार से यह उम्मीद करता है कि उसके आन्दोलन को समझें । मधेश के इतिहास को अध्ययन करें, विश्लेषण करें और ऐतिहासिक धरातल के आधारों पर मधेश से नेपाली उपनिवेश खत्म करें ।
देश द्रोह ः डा.सि.के राउत का अभियानपूर्ण आन्दोलन किसी भी मायने में देश द्रोह नहीं हो सकता । क्यूँकि देश तब होता है जब विभिन्न राष्ट्र एवं राष्ट्रियताओं को जोडकर एक नयाँ राष्ट्र बनता है या बनाया जाता है । विभिन्न राष्ट्रों की राष्ट्रियता जुडकर एक नयाँ राष्ट्र तब ही बन पाता है जब उस नये राष्ट्र में सारे राष्ट्रियताओं की भावना समाहित होती है । सबके भावनाओं को वह राष्ट्र सम्मान करता है, कदर करता है । सारे वर्ग और समुदायों को अपने आयामों तथा निकायों में भेदभाव बगैर प्रतिनिधित्व करवाता है । तब लोग उसे अपना राष्ट्र मानते हैं और वह देश का दर्जा पाता है ।
देश का मुख्य काम संविधान बनाना, नियम कानुन बनाना, समान रुप में सबों के लिए लागू करना, स्वच्छ चुनाव करबाना, सरकार बनाना, समान और समानुपातिक रुप से लोगों का प्रतिनिधित्व करबाना, समान अवसर का अधिकार देना आदि होता है । जिस भूमि के सरकार द्वारा निर्मित कोई भी कानुन जबतक समान नहीं होता, मौलिक हक अधिकार सबके लिए बराबर नहीं होता, वह भूमि कभी देश नहीं बन पाता है । वह किसी के लिए देश हो सकता है, लेकिन बाँकियों के लिए उपनिवेश ही होता है । और उपनिवेश शासकों के अलावा शासित वर्ग और समुदायों के लिए अभिशाप ही होता है । इसलिए भी लोकतान्त्रिक युग में उपनिवेश होना संसार के लिए चुनौती होना है ।
सन् १८४८ से १८५६ तक इण्डिया में  Governor General रहें Lord Dalhousie को Maker of Modern India भी कहा जाता है । उन्होंने तत्कालिन भारत के ५६२ रियासतों (अलग अलग राष्ट्र÷राज्य) को जोडकर एक विशाल इण्डिया नामक देश बनाया । हकिकत में अंगे्रजों ने जिसे देश कहा, वह देश था ही नहीं या बना ही नहीं । अंग्रेजों ने सारे रियासतों को जोडकर एक देश का नाम इसलिए दिया ता कि उन्हें उनपर शासन करने और उनकी शोषण करने में सहुलियत हो । उन्हें अनेक राज्यों पर अनेक ढङ्गों से शासन और शोषण करने में कठिनाइयाँ हो रही थी । इसिलिए अंग्रेजों ने उपर से एक देश बनाने का नाटक और अन्दर से फूट डालकर एक नाश से सारे भारत वर्ष पर हुकुमत किया ।

Lord Dalhousie द्वारा एकीकृत भारत अगर सही में एक देश बना होता तो भारत आजादी के बाद सरदार बल्लभ भाइ पटेल और नेहरु को उन ५६२ रियासतों के साथ साथ हैदराबाद, जुनागढ तथा जम्मू कश्मिर जैसे राज्यों को पूनः एकीकरण नहीं करना पडता । सन् १९४७ के बाद के एकीकरण ने सम्पूर्ण भारत को भावनात्मक रुप में जोडकर एक विशाल देश बनाया गया । और आज आजाद भारत का उत्पादन है नरेन्द्र मोदी जैसे राज नेता जो दुनियाँ के राजनीतिक मञ्च पर एक राजनीतिक नायक के रुप में स्थापित हैं ।
पृथ्वीनारायण शाह ने Dalhousie के एकीकरण से क्या कुछ फरक किया है ? पृथ्वीनारायण शाह ने सिर्फ गोर्खा राज्य का विस्तार किया, एकीकरण नहीं । शाह के विस्तारीकरण नामक एकीकरण से सैकडों गुणा सहानुभूतिपूर्ण शासन भारत में अंगे्रजों का रहा जिसने भारत के भौतिक वैभवों को लुटने बावजुद वहाँ के भाषा, संस्कृति, परम्परा, रीतिरिवाज, रहनसहन, खानपान आदियों को संरक्षण दिया, उनका अनुसंधान किया और बढावा दिया । मगर शाह ने तो मधेशियों के राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, भाषीय लगायत सारे वैभवों को मिटाने का षडयन्त्र ही किया ।
सि.के राउत को भले ही नेपाली शासन और उसके कुछ मधेशी लोग देश द्रोही, राज्य द्रोही या राज्य विप्लवी क्यूँ न कहें, पर सत्य यही है कि दासों को अधिकार चाहिए और गुलामों को आजादी । मधेश सही में नेपाल का उपनिवेश है और उपनिवेश को मुक्ति हर हाल में चाहिए जो संयुक्त राष्ट्रसंघ के अन्तर्राष्ट्रिय मानव अधिकार चार्टर के धारा १७३ की अवधारणा है ।
वैसे भी देश द्रोह या राज्य द्रोह होता ही नहीं है । होना भी नहीं चाहिए । ऐसे बेतुक की बातें सिर्फ वे करते हैं जो अन्य वर्ग और समुदायों पर अत्याचारपूर्ण शासन करते हैं । अगर देश बनाना अपराध ही है तो ब्रम्हा द्वारा निर्मित एक ही पृथ्वी रुपी महादेश को टुकडा टुकडा कर सैकडों देश बनाने बाले अपराधी क्यूँ नहीं ? जर्ज वासिंङ्गटन, सन् यात्सेन, महात्मा गाँधी, नेल्सन मण्डेला, मोहम्मद जिन्ना, शेख बेअमज्जबुर रहमान, स्यामूएल डी च्याप्लेन आदि पर भी देश द्रोह के मुद्दे लगने चाहिए ।
देश बनाने बाले को सम्मान होनी चाहिए । वे राष्ट्र द्रोही नहीं, अपितु राष्ट्र निर्माता होते हैं । मधेश राष्ट बनना मधेशियों की आवश्यकता है जिसमें नेपाल समेत को सहयोग करना उचित है । सि.के राष्ट्र द्रोही नहीं, राष्ट्र निर्माता हैं । उन्हें राष्ट्र निर्माताओं के श्रेणी में रखा जाना चाहिए । इससे मधेश और नेपाल का सम्बन्ध में मिठास ही पैदा करेगा ।

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz
%d bloggers like this: