राज्य सत्ता ही भ्रष्टाचार का कारण

डा. उदेश्वरलाल दास:भ्रष्टाचार का सम्बन्ध जाति से ज्यादा राज्य सत्ता से बनता है। इतिहास से सीखें और इतिहास में देखें तो जो जातियाँ और सामाजिक समूह सत्ता के तन्त्र और उसके नौकरशाही का हिस्सा बनते रहे हंै, उनमें भ्रष्टाचार का आना एक स्वाभाविक प्रवृत्ति के रुप में दिखता है। प्राचीन राज्य व्यवस्था में इसी को देखते हुए कौटिल्य ने कहा था कि राज्य सत्ता से जुडेÞ सर्ंवर्ग भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। विभिन्न काल और समय में राज्य निर्माण चरमोत्कर्षपर पहुँचा तो वेतन भोगी सेना, पुलिस और भूराजश्व कर संकलन की व्यवस्था को सुदृढÞ बनाया गया। इस प्रक्रिया में एक बडÞी संगठित नौकरशाही की स्थापना हर्ुइ। वहाँ भ्रष्टाचार इस नई बन रही राज्य व्यवस्था में ‘इनविल्ट’ होता दिखाई पडÞा।
कौटिल्य अपने अर्थशास्त्र में कर और उनके संकलन के समय में होनेवाले भ्रष्टाचार एवं ऐसे अपराधों पर दण्ड का प्रावधान करते हुए भी मानते हैं कि ‘जिस प्रकार किसी की जिहृवा पर रखे मधु या विष का स्वाद न लेना असंभव है, उसी प्रकार यह भी असंभव है कि जो व्यक्ति राजयकीय धन के लेने-देन से जुडÞा हो, वह राज्य या राजा की सम्पत्ति में से थोडÞा कम, थोडÞा ज्यादा स्वयं न ले। जिस प्रकार यह जानना असम्भव है कि जल में रहनेवाली मछली पानी को कब पीती है – उसी तरह यह जानना भी असम्भव है कि कोई जिम्मेदार राज्य कर्मचारी कब धन का गवन कर दे।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में शासनतन्त्र से जुडेÞ समूहों द्वारा की जा रही चोरी के ४० तरीकों की पहचान किया गया था। जैसे-जैसे राज्य विस्तार हुआ और उसी के साथ भ्रष्टाचार की भी घटनाएँ बढÞी।
एक तो होता है जीभ पर शहद गिरने से उसे सोखना जीभ की सहज वृत्ति या आदतहोती है । तो दूसरा कोई जीभ उसका चटकारा लेते हुए लालच से वशीभूत होता है। कोई राज कोष लूटने में व्यस्त या लिप्त हो जाए तो समस्या और भी ज्यादा गम्भीर हो जाती है।
नेपाल के शाह वंश के राजा सम्पत्ति छिपाकर रखनेवाले लालची राजा के रुप में सामने आते हैं। ज्ञानेन्द्र देश के शायद पहले र्सवाधिक भ्रष्ट और लालची शासक थे। ज्ञानेन्द्र के पतन के कारणों में से एक कारण लालच को भी माना जाता है।
भ्रष्टाचार निम्न जाति या उच्च जाति के कारण नहीं होता है। वरन उसे साम्राज्य विस्तार या सम्पत्ति विस्तार के लिए जनता से अवाध लूट की छूट मिलती है, जिस पर कोई नैतिक नियन्त्रण नहीं होता है। अतः भ्रष्टाचारी जाति से नहीं, राज्य सत्ता से आवद्ध रहता है। फिलहाल दक्षिण एसिया में राज्य निर्माण की प्रक्रिया में विकसित होती राजनीतिक शक्ति और व्युरोक्रेसी और नियन्त्रण की व्यवस्था के साथ ‘भ्रष्र्टकर्म’ और उसके प्रतिकार की वृहत जानकारी मिलती है।
साम्राज्य व राज्यसत्ता के विस्तार एवं सञ्चालन के क्रम में प्रारम्भ में सवर्ण्र्ाााति या उच्च जाति वर्ग सत्ता से जुडÞी। अतः उनमें भ्रष्टाचार का पनपना स्वाभाविक है। वर्तमान में लोकतान्त्रिक जनतान्त्रिक उभार के कारण उनके पीछडे और दलित समूह राजनीतिक व सत्तातन्त्र में प्रभावी हुए। अतः उनमें भी भ्रष्टाचार ‘फिल्टर डाउन’ होकर फैला है। किन्तु उनके भीतर भ्रष्टाचार का यह फैलाव उनकी शक्तिवान और प्रभुत्वशाली वर्ग में ही देखने को मिलता है, जो सामान्यजन या साधारण जनमानस है, उनमें नहीं।
प्राचीनकाल में लिखे गए अमर कोष में भ्रष्टाचार का कारण लालचवृत्ति को रखा गया है। अतिशय लोभी को ‘लोलुप’ कहा गया है। भ्रष्टाचारी के लिए सात नाम बताए गए है, जिन में एक ‘भ्रष्ट’ भी है। सत्ता और लालच के बढÞते सम्बन्धों को देखते हुए पौराणिक पाठों चिंतन आदि में लालचवृत्ति की कटु आलोचना की गई है। मध्यकाल में भी भक्ति आन्दोलन के संतों-कबीर, रविदास, तुलसी इत्यादि ने इसी लालच वृत्ति की कटु आलोचना कर जनमानस में नैतिक वोध विकसित करने का प्रयास किया। लेकिन अभी वर्तमान समय में लालच बोध कर ऐसे नैतिक नियन्त्रण विधि कम होती गई।
आज हमारे विकास के माडल में भी लालच जनित भ्रष्टाचार ‘इनविल्ट’ है। यह लालची विकास, लालची अभिजात्य व शक्तिवानों का समूह पैदा कर रहा है। आज भ्रष्टाचार की गति, शक्ति और भक्ति तीनो बढÞ गए हैं। पहले भ्रष्टाचार र्’कई लाखों’ का होता था, अब कई करोडÞो और खरबों का हो रहा है। असमानता से भरे समाज में पनपने वाले ‘ऊँच-नीच’, धनी-गरीब, बडÞा-छोटा का गर्व भी भ्रष्टाचार रचता है।
ऐसे में गरीबों में से जो धनी होते हैं, पिछडÞों में से जो भी आगे हो जाते हैं, उन में से कई ऐसे समूह विकसित हो जाते हैं, जो भ्रष्टपथ पर चलने लगते हैं। आज जब गरीबी व अमीरी की दूरी बढÞती जा रही है, ऐसे मे जिन अमीर, सक्तिशाली और आगे बढÞे तबकों को दूसरों के लिए ‘त्याग’ का उदाहरण बनना था, वेही भ्रष्टाचार का उदाहरण बनते जा रहे हैं। यह सवर्ण्र्ाााति व पिछडेÞ दोनों में पाई जानेवाली समान वृत्ति है।
अभी अच्छा यह है कि आज हमारा ‘पब्लिक प्लेस’ जनसमुदाय भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरुक हो रहा है। इसीलिए सम्भव है कि भविष्य में कोई ऐसी ‘नैतिक शिक्षा’ या नागरिक समाज निर्मित हो, जो हमें भ्रष्टाचार से बचा सके।

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