राप बाकी ताप बाकी

जाते जाते तथाकथित बडेÞ दल के नेता और मधेशबादी दल के नेतागण को इतना ही कहना चाहुंगा— हर राजा को अपने आस पास कुछ ऐसे लोगो को रखना चाहिये जो “ आइना” हो ।

रणधीर चौधरी
काठमाण्डु को यह सोचने का पूरा हक है कि मधेश आन्दोलन अब समाप्त हो गया । क्योंकि वो घाटी में बैठ कर सारा देश का विश्लेषण करते हैं । जिस दिन मधेशी मोर्चा के द्वारा नाका खोलने का ऐलान किया गया था उस दिन तो काठमाण्डु की हवा में खुशमिजाजी छायी हुई थी । कथित तीन बड़े दल के नेता का मनोविज्ञान पढ़ के लग रहा था कि कोई युद्घ जीत गये हैं । प्रधानमंत्री के.पी ओली को उनका बहुप्रतिक्षित दिल्ली भ्रमण सफल होता दिखाई दे रहा था और जनाव उसी सपने में गलतियाँ दोहराते चले गये । मधेशी दलों द्वारा उठाई गई मांगो को पूरा करने हेतु राजनीति संयन्त्र बनाने का उदघोष हुआ और अन्ततोगत्वा युनिलेटरली (एकतरफा) संयन्त्र का निर्माण किया गया । जिस तरह से उप—प्रधानमंत्री तथा विदेश मंत्री कमल थापा के नेतृत्व में संयन्त्र का गठन हुआ उससे ओली को दिल्ली का वीसा तो मिल गया परंतु मधेशी मोर्चा जो कि शिशु संबिधान के आयु को दीर्घायु करने मे अहम किरदार निभा सकते हंै उनको निराश किया । मोर्चा ने जिस तरह संयन्त्र से अलग रहने का निर्णय लिया इससे साफ पता चलता है कि राजनीतिक सहमति का जो एक बचा माहोल था वह भी खाक हो गया ।
स्टिक एण्ड क्यारोट
दिल्ली मे जिस तरह ओली का स्वागत किया गया खास कर आवास और भोजन की उसको कुछ हद तक राजकीय कहा जा सकता है । परंतु जब जनाब का अनुरोध कि एक संयुत्त प्रेस विज्ञप्ति निकाला जाय और भारत सरकार द्वारा इसको नकारना, साफ बयाँ करता है की ओली एण्ड कम्पनी को सिर्फ निराशा ही हाथ लगी ।
मेरा व्यतिगत मानना है कि भारत द्वारा ओली को दिल्ली की वीजा सुनिश्ति करना भारत की एक कुटनीतिक कड़ी स्टिक एण्ड क्यारोट सूत्र का प्रयोग किया गया था । इस सूत्र का प्रयोग तब किया जाता है जब कोई पाठ सिखाना हो तो उसको ट्र्याक पे रखने के लिये मानो कभी दण्ड और पुरस्कार की व्यवस्था किया जाता है । अब भारत को नेपाल में अपने प्रभाव को निरन्तरता देने हेतु, किसी को लगातार स्टिक देना उचित नही होता और इसी को मध्यनजर रखते हुवे भारत ने ओली को मेहमानवाजी दे कर फगत क्यारोट देने का काम किया है ।
ओली का जो भ्रम था कि भारत दौरा के उपरान्त मधेश समस्या खुदबखुद समाधान हो जायगा शायद वह भ्रम अब हट गया होगा ।
जिस तरह दिल्ली हवाइ अड्डे पर ही ओली को पूर्व सूचित कर मधेशी युवाओं ने लोकतन्त्र का लुत्फ उठाते हुए काला झण्डा से स्वागत किया था इससे पता चलता है कि आन्दोलन का राप और ताप दोनाें ही बाकी है ।
आन्दोलन का अल्पविराम
अदभुत तब लगता है जब देश चलाने वाले ओहदे के नेता अपने ही देश का माहोल और जन आक्रोश का मुल्यांकन नहीं कर पाते हैं । पाँच महीने तक चले आन्दोलन से थकित मधेशी जनता थोड़ा आराम को मध्यनजर कर मोर्चा द्वारा आन्दोलन को तत्काल विराम देने के निर्णय को, काठमाण्डु जो की खुद अन्धकार के पहाड़ से घिरा है उनको यह लगना कि मधेशी जनता अब फिर आन्दोलन मे भाग नही लेंगे यह सिर्फ भ्रम है । उनको जितना भ्रम पालना है अपने अन्दर पाले परंतु उन्हें “अल्प और पूर्णविराम” मे फर्क क्या होता है इसपर एक बार जरुर ध्यान करे वरना देर होने के बाद अवस्था आगे निकल चुकी होगी ।
बिना कोई आलंकारिक होते हुए अगर कहा जाय तो वास्तव मे मधेशी जन में एक आक्रोष जरुर है आन्दोलन को विराम देने के कार्य से । परंतु आन्दोलन की आवश्यकता वे अभी भी भूले नहीं हंै । अभी नहीं तो फिर कभी नहीं वाली भावना अभी भी मधेश में व्याप्त है । जिस दिन मोर्चा ने शक्ति संचय के नाम पर आन्दोलन को अल्पविराम का ऐलान किया था उसके बस कुछ रोज बाद मातृका यादव के संगठन द्वारा आन्दोलन को आगे और निरन्तरता दिया जायगा की घोषणा की गई । इस ऐलान ने मधेश मे आन्दोलन के मूड को और जीवन्त बनाने में सहयोग किया था । पिछले कुछ महीनों में मधेश में जो युवाओ का समूह तैयार हुवा है वो राज्य को झकझोर के रख देगा । आन्दोलन का राप बाकी है यह परखने के लिये अब काठमाण्डु के कंजरवेटिव समुह को और कुछ नही बस एकबार मधेश के कस्बों मे जाना चाहिये । कैसे वहाँ के नागरिक समाज आन्दोलन की आवश्यकता को समझ रहे हैं । कम से कम सामाजिक संजाल मे मधेशियों के आक्रोश को वो जज कर ही सकते हैं । बस राज्य के भविष्य को मध्यनजर कर के देखने की आवश्यकता है । राज्य कैसे अनदेखा हो सकता है थारु,मधेशी लगायत सभी सीमांतकृत वर्ग मे बन रही एकता से । शायद अब जो आन्दोलन का लाभ बाहर आयेगा, ये बहुत भारी पर सकता है “ मुर्दा शान्ति ” को अनुभूत करने मे मग्न सरकार को ।
अब की बार
प्रकृति मे अभी बसन्त ऋतु की बहार छाई हुई है । पौधे अपने पुराने पत्र को त्याग कर नया पत्र ला रही है । शरद ऋतु के बाद बसन्त का अपना मोड्रेट तापमान पर है । आने वाले महीनाें मे बसन्त से गृष्म आ रही है । मतलब मधेश के तापमान का पारा बढ़ने जा रहा है । ऐसे में मधेशी मोर्चा लगायत अधिकार के आन्दोलन में अपनी हिस्सेदारी दिखाने को आतुर सम्पूर्ण सीमांतकृत वर्ग को मौसम के अनुसार उसको फलो करते जाना चाहिये । जैसे कि, आत्म समीक्षा कर के अपने द्वारा हुई गलतियो को आगामी दिन में त्यागना चाहिये । नई रणनीति बनाकर आगे बढ़नी चाहिये ।
पिछले दौरान आन्दोलन से सबसे ज्यादा जो प्रभावित हुए थे खास कर मधेश में रहने वाली जनसङख्या, उन सभों के घर घर पहुँचना चाहिये । उनको यकीन दिलाना चाहिये कि कैसे आन्दोलन से ही उनकी आने वाली पीढ़ीयाें का कल्याण हो सकता है । कुछ मधेशी नेतागण उनके घर पहुँचे हैं जिनके घर के व्यक्ति को गोली मार कर इस भौतिक दुनिया से विदा कर दिया है कांग्रेस, एमाले, माओवादी, राप्रपा—नेपाल लगायत के सरकार ने । परंतु वैसे लोग जो अस्पताल मे अपना दिन गिन रहे हैं, जिनका घर बिखड़ गया है वैसे परिवारो से मिलना, सहानुभूति प्रकट करना और चाहे जितना मदद जुटाना भी न भूले मोर्चा के नेतागण । साथ में, जनता का एक प्रश्न, कि मधेशी दल का जब एक ही तरह का एजेण्डा है तो क्यों नहीं कम से कम वे एक महागठबन्धन बनाकर आन्दोलन मे सहभागी होते है ? इसका जबाब जनता को हमारे नेता को देना ही होगा ।
वास्तव मे कहा जाय तो मधेशी लगायत सीमांतकृत वर्गो को अभी बहुत लड़ाई लड़नी है अपने हक और अधिकार की सुनिश्चितता के हेतु और जिसका माध्यम एक मात्र हो सकता है— शान्तिपूर्ण आन्दोलन ।
जाते जाते तथाकथित बडेÞ दल के नेता और मधेशबादी दल के नेतागण को इतना ही कहना चाहुंगा— हर राजा को अपने आस पास कुछ ऐसे लोगो को रखना चाहिये जो “ आइना” हो ।

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