राबर्ट पैनर को देश निकाला करके नेपाल सरकार सवालों के घेरे में : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू , ३ मई |

मई ३ विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस अर्थात् आपकी अभिव्यक्ति को जन जन तक पहुँचाने की स्वतंत्रता । संयोग ही है कि आज प्रेस स्वतंत्रता दिवस है और आज एक बार फिर अभिव्यक्ति स्वतंत्रता की बात चर्चा में है ।

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वैसे यह चर्चा हमारे देश के लिए कोई नई बात नहीं है गाहेबगाहे अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का हनन भी होता है और उसपर चर्चा भी होती है । लोकतंत्र में जनता अपनी अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र होती है और उसे जन जन तक पहुँचाने का माध्यम बनता है प्रेस । अर्थात प्रेस स्वतन्त्रता अभिव्यक्ति स्वतंत्रता से ही सम्बद्ध है । स्वतंत्रता पहचान होती है लोकतंत्र की । लोकतंत्र जहाँ जनता के मौलिक अधिकार सुरक्षित होते हैं । भाषा, भेष, शिक्षा, अभिव्यक्ति ये वो माध्यम हैं जो किसी भी देश की जनता को स्वतंत्र होने का अहसास दिलाते हैं । किन्तु अफसोस अपने ही देश में वर्ग विशेष इस अनुभूति से अछूते हैं । कभी भाषा के नाम पर, कभी वेश भूषा के नाम पर, कभी रंगरुप के नाम पर तो कभी उनकी राष्ट्रीयता के नाम पर उन्हें शंकित दृष्टि से देखा जाता रहा है । उन्हें बार बार यह सिद्ध करने की कोशिश करनी पड़ती है कि वो भी इसी देश का हिस्सा हैं । राजतंत्र, प्रजातंत्र और अब लोकतंत्र की गलियों से गुजरता नेपाल लोकतंत्र की कई कसौटियों पर असफल होता नजर आ रहा है । मधेश आन्दोलन के छः महीनों में लोकतंत्र की धज्जियाँ ही उड़ती रहीं । सरेआम मधेशी जनता को मारा जाता रहा किन्तु न तो सत्ता की पेशानी पर कोई शिकन आई न समुदाय विशेष के दिलों में कोई हरकत हुई । मानव अधिकार का हनन होता रहा और जब मानवअधिकार कर्मियों ने निष्पक्षता के साथ अपने रिपोर्ट पेश किए तो मोहना अंसारी के साथ जो हुआ उसे सबने देखा । आन्दोलन के पश्चात् चुन चुनकर ऐसे मधेशी जनता को जो आन्दोलन में सक्रिय थे उन्हें किसी ना किसी आरोप में फंसाकर गिरफ्तार किया गया । गृहमंत्री आज भी यही बयान देते नजर आ रहे हैं कि प्रहरियों ने जो किया वह सही था । उन्हें कोई मलाल नहीं है और हो भी क्यों ? मलाल करना होता तो सत्ता पक्ष की ओर से निरंकुश कदम ही नहीं उठाया जाता । खैर…

आज एक बार फिर नेपाल सरकार सवालों के घेरे में है । कनेडियन मूल के पत्रकार राबर्ट पैनर जिसने ट्वीट के माध्यम से प्रधानमंत्री के बारे में जानने की जिज्ञासा की तो उन्हें नेपाल की जनता को उकसाने और हिंसा फैलाने के नाम पर गिरफ्तार करके उसे देश से जाने का दो दिन का समय दिया गया है | उनकी भिसा रद्द करदी गई है | आखिर सरकार क्या चाहती है ? विश्व के समक्ष मधेश के मुद्दे पर सरकार यों भी अकेली पड़ती जा रही है और अब विदेशी पत्रकार को कैद कर के वो क्या साबित करना चाह रही है । खबर के अनुसार कैनेडा के प्रधानमन्त्री ने भी इसकी जानकारी ली है | विदेश में व्यापक इसका विरोध शुरू हो गया है | पिछले वर्ष जब भूकम्प के मसले पर भारतीय मीडिया ने कवरेज किया तो सरकार और नेपाली मीडिया ने राष्ट्रीयता के साथ जोरशोर से उसका वहिष्कार किया था । जबकि नेपाल की ओर बढते विश्व के सहयोगी हाथ में उन कवरेजों का बहुत योगदान था । जब पिछले दिनों मधेश आन्दोलन हुआ तो भारतीय पत्रकारों को सीमा पर ही रोक दिया गया ताकि वो वस्तुस्थिति को कवरेज ना कर सके किन्तु मधेश और मधेशी विश्व के समक्ष अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे ।

संचार माध्यम निष्पक्ष होता है किन्तु नेपाली संचार माध्यम और संचारकर्मियों पर पीतपत्रकारिता का आरोप लगता आया है । सत्ता कुछ संचार माध्यमों को अपने हिसाब से चला सकती है किन्तु देश और विदेश सभी पर उनके हथकण्डे तो नहीं चल सकते । अपनी कमियों को छुपाने और उनपर पर्दा डालने की कोशिश सत्ता करती आई है, जिसका ही एक ताजा उदाहरण है रोबर्ट पैनर की गिरफ्तारी और उसे अपने देश जाने का आदेश । देखा जाय तो सत्ता के अनुसार यह भी आन्तरिक मामला ही है और देश की अखण्डता, राष्ट्रीयता और स्वाभिमान से जुड़ा हुआ है । जनता को इन्हीं तीन शब्दों की घुट्टी पिलायी जाती रही है और यही तीन शब्द वत्र्तमान सरकार के लिए सत्ता में टिके रहने का अचूक हथियार भी है । किन्तु सच तो यह है कि विदेशी दवाब आने शुरु हो चुके हैं । इस दवाब के सामने दमन कब तक टिकता है यह देखना बाकी है ।

अखण्डता, राष्ट्रीयता और स्वाभिमान तीन शब्द सत्ता में टिके रहने का अचूक हथियार : श्वेता दीप्ति

 

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