रामराज्य की झलक:मुकुन्द आचार्य

एक महीने से मैं वीरगंज में मटर गस्ती कर रहा हूँ । यह वीरगंज नगर बडी प्यारी है । हालाँकि कुछ लोग नाक भौं  सिकोडÞ कर कहते हैं- बहुत गन्दी जगह है । गर्मी, मच्छर और तस्करों की नगरी है वीरगंज तो । कहने वालों की जुबान को आप हम बन्द तो नहीं कर पायेंगे । आज के तथाकथित बुद्धिजीवी लोग भगवान की तो बखिया उधेड देते हैं, फिर बेचारी वीरगंज नगरी की क्या बिसात !
वैसे तो मैं एक नजदीकी रिश्तेदार की जमी में मगन होने के लिए वीरगंज आया था । मगर इस बार वीरगंज में मुझे पुराणों में वणिर्त ‘रामराज्य’ की हल्की सी झलक देखने को मिली । दुखद घडÞी में सुखद आर्श्चर्य !
आपको लगता होगा, मैं सठिया गया हूँ या पगला गया हूँ । ऐसी कोई बात नहीं है । मुझे वसन्त ऋतु ने उन्मत बना दिया हो ऐसी बात भी नहीं है । मैं अपने पूरे होस हवास में ऐलान करता हूँ कि मैंने विगत एक महीने के दौरान वीरगंज नगरी में सचमुच रामराज्य की हल्की सी झलक देखी है । आप मानें या न मानें, आपकी मर्जी ।
वीरगंज में मैंने वर्षो तक पत्रकारिता के नाम में कागज-कलम-समय और श्रम को बुरी तरह बर्बाद किया है । उस सिलसिले में खुद भी बोर हुआ हूँ और लोगों को तो बोर किया ही है । अनेक पत्रकार मित्र अभी भी जीवित है, इस बात की गवाही देने के लिए ।
जितने भी पत्रकार मित्र इस बार मिले वे सभी जरुरत से कुछ ज्यादा ही प्रसन्न मुद्रा में मुझे नमस्कार, प्रणाम, हाय, हलो का कंकडÞ मार रहे थे । उनके चेहरे से ऐसा नूर टपकता था मानो अभी-अभी उनके नाम की लाँटरी निकली है ।
जो नकचढेÞ पत्रकार पहले कभी बात करना भी गवारा नहीं करते थे वो भी इस बार पान से पिली-काली हर्ुइ दन्तपंक्ति दिखाकर मुस्कान बिखेर रहे थे । कोई दिनभर में दश प्रणाम दागता था, कोई बिलैया प्रणाम करने को भी तैयार रहता, कोई आत्मीयता की बौछार से भिगो देता । सभी पत्रका आर्श्चर्यजनक रूप से शिष्ट, सदाचारी, अनुशासित होने का ठोस प्रमाण पेश कर रहे थे ।
पत्रकार और ऐसा सज्जन ! ऐसा शिष्ट ! ऐसा सभ्य और अनुशासित ! मुझे हजम नहीं हो रहा था । मैं आर्श्चर्य के सागर में डूबने उतरने लगा । सोचा, रामराज्य में भी इतने भले लोग नहीं होते होंगे ।
कुछ खतरनाक युवा पत्रकार, स्टन्ट फिल्मों के खलनायकों की तरह मोटर बाइक में सवार घडÞघडÞाते हुए कहीं से प्रकट हुए । मुझे खिलाने पिलाने के लिए बेसब्री से मचलने लगे वे शाम को सप्तरंगी बनाना चाहते थे । ‘सर ! कहीं नास्ता करने चला जाय । आप मुद्दत के बाद मिले हैं । मांस और दारु की एक नई दुकान खुली है । सर ! कबाब और शबाब दोनों ओरिजनल मिलते हैं’ – एक पत्रकार ने अपने सामान्य ज्ञान और व्यावहारिक बुद्धि का परिचय दिया ।
मैंने दोनों कान पकडÞते हुए प्रतिवाद किया, ना भई ना ! आजकल में चौबीस कैरेट शुद्ध शाकाहारी तागाधारी ब्राह्मण हो गया हूँ । एक समवयस्क पत्रकार मित्र बोले, सत्तर चूहे खाकर बिल्ली चली हज को । मैंने नहला पर दहला मारा, कुछ बिल्ली तो ‘डबल सेंचुरी’ चूहा खाकर भी हज जाने के बारे में नहीं सोचते हैं ।
इतने में एक पत्रकार दौडÞकर मिर्ठाई और प|mुटी ले आया । दूसरे ने दो बीडÞा बनारसी पान जबर्जस्ती मेरे मूँह में ठूस दी । मैं भी बाहर से ना ना और भीतर से हाँ हाँ कर रहा था ।
तब तक शाम ढले चुकी थी । अच्छे भले लोग अपने-अपने घोसलों की ओर तेजी से लौट रहे थे । पता नहीं कब कौन किसको गोली मार दे और मुफ्त में शहीद बना दे । कुछ पत्रकार अपनी बाइक में मुझे लाद कर मेरे निवास पर पटक देने के लिए लालायित थे । पत्रकार जमात में ऐसा प्यार -! विश्व का महान् आर्श्चर्य !
कुछ रोज बाद कोई व्यापारी, कोई तस्कर, कोई ठेकेदार, कोई अपराधी, कुछ दलाल सब के सब पत्रकार के रूप में परिचित हुए । पत्रकारिता की लोकप्रियता देखकर मैं दंग रह गया । एक रोज रात को सोते समय मैंने भगवान को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया । इस सुखद और आर्श्चर्यजनक परिवर्तन के लिए । सपने में प्रभु ने मुझे एक मिठी झिडÞकी दी, बेवकूफ ! लगता है तेरे बाल धूप में सफेद हुए हैं । पत्रकार महासंघ का चुनाव आ गया है । इसलिए अभी सभी ने सज्जनता के मुखौटे लगाए हैं अपने चेहरे पर । ये सारे के सारे थोडेÞ दिनोें के लिए रामराज्य की झलक पेश कर रहे हैं । चुनाव के बाद फिर वही ढÞाक के तीन पात ! चार दिनों की चाँदनी फिर अंधेरी रात ! सावधानी के साथ यहाँ से फूट ले ।
नींद खुली तो मैं पसीने से तर-ब-तर था !

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