रामायण सर्किट, बुद्ध सर्किट के बाद विद्यापति सर्किट : नविनकुमार नवल

नविनकुमार नवल, महोत्तरी । सर्किट यानी बिजली के काम में प्रयोग होने बाला शब्द (ऋष्चअगष्त विद्युतिय रुट) अभी नेपाल मे धार्मिक सम्बन्धों को जोड़ने  मे ज्यादा प्रयोग हो रहा है । पिछले महीने भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के धार्मिक भ्रमण में नेपाल आने पर जनकपुर में सबसे पहले रामायण सर्किट का उदघाटन किया । जिसे रामसीता के विवाह के क्रम मे अयोध्या से जनकपुर आने जाने वाले रास्ता में अवस्थित भगवान राम एवं सीता से जुडेÞ धार्मिक स्थल को पहचान कर पर्यटकीय स्थल के रूप मे विकास हो सके जिसके माध्यम से दोनों देश की जनता की आस्था प्रगाढ बना सके । यही सोचकर आनन फानन में बस सेवा भी शुरु किया गया जो एक सप्ताह में ही बन्द हो गया ।
मोदीजी के जनकपुर नागरिक अभिनन्दन में ही रामायण सर्किट की तरह बुद्ध सर्किट को जोड़ने पर जोर दिया जिसे बुद्ध की जन्मस्थल लुम्बनी एवम् कपिलवस्तु से लेकर बुद्ध के ज्ञान प्राप्तस्थल विहार के बोधगया, नालान्दा से लेकर सोमनाथ मन्दिर तक ७०० किमी के रूट कोे धार्मिक पर्यटकीय के रूप जोड़ा जाय ताकी दोनो देश के लोग शान्ति सन्देश देने बाले भगवान बुद्ध के विचार पर चल सकें और दोनो देश का विकास हो सके । इसी सोच एवं इरादा के साथ प्रदेश नम्बर २ के मुख्यमन्त्री सहित भौतिक पूर्वाधार मन्त्री जितेन्द्र सोनल भी नेपाल भारत के बोर्डर महोत्तरी मटिहानी के कार्यक्रम में मिथिला क्षेत्र एवम् मैथिली के विकास के लिए विद्यापति सर्किट को जोड़ने पर काफी जोर दिया चुकि विद्यापति का जन्मस्थल बिहार का मधुबनी हैं तो कर्मस्थल महोत्तरी के बनौली गढसहित नेपाल के जंगल सहित कई स्थान हैं । जहाँ भगवान शंकर उनके यहाँ नौकर बनकर रहे थे जो बाद मे उनकी पत्नी के कारण अन्र्तध्यान हो गये जिसके खोज मे विद्यापति नेपाल के जंगल तक पहुचे थे । वे मैथिली भाषा के साहित्यिक कवि एवम् संस्थापक भी थे । इसिलिए विद्यापति की स्मृति मे काठमाण्डु से लेकर दिल्ली एवम् विदेश मे भी मैथिली कार्यक्रम होता आ रहा है । इस सबके अलावा यहाँ के बुद्धिजीवी, व्यवसायी, राजनीतिज्ञ द्वारा शिव सर्किट के तहत पशुपतिनाथ को काशी से लेकर केदारनाथ बद्रीनाथ तक मुक्तिनाथ को सोमनाथ और जलेश्वरनाथ कोे वैद्यनाथ धाम तक जोड़ने पर पहले से चर्चा होता आ रहा हैं तो शक्तिपीठ को भी शक्तिपीठ सर्किट से जोड़ने से काठमाण्डु के गुहेश्वरी शक्तिपीठ से कामाख्या शक्तिपीठ तो गण्डकी शक्तिपीठ से कालीका शक्तिपीठ कलकता तो मिथिला मे अवस्थित उमा महोदरी शक्तिपीठ से भारत के रत्नावली पर्वत के कुमारी शक्तिपीठ से जोडने से दोनो देश में विशेष धार्मिक पर्यटनके क्षेत्र मे विकास का पूर्ण सफलता सम्भव है । लेकिन जव रामायण सर्किट को ही पूर्ण सफलता नही मिला हैं जिसका उदघाटन भारत और नेपाल के प्रधानमन्त्री ने किया है । उसे अभी तक रामायण ग्रन्थ के अनुसार बिहार के बक्सर, सीतामढी, दरभंगा नेपाल के जनकपुर से जोडा गया । जबकि भगवान राम, लक्ष्मणसहित जनकपुर आने का अलग रुट है तो सीताजी से विवाह के वाद जाने का रास्ता अलग है । जहा अभी भी कई स्थान पर मन्दिर सहित लिखित इतिहास लोगों को मालूम है । इस पर भी विचार करना होगा । ताकि ज्यादा से ज्यादा दोनो देश के लोगो की आस्था जुड़ सके ।
इतना ही नही बुद्ध सर्किट को बुद्ध से जुड़े हुए धार्मिक स्थल, विद्यापति सर्किट से विद्यापति से जुडेÞ स्थल, शिव सर्किट से शिव से जुडेÞ हुए मन्दिर और स्थल तो शक्तिपीठ सर्किट से शक्तिपीठ से जुडेÞ धार्मिक स्थल को जोड़कर सर्किट तैयार करना होगा । जिस पर गम्भीरता से अनुसन्धान करने की आवश्यकता है । गौर से सोचा जाय तो यह सभी सर्किट का काम समुद्र मे मोती खोजने जैसा कठिन और मुश्किल हैं पर असम्भव भी नही हैं । तब दोनों देश के अद्धितीय सम्बन्ध के साथ विकास की नई धारा बह सकती है । नही तो ये चर्चा और मजाक बनकर ही रह जायेगी ।
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