रावण लीला, राम चारो खाने चित्त है और रावण राम की छाती पर खड़ा है

बिम्मीशर्मा, काठमांडू , १० अक्टूबर |
हमारे पडोसी देशों में हर साल दशहरा में रामलीला किया या मनाया जाता है । पर हमलोग हर साल रावण लीला मनाते हैं । हमारे देश में कोई राम पैदा ही नहीं हुआ तो हम रामलीला कैसे मना सकते हैं । देश के शासन सत्ता हर साल नएं, नएं रावण का बिज हो जाते हैं तो राम बेचारा रावण का पैर दबा नाही अपना अहो भाग्य समझता है । पिछले साल के दशहरा में केपी ओली रावण थे तो ईस बार के दशहरा में प्रचडं रावण हैं । पडोस में एक ही रावण को देख। देख कर और उसी को जला कर बोर हो जाते होगें । पर हमलोग हर साल नयां रावण पैदा जरुर कर लेते है पर क्या करें वह जलता नहीं हैं । देश की समस्या की तरह रावण भी यहां कभी नहीं मरता या नहीं मारा जाता ।

ram-ravan
राम बनने की खुबी नहीं है या बनना नहीं चाहते ईसी लिए रावण बन कर अपना वर्चस्व स्थापित कर रहे हैं सभी । अहंकार का, सम्पति का , बल एवं यौवन का रावण चारों तरफ मूहं बाए खडा हैं । सभी ने अपने घरों कों लंका बना लिया है । यहां अयोध्या किसी को नहीं चाहिए । राम चारो खाने चित्त है और रावण राम की छाती पर खडे हो कर अपने शौर्य का गूणगान कर रहा है । अभिमानी रावण के आगे निराभिमानी राम संकोच से नहीं बोल पाते हैं न अपनी अच्छाई ही प्रदर्शित कर पा रहे हैं ।
रावण का हर ओर रजगज है । रावण कहां है यह प्रश्न ही मूर्खतापूर्ण है । रावण कहां नहीं है यह पूछा जाना ज्यादा सही होगा । जब आप खरिदारी करने के लिए घर से निकलिए आपको ठग्ने के लिए एक से एक रावण बजार में भरे पडे हैं । यह रावण आप के पर्स के वजन के हिसाब से आप से मोल भाव कर के ठग्ते हैं । ठगी और भ्रष्टाचार में तो हमने सगरमाथा को भी मात दे दिया है । सगरमाथा की उचाई भी ठग, झूठ और भ्रष्टाचार के रावण के आगे छोटा है । धोखा और घृणा का रावण दिन प्रति दिन बडा हो रहा है और । प्रेमऔर बिश्वास का राम रावण की भीड में कहीं गूमहो रहा है ।
रामका अर्थ है मन को भाने वाला और आनंद देने वाला । रावण का अर्थ है दुसरों को दुख देने या रुलाने वाला । पर हमें आनंद नर्ही दुसरों की जलन और दुख पसंद है । कहा भी जाता है कि इंसान अपने दुख से ज्यादा दुसरों के सुख से ज्यादा दुखी है । ईसी लिए हम अपने मन में राम को नहीं रावण को पालते पोसते है । और ईस बढे हुए रावण को अपने चारों और पसार देते हैं ताकि दुसरे भी ईस रावण से संक्रमित हो अपने अंदर के राम को मार डाले । रावण सबको प्यारा हो गया है और राम एक कोने में खडे हो कर अपनी तिरस्कार पर आंसू बहाने को वाध्य हैं ।
हम जितना भी अहिंसा की बातें करे पर हमें हिंसा हीज्यादा पंसद है । अपनी बातों और व्यवहार से हम हर रोज किसी न किसी की हत्या जरुर करते हैं । सडक किनारे खसी या बोका काट कर हम खून को बहने के लिए छोड देते हैं । जो विशुद्ध शाकाहारी हैं उन्हे यह सब देख कर कैसा लगता होगा ? मंदिर में नवरात्र में देवी को भोग का बहाना कर के हम अपने ही जीभ और पेट का भोग लगा रहें हैं । खाते हम हैं पर दोष देते हैं देवी की वलि का । देवी ने तो कभी नहीं कहा मुझे किसी निरपराध पशु की वलि या भोग चाहिए ? अगर दे सकते हो तो अपने मन के विकार और अभिमान की वलि दो । क्यो किसी निर्दोष पशु को अपने भक्षण की आग में झोंकते हो ? यह सबुत है किआप के अंदर का रावण अभी मरा नहीं है और कभी मरेगा भी नहीं । बाहर १० शीर के रावण को मारने से कहीं ज्यादा अच्छा है अपने अंदर बैंठा विकार और पाप का सौ शीर वाले रावण को मार डाले ।
पर अपने अंदर का रावण तो दिनप् रति दिन वलशाली होता जा रहा है और हम १० शीर वाले रावण का पुतला जला कर बुराई को खत्म कर लेने का भ्रम पाल लेते हैं । समाज में विषमता और एक दुसरे के प्रति भेदभाव का जीवीत रहना भी रावण के जिंदा रहने का संकेत हैं । जब तक समाज में जातपात, अंधबिश्वास, पाखंड और छुवाछुत रहेगा तब तक रावण मर हीनहीं सकता । एक दुसरे के प्रति अबिश्वास और घृणा भी राम के मरने और रावण के जिंदा रहने का सवुत है । हम प्रेम नहीं समाज में घृणा फैला रहे हैं । ईसी लिए हर नवरात्र में हम रामलीला नहीं रावण लीला कर रहे हैं ।
देश की शासन सत्ता की धूरी सिंह दरवार रावण की राजधानी लंका जैसा बनगया हैं । जहां से धर्म और न्यायकि आशा करना अधेंरे में रोशनी की मागं करने जैसा ही है । सिंह दरवार रुपी लंका में नेता व मंत्री गण अपनी भत्ता और सत्ता को अक्षुण रखने के लिए हर वह कोशिश करते हैं । पर  देश के सडकों कि बदहाल स्थिति, हर रोज हो रहे सवारी दुर्घटना से ईन का कोई सरोकार नहीं है । यहतो देश के नागरि कों की खून की निलामी कर उस पैसे से अपने पाप ढकने के लिए चादर खरिदते हैं ।
क्यों हमअपने अंदर के राम को मार बैंठे हैं ? क्यों किसी के दुख से हमअपने लिए सुख खरिदना चाहते हैं । अपनों का गम तो हमें हिला देता है पर औरों का गम क्यों हमें नहीं पिघलाता ? क्यो हमारी छाती चट्टान जैसा हो रहा है ? क्यो उस छाती कें अंदर संवेदना का हिमाल नहीं पिघलता ? हम रावण जलाने के बहाने से अपने ही हाथ से अपने अदंर के राम को जला कर खाक कर रहे हैं । ईसी लिए राम लीला की जगह रावण लीला मनाया जा रहा है । दूर किसीजंल में राम रास्ता भटक गए हैं और सीता अंधबिश्वास की अग्नि परीक्षा अभी तक देती रही है ।
ईस बार हम सब अपने अंदर वह आग पैदा करें जिससे हमारे अंदर का रावण जल कर भष्म हो और मन के अयोध्या राम का राज चलें । बिजयादशमी और दशहरा की सभी को हार्दिक शुभकामना । ( व्यग्ंय…….)

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