राष्ट्रपति का चुनौतीपूर्ण कार्यकाल

राजतन्त्र अन्त के बाद शुरू राष्ट्रपतीय शासन प्रणाली का दूसरा कार्यकाल शुरु हुआ है । इस कार्यकाल में हमारे सामने हैं, सम्मानीय राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी । भण्डारी नेपाल की पहली महिला राष्ट्रपति भी हैं । महिला के सवाल में हमारे जैसे सामाजिक पृष्ठभूमि रहे देश के लिए यह एक गौरवशाली विषय भी हो सकता है । महिला जगत इसी तरह प्रचार भी कर रहा है । लेकिन राष्ट्रपति भण्डारी का कार्यकाल उतना सहज नहीं है ।
प्रधानमन्त्री के रूप में ओली का भविष्य कितना लम्बा हो सकता है, यह तो नहीं कहा जा सकता । लेकिन सामान्यतः राष्ट्रपति भण्डारी संवैधानिक प्रावधान के अनुसार अपना पूरा कार्यकाल शीतल निवास में रह सकती है । ऐतिहासिक महिला राष्ट्रपति होते हुए भी भण्डारी, उस तरह की विशेष अवस्था में राष्ट्रपति निर्वाचित हुई हैं, जिस वक्त एक क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति (मधेशवादी दल) वर्तमान संविधान को अस्वीकार कर रहा है । उस राजनीतिक शक्ति ने राष्ट्रपति निर्वाचन में सहभागिता भी नहीं जताई । वर्तमान संविधान का संरक्षक और कार्यान्वयन की जिम्मेदारी लेनेवाली भण्डारी के लिए यह घटना चुनौतीपूर्ण हो सकती है ।
राष्ट्रप्रमुख जैसे गरिमामय पद में रहनेवाले व्यक्ति को सभी नागरिक एवं समुदाय के प्रति समान व्यवहार करना चाहिए । लेकिन विगत की राजनीतिक चरित्र को देखें तो कुछ समुदाय के लिए भण्डारी ऐसी नहीं है । अपने को मधेशीवादी कहनेवाले समुदाय उनकी निष्पक्षता के ऊपर प्रश्न उठा सकते हैं । क्योंकि विगत में भण्डारी कहती थी– ‘मधेशवादी राजनीतिक दल की माँग क्या है ? वे लोग किस के लिए आन्दोलन कर रहे हैं ? यह तो मेरी समझ में नहीं आ रहा है ।’ उनकी यह मानसिकता और प्रश्न अभी भी कायम है तो तराई की आधा जनसंख्या भण्डारी को राष्ट्रपति के रूप में स्वीकार नहीं करेगी ।
इसीतरह उनके ही कार्यकाल में देश को संघीय स्वरूप में विभाजन करना है । अर्थात् उनके ही कार्यकाल में देश में संघीय राज्य स्थापित होने वाला है । हम सब जानते है कि लम्बे समय से राजनीतिक दलों के बीच सीमांकन सम्बन्धी विषय को लेकर विवाद हो रहा है । सीमांकन सम्बन्धी अन्तिम निर्णय में राष्ट्रपति भण्डारी किस तरह की भूमिका निर्वाह करेगी, यह महत्वपूर्ण हो सकता है । उस समय भण्डारी एक विशेष समूह तथा सिर्फ पार्टीगत मुद्दा को लेकर तो नहीं चलेगी ? इस तरह की आशंका अभी हो रही है । उनसे पहले राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव के कार्यकाल में भी इस तरह के प्रश्न और आशंका किए गए थे । संवैधानिक राष्ट्रपति के ऊपर इस तरह का प्रश्न और विवाद होना शोभनीय नहीं है ।
एमाले नेतृत्व में सरकार बनने के बाद नेपाली राजनीति में कुछ भयावह परिदृश्य भी देखने को मिल रहा है । वह है – नेपाली भूमि में भारत और चीन विरोधी राजनीति को वीजारोपण होना । देश के एक भूखण्ड में भारत का राष्ट्रीय झण्डा जल रहा है और दूसरे भू–खण्ड में चीन का । एमाले के नेतृत्व में सरकार और उसके ही एक सशक्त महिला कार्यकर्ता राष्ट्रपति होते वक्त यह घटना हो रही है । इस तरह की राजनीति का अन्त नहीं किया गया तो देश अन्तहीन द्वन्द्व में फँस जाएगा । इसका भागीदार प्रधानमन्त्री ओली और राष्ट्रपति भण्डारी दोनो ही होंगे । इस में राष्ट्रपति को सन्तुलित और सामन्जस्यकारी भूमिका निर्वाह करना होगा ।

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