राष्ट्रवाद इच्छाशक्ति का अभाव क्यों

समय की गति के साथ हरेक क्षण हरेक वस्तु परिस्थिति में परिवर्तनशीलता आना प्राकृतिक नियति है, इसी आधार पर पुरानी सोच नई सोच के रुप में परिवर्तित हो रही है। पुरानी सभ्यता, कला, संस्कृति, परम्परागत घरेलू उद्योग, पुरानी शिक्षा व्यवस्था सबके सब नई सक्ल धारण करती जा रही हैं, जो स्वाभाविक ही है। पर नवीनता के क्रम में सही, उपयोगी पर प्राचीन कला संस्कृति, शिक्षा, धर्म, घरेलू उद्योग आदि को खोते जाना हमारी बुद्धिमत्ता साबित नहीं हो रही है या नहीं कही जाएगी।
भौतिक पर्ूवाधार का विकास होना जरुरी है, क्योंकि पर्ूवाधारों का विकास ही समृद्धि का आधार है। पर पर्ुवाधारों का विकास पर्ूण्ातः दूसरों के बल पर करना घातक सिद्ध हो सकता है, जो हमारे देश में हो रहा है। समुचित सामर्थ्य विकास करने के लिए स्थानीय संसाधनों एवं मानव संसाधन के विकास पर जोड देने की जरूरत है। इसके लिए र्सवप्रथम जनता में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को जोडÞ कर आगे बढÞाना अपेक्षित है। पर हमारे देश में ये तीनों विषय पर्ूण्ातः उपेक्षित ही नहीं, वर्तमान संक्रमणजन्य सोच के कारण सोचनीय अवस्था में पहुँच चुकी हैं। यदि समय रहते उक्त विषयों पर सन्तुलित दृष्टिकोण और दूरदर्शी रणनीति नहीं अपनाई गई तो निश्चय ही इस देश और जनता को गणतन्त्रात्मक स्वरुप प्रदान करना बहुत ही कठिन होगा। ऐसी अनुभूति अधिकांश तटस्थ जनता के साथ साथ राष्ट्रप्रेमी राजनीति समीक्षक, विद्वानों को होने लगी है। हरेक समाज और देश में विकास की प्रक्रिया निरन्तर आगे बढÞती रहती है। हाँ, व्यक्ति, समाज या देश के नेतृत्व की इच्छा शक्ति के बल पर भी विकास की गति की प्रक्रिया में शिथिलता या तीव्रता निर्भर करती है। हम अपने पडÞोसी देश भारत और चीन की विकास प्रक्रिया को देखें तो लगता है कि इन दो देशों की व्यक्ति, समाज या नेतृत्व शक्ति में हमारी तुलना में अधिकर् इच्छा शक्ति है। फलस्वरुप दोनों पडÞोसी देश सभी क्षेत्रों में असीमित रुप में आगे बढÞ रहे हैं, पर हम परमुखापेक्षी बनकर कछुंए की तरह जैसे-जैसे घिसट रहे हैं। क्यों – चिन्तनीय विषय है। इस विषय पर जनशक्ति और नेतृत्व शक्ति दोनों को आत्मा साक्षी रख कर सोचने की जरुरत है। हम में सबसे बडÞी कमजोरी है कि हम दूसरों पर दोषारोपण अधिक करते हैं, लेकिन स्वार्थरहित हो राष्ट्रहित में कम सोचते हैं।
पञ्चायतकाल से लेकर आजतक के गणतन्त्रात्मक नेपाल में विकास नहीं हुआ है, ऐसी बात नहीं। नेपाल में भी शिक्षा, यातायात, भवन निर्माण, रहन-सहन, शहरीकरण के सर्न्दर्भ में अभूतपर्ूव बढÞोत्तरी होती दिखाई देती है। पर तुलनात्मक दृष्टि से जिन जरूरतमन्द लोगों को लाभ मिलना चाहिए, उन्हें नही मिला है। शिक्षा यातायात, शहरीकरण को देखा जाए तो स्थानीय समुदाय के हित के सर्न्दर्भ में न्यूनता ही नहीं, अपितु विभिन्न स्थानीय, क्षेत्रीय, जातीय पारम्परिक कला तथा रहन-सहनजन्य व्यावसायिक पेशाजन्य लाभ अमीर वर्ग में ही स्थापित हो चुका है। इस ओर आज तक पञ्चायती शासन एवं गणतान्त्रिक नेपाल सरकार ने कभी उचित ध्यान नहीं दिया। फलस्वरुप हमारी सांस्कृतिक पहचान, औद्योगिक अवस्था एवं पारम्परिक कला सब के सब विदेशी अपसंस्कृति की शिकार होती गईं। गणतन्त्रात्मक व्यवस्था भी जब पञ्चायती ढाँचे से दो कदम आगे बढÞकर ही स्वार्थपर्ूर्ति करने में ही आकण्ठ डूब चुकी है, तो जनता पञ्चायती शासन तथा गणतन्त्रात्मक शासन के बीच तुलनात्मक विचार-विमर्श करने के लिए मजबूर हो गई है। तुलना करने पर जनता को लगता है कि वर्तमान लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था की अपेक्षा पञ्चायती व्यवस्था अच्छी थी। कारण पञ्चायत काल में शान्ति सुरक्षा की व्यवस्था थी, जिसके कारण जनता परिश्रम करके शान्तिपर्ूण्ा जीवन तो व्यतीत कर सकती थी, अभी तो चारों ओर अशान्ति, असुरक्षा, चन्दा आतंक का साम्राज्य है।
२०१७ से लेकर २०२८ के बीच नेपाल के पर्ूवाधार विकास योजना के क्षेत्र में अतुलनीय वृद्धि हर्ुइ। पर्ूव-पश्चिम राजमार्ग, विभिन्न औद्योगिक -सिगरेट फैक्ट्री जनकपुर, चीनी मिल, कृषि औजार कारखाना वीरगंज तथा जूट उद्योग विराटनगर) क्षेत्र में, जलविद्युतीय क्षेत्र में अपेक्षित कार्य हुआ। इस क्षेत्र में जनता आज के नेतृत्व वर्ग की असफलता का उदाहरण ले सकती है। पर्ूव-पश्चिम हुलाकी राजमार्ग और जयनगर से बर्दिवास रेल यातायात योजना के लिए पडÞोसी देश भारत से वषार्ंर्ेेहले योजना स्वीकृत हो चुकी है, पर चन्दा आतंक, असुरक्षा, सरकार की उदासीनता के कारण योजना साकार रुप लेने में अर्समर्थ है। यदि आज पर्ूव-पश्चिम राजमार्ग बनने की योजना आती तो शायद १०० वर्षो में भी पूरी नहीं होती। इन दृष्टियों से देखा जाए तो राजा महेन्द्र के समय में सबसे अधिक विकास कार्य क्रियान्वित हुआ, पर आज पञ्चायतकाल में स्थापित विकास योजनाएं मृतप्राय हो गई है। कारण आज के नेतृत्व वर्ग मेर्ंर् इच्छाशक्ति और दूरदृष्टि का पर्ूण्ा अभाव है तो सत्तालिप्सा या स्वार्थपरता अधिक है। राजा महेन्द्र की जैसी दूरदृष्टि और इच्छा शक्ति आज तक किसी अन्य नेता में नहीं देखी गई है। अतः राजा महेन्द्र का समय नेपाल और नेपाली जनता के लिए स्वर्ण्र्ााग कहा जा सकता है। फिर भी एक बात निश्चित है कि हम किसी भी कारण से पञ्चायती शासनकाल के हिमायती नहीं है और न ही राजतन्त्र की पुनर्स्थापना चाहते हैं।
०६२/०६३ के जनआन्दोलन के कारण देश में गणतन्त्र तो आया, परन्तु वर्तमान स्वार्थकेन्द्रित नेतृत्व शक्ति के द्वारा परिचालित शासन को देखे तों पञ्चायती शासन की तुलना में विकास की गति उल्टी दिशा में जाने लगी है। देश में अभाव ही अभाव दिखाई देने लगा है। गणतन्त्र लाने के लिए दम्भ भरनेवाली पार्टियों ने पञ्चायती शासन के विरुद्ध जनता को ऐक्यवद्ध करके राजतन्त्र का अन्त कर दिया। पर गणतन्त्रात्मक और धर्मनिरपेक्ष स्वरुप प्रदान करने वाले पार्टिगत नेतागण पञ्चायती शोषण करने की प्रवृत्ति को अपनाते हुए पदीय लिप्सा, सत्तास्वाद, भ्रष्टाचारिता, बेइमानी, अन्याय, अत्याचार, वर्गीय संर्घष्ा, महंगाई, अभाव को असीमित रुप में बढÞाने में लगे रहे। तर्सथ चेतनशील नागरिक को यह मानना पडÞ रहा है कि नेपाली जनता पीडÞा, छटपटाहट एवं शोषित होने के लिए बाध्य है।
नीतिकार भतर्ृहरि ने लिखा है कि- ‘लिखितमपिललाटे प्रोज्भिmतुं कः र्समर्थः -‘ अर्थात् भाग्य मे जो लिखा है, उसे कौन मिटा सकता है। नेपाल और नेपाली जनता की बडÞी बिडम्बना यह रही है कि इमान्दारितापर्ूवक देश विकास, जनपक्षीय काम करनेवाली पार्टर्ीीा नेता की यहाँ हमेशा से कमी रही। राष्ट्र के समग्र विकास के क्रम में आजतक स्पष्ट सोच तथा जनमुखर्ीर् इच्छा-शक्ति वाले नेतृत्व शक्ति के अभाव में नेपाल विश्व के निर्धनतम देश के रुप में सूचीकृत हो गया है।
आजतक नेपाली जनता का दर्ुभाग्य रहा है कि २०० वर्षके दरमियान में समय-समय पर जिस किसी भी पार्टर्ीीा शासन आया, वे सब के सब पदच्युत शासकों पर दोषारोपण करता हुआ सत्तासीन हुआ, पर जनता पर होनेवाले जुल्म तथा उसको शोषित, प्रताडिÞत करनेवाली प्रवृत्ति में कभी कमी नहीं आई। विगत से लेकर आजतक के शासन करनेवाले नेतृत्व वर्ग में जनहितकारी दूरदृष्टि, स्पष्ट सोच तथा स्वार्थरहित इच्छाशक्ति का र्सवथा अभाव के कारण देश और जनता की स्थिति बद से बदतर होती गई।
जनसंख्या की दृष्टि से नेपाल विश्व में ४३वाँ बडÞा देश है, क्षेत्रफल की दृष्टि से ९२वाँ बडÞा देश है, जलस्रोत की दृष्टि से दूसरा बडÞा देश है, पर बिडम्बना यह रही है कि नेपाल में स्वार्थरहित या राष्ट्रवादी त्यागी राजनेता बहुत कम हुए। समय-समय में जनता को ढÞाल बनाकर सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ, ऐसी बात नहीं। २०४६ के जनआन्दोलन द्वारा गणतन्त्रात्मक लोकतान्त्रिक व्यवस्था स्थापित हर्ुइ, पर क्या जनता लाभान्वित हर्ुइ – ०६२/०६३ की जनक्रान्ति के बाद निर्वाचित संविधानसभा मात्र धर्मनिरपेपक्षता लाने के लिए आई थी – संविधानसभा का उद्देश्य क्यों सफल नहीं हुआ – ऐसे अनेक प्रश्न मुँह बाए खडÞे हैं।
जनता शर्ीष्ास्थ नेताओं से पूछना चाहती है कि देश में विधिजन्य शासन कब स्थापित होगा – गुण्डा राज कब तक चलेगा – नेता द्वारा बाहुबलियों का संरक्षण कब खत्म होगा – देश में १४-१४ घंटा लोडसेडिंग की अवस्था किस के कारण आई है – क्या लोडसेडिंग का दुष्प्रभाव आप जैसे लोगों पर पडÞता है – कहने के लिए सबसे अधिक हाइड्रोपावर उत्पादन करनेवाला देश नेपाल है। बारहो महीने बडÞी-बडÞी हिम नदियाँ बहनेवाले देश में पानी विजली का अभाव – यह कैसी विडम्बना है – नेताओं के पास उक्त प्रश्नों का जबाव है – यदि सत्ता की होडबाजी में शहीदों द्वारा दिए गए आत्मबलिदान को ऐसे ही अनदेखा किया जाता रहा तो वह दिन दूर नहीं, जब जनता अपना भविष्य तय करने के लिए पुनः जनआन्दोलन में जा सकती है।

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