राष्ट्रवाद का डी.एन.ए.

अचानक वही तिलाठी वासी देश प्रेमी और राष्ट्रवादी हो गए ? जब यही तिलाठी मधेश आंदोलन मे पुलिस की लाठी खा रही थी तब कहां था यह राज्य ? तब क्यो नहीं माना गया उन्हें राष्ट्रवादी और देश प्रेमी ? तब भी तो वह मधेशियों के हक के लिए ही लड़ रहे थे । पडोसी से ताबड़तोड़ मारपीट करने और खून बहने के बाद राष्ट्रवादी ?


कहीं इस अंधे राष्ट्रवाद की बेतोड़ की आंधी मे उन्हे पड़ोसी के घर में ही ले जा कर ना पटक दे । उत्तर के तरफ के पड़ोसी के घर में गिरे तो महान राष्ट्रवादी और दक्षिण के तरफ के पड़ोसी के घर में गिरे तो कलकिंत देशद्रोही माने जाएँगें


राष्ट्रीयता का डीएनए देव नारायण के खून में था या कोशी के पानी में या पड़ोसी के साथ हुए झगड़े में ?

बिम्मी शर्मा
आम का मौसम कुछ महीनों का होता है । आ कर सबको तृप्त कर अगले साल आने के लिए चला जाता है । पर यह राष्ट्रवाद कैसा फल है जो आ तो गया पर जा नहीं रहा । सब इस राष्ट्रवाद के फल से अघाए हुएं है । पर यह जाने का नाम ही नहीं ले रहा । सिंह दरवार और बालुवाटार की पेड़ की टहनिंयो पर लटके–लटके ही यह फल सड़ चुका है । पर कोई भी इस को उखाड़ना और फेंकंना नहीं चाहता । हमारे देश के पीएम को यह फल बहुत ही प्रिय है । वह सुबह, शाम इसी को खा कर और डकार कर राष्ट्रवाद और देश प्रेम का लंबा भाषण देते हैं ।

पहाड़ में रहने वाले लोग तो पैदा होते ही इस देश के नागरिक बन जाते हैं । वह इस देश में पैदा न भी हो तो प्रशान्त तामागं की तरह पहाड़ी नाक नक्शे से ही अपने आप नेपाली स्वीकार लिए जाते हैं । पर इस देश के मधेश या सीमावर्ती क्षेत्र में रहने वाले अपने नाक, नक्श और वर्ण के कारण हमेशा ही संदेह के घेरे में रहते हैं । मधेश की जनता को अपनी राष्ट्रीयता का डीएनए टेस्ट बार–बार कराना पड़ता है ।
बाढ़ तो आ कर तबाही मचा कर दो–चार दिन में थम जाती है । पर हमारे देश की सीमा में जो राष्ट्रवाद का बाढ़ उफान मार रहा है वह थमने का नाम नहीं ले रही है । बाढ़ से दोनो तरफ के सीमावासी आक्रांत है सब अपना घर और क्षेत्र को बाढ़ से बचाना चाहते हैं । इसी लिए क्रुद्ध हो कर मारपीट कर दिया । जिस को राष्ट्रवाद को जामा पहना कर राजनीति करने से भी नहीं बाज आए । कल तक सप्तरी के तिलाठी वासियों को शंका की नजर से देखा जाता था । उन्हे इस देश का नागरिक मानने के लिए भी शासक इंकार करते थे । आज अचानक वही तिलाठी वासी देश प्रेमी और राष्ट्रवादी हो गए ? जब यही तिलाठी मधेश आंदोलन मे पुलिस की लाठी खा रही थी तब कहां था यह राज्य ? तब क्यो नहीं माना गया उन्हें राष्ट्रवादी और देश प्रेमी ? तब भी तो वह मधेशियों के हक के लिए ही लड़ रहे थे । पडोसी से ताबड़तोड़ मारपीट करने और खून बहने के बाद राष्ट्रवादी ?
हाय रे इस देश का राष्ट्रवाद । जाने कहां कहां जा कर छुप जाता है यह कलमूहां ? और जब इस के डीएनए को ढूंढा जाता है तब यह नागरिकता में मिलता है । आप या आप के माता, पिता और उन के वंशज इस देश में पैदा हुए हंै तो वह राष्ट्रीयता के डीएनए टेस्ट में पास और नहीं तो फेल । हम इस देश में पैदा हुएं या इस देश के संतान हैं इस चीज की पुष्टि और मान्यता तब जा कर होती है जब देश की सीमा में पड़ोसी के झड़प में हम घायल हों और हमारा खून बहे । जितना ज्यादा आप घायल होंगे या आपका खून बहेगा उतना ही ज्यादा आप राष्ट्रवादी और देशप्रेमी कहलाएँगे

राष्ट्रवाद के नाम पर मगरमच्छ का आंसु बहा ले तो वह खुंखार देशप्रेमी बन जाता है । सरकार चलाने वालों को यह तनिक भी समझ नहीं है कि बिना ईमानदारी और नैतिकता के कोई भी राष्ट्रवादी या देश प्रेमी नहीं बन सकता । जिसके जड़ में ही बेईमानी हो वह राष्ट्रवाद का प्रहसन करे तो खेत में चिड़ियों को भगाने के लिए रखा गया बिजुका से ज्यादा नहीं लगता ।

जैसे सप्तरी के तिलाठी में देव नारायण यादव अचानक से तब हीरो बन गए जब बांध के विषय मे उनकी सीमा पार के लोगो से झड़प हुई । झड़प में यादव घायल हुए और उनका खून बहा तो वह रातो रात डा. गोविन्द केसी से भी ज्यादा चर्चित हो गए और सोशल मीडिया पर छा गए और महान राष्ट्रवादी और देश प्रेमी हो गए । उस से पहले इस देश की राज्य सत्ता उन्हें अपना नागरिक मानने को भी तैयार नहीं थी । देवनारायण यादव पड़ोसी के खिलाफ जंग मे देवता का पर्याय बन कर तुरुप का पत्ता हो गए । हमारा राष्ट्रवाद पड़ोसी से झगड़ा करने और जीतने मे ही गौरवान्वित होता है ।
लोग प्रकृति के खिलाफ जाने का दुस्साहस करते हैं जिसके कारण प्रत्येक साल हम बाढ़ और भूस्खलन् को विपत्ति के रूप में भोगते हैं । उतर की तरफ हिमालय है और सभी नदियां हिमालय से हिमनदी के रूप मे निकल कर बहती हुई दक्षिण की मैदानी इलाके में प्रवेश करती है । बाढ़ उत्तर हो या दक्षिण हर साल अपना तांडव दिखाती ही है । अब दक्षिण के लोग सतर्क रहते हुए बांध और हाइवे बना कर पानी को नियन्त्रण कर रहे तो इस में बुरा ही क्या है ? वह सक्षम है अपनी सुविधा के हिसाब से खुद को सुरक्षित कर रहे हैं । हम भी अपनी क्षमता विकसित कर के नदी के अपनी तरफ के हिस्से में बांध बनवाए और हाईवे का निर्माण करें । पर नहीं हमें विकास और निर्माण से तो कोई मतलब नहीं पर बहाना बना कर दूसरों से विवाद करने में हमे कोई नहीं जीत सकता । छोटे–छोटे विकास निर्माण के कामों मे भी हम दूसरों का मुँह ताकते हैं ।
इस देश में मोमो से भी ज्यादा कुछ हिट है तो वह है रटा रटाया राष्ट्रवाद । इस राष्ट्रवाद में पीएचडी करने वाले राष्ट्रवादियों नें रंग, जात और रहन सहन के आधार पर कौन राष्ट्रवादी है और कौन देशद्रोही यह पता लगा कर उनको अलग–अलग खेमें में विभाजित कर देते हैं । कोई बकाया टैक्स पे न करे कोई बात नहीं । पर राष्ट्रवाद के नाम पर मगरमच्छ का आंसु बहा ले तो वह खुंखार देशप्रेमी बन जाता है । सरकार चलाने वालों को यह तनिक भी समझ नहीं है कि बिना ईमानदारी और नैतिकता के कोई भी राष्ट्रवादी या देश प्रेमी नहीं बन सकता । जिसके जड़ में ही बेईमानी हो वह राष्ट्रवाद का प्रहसन करे तो खेत में चिड़ियों को भगाने के लिए रखा गया बिजुका से ज्यादा नहीं लगता ।
यदि थोड़ा सा खून बहाने से ही देश प्रेमी का सर्टिफिकेट मिल जाता है तो हम सब हर महीने सिंह दरवार में जा कर अपना खून देने को तैयार है । हम दूध के पैकेट की तरह अपना खून राष्ट्रवाद के नाम पर देने के लिए तैयार हैं । हमारे खून के डीएनए करवा कर देख लेना जरुर कहीं यह पड़ोसी का खून तो नहीं है । या यह भी हो सकता है कि बांकी सामानो की तरह खून भी सीमा से दो नंबरी कर के कहीं लाया नहीं गया हो ? इस बात की पड़ताल कर लेना सरकार कहीं इस मे पड़ोसी की कोई साजिश तो नही ? आखिर आप उत्तर के पड़ोसी का आरती उतारते तो हो दक्षिण के पड़ोसी को आप और आपकी तथाकथित राष्ट्रवादी जनता फूटी आंख देख नहीं पाती ।
राष्ट्रवाद का जो हौव्वा इस देश में पिछले कुछ महीनें से खड़ा किया गया है उस से मधेश की जनता डरने लगी है । कहीं इस अंधे राष्ट्रवाद की बेतोड़ की आंधी मे उन्हे पड़ोसी के घर में ही ले जा कर ना पटक दे । उत्तर के तरफ के पड़ोसी के घर में गिरे तो महान राष्ट्रवादी और दक्षिण के तरफ के पड़ोसी के घर में गिरे तो कलकिंत देशद्रोही माने जाएँगें उत्तर में हिमाल है इसीलिए उत्तर अच्छा और सच्चा है । पर दक्षिण तो मैदानी इलाका है वहां तो बस चोर और डाकु ही रहते हैं ।
पहाड़ में रहने वाले लोग तो पैदा होते ही इस देश के नागरिक बन जाते हैं । वह इस देश में पैदा न भी हो तो प्रशान्त तामागं की तरह पहाड़ी नाक नक्शे से ही अपने आप नेपाली स्वीकार लिए जाते हैं । पर इस देश के मधेश या सीमावर्ती क्षेत्र में रहने वाले अपने नाक, नक्श और वर्ण के कारण हमेशा ही संदेह के घेरे में रहते हैं । मधेश की जनता को अपनी राष्ट्रीयता का डीएनए टेस्ट बार–बार कराना पड़ता है । इस देश की राज्यव्यवस्था उनको अंगीकृत मानती है और नागरिकता को देख कर भी संतुष्ट नहीं होती । यदि ऐसा नहीं होता तो देव नारायण यादव और उस के जैसे हजारों लोग बर्षों से तिलाठी में रहते आए हैं किसी ने उनकी खोज खबर नहीं ली । पर बाढ़ और बांध से पीड़ित वहां के स्थानीयवासी जब पड़ोसी से विवाद करने लगे और झड़प हुई तो अचानक से तिलाठी वासी राष्ट्र वादी और देशभत्त mहो गए ? यह राष्ट्रीयता का डीएनए देव नारायण के खून में था या कोशी के पानी में या पड़ोसी के साथ हुए झगड़े में ? अभी तक इस देश की राज्य सत्ता नागरिकता का डीएनए टेस्ट कर के संतुष्ट नहीं थी । पर कोशी में बहे तिलाठी वासी के खून का डीएनए टेस्ट कर के उन के अंदर का राष्ट्रवाद और देश प्रेम को सभी ने मान लिया और जय जयकार किया । जय हो राष्ट्रवाद की ।

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz