राष्ट्रवाद की थोंथी दलील

श्रीमन नारायण:भारत की ऊर्जा विकास कम्पनी जीएमआर के द्वारा निर्माण होने जा रहे अपर कर्ण्ााली पनविजुली योजना का भविष्य और अधिक अनिश्चित बन गया है। यद्यपि नेपाल सरकार ने इसकी उत्पादन क्षमता को बढÞाकर तीन सौ मेगावाट से ९ सौ मेगावाट कर दिया है तथा निर्माण कम्पनी को नईदिल्ली में अपना सर्म्पर्क कार्यालय खोलने की इजाजत भी दे दी है। साथ ही र्सर्भे की इजाजत को भी ६ माह के लिए और बढÞा दिया गया है। इसका अर्थ है, ६ माह के अन्दर कम्पनी, आयोजना का निर्माण कार्य शुरु कर देगी।
परन्तु इसका निर्माण कार्य शुरु भी हो सकेगा, कहना मुश्किल है। पंचायतकालीन तीस वर्षके संकर्ीण्ा राष्ट्रवाद के नारों को बुलन्द करनेवाली नेपाल की सम्यवादी पार्टर्ीीमाओवादी) का मोहन वैद्य समूह इसका कडÞा विरोध करती आई है। पिछले ढर्Þाई साल से इसका विरोध हो रहा है। मोहन वैद्य समूह से सन् २०१० के मई-जून में भी जीएमआर के आयोजना स्थल के कार्यालय में तोडÞफोड किया गया था। महज दो माह पहले, दो सौ लोगों की सहभागिता में कर्ण्ााली पनविजुली लिमिटेड बनी है। यह कम्पनी जीएमआर को यहाँ से भगाकर खुद आयोजना हथिया लेना चाहती है। नई कम्पनी में स्थानीय मोहन वैद्य समूह के नेताओं का हाथ है, वे लोग ही इस में सब कुछ है। राजनीतिक रुप में भी मोहन वैद्य समूह इसके विरोध में खुलकर लगा है तो नई कम्पनी और कर्ण्ााली सरोकार समाज ये सभी संगठन या संस्थाएँ दरअसल भारत विरोधी मानसिकता से ग्रसित हैं। माओवादी पार्टर्ीीे अन्दर का विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। उनके दस वर्षके गुरिल्ला युद्ध के दौरान सिलिगुडÞी में मोहन वैद्य, चेर्न्नई में सीपी गजुरेल, लखनउ में सुरेश आले मगर एवं पटना में गिरफ्तार एक दर्जन भर नेता भारत विरोध के किसी भी अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहते हैं। प्रचण्ड एवं डा. बाबुराम भट्टर्राई को कुछ भी नहीं होना परन्तु इन नेताओं का गिरफ्तार होना महज एक संयोग नहीं, भारत की रणनीति का हिस्सा था, ऐसा इनका मानना है। परियोजना के विरोध की एक वजह यह भी हो सकती है कि जीएमआर ने दाहाल एवं भट्टर्राई को चन्दा वगैरह दिया हो और इन्हें कोई तबज्जो नहीं दिया। प्रचण्ड पक्ष इसलिए परियोजना के पक्ष में कुछ नहीं बोलता कि कहीं उसके ऊपर यह आरोप न लगे, कि पार्टर्ीीारत र्समर्थक है, वैद्य समूह भारत के समक्ष अपनी हैसियत भी दिखाना चाहती है और इसका श्रीगणेश एक बडÞी परियोजना के विरोध से हो रहा है। ऊपर से तर्क यह दिया जा रहा है कि नेपाली मिट्टी पर एक विदेशी व्यापारिक कम्पनी इतनी बडÞी पनविजली परियोजना के निर्माण का जिम्मा देने से राष्ट्रघात होगा। लिहाजा इसे वे लोग खुद बनावेंगे। विदेश में रहनेवाले नेपाली लोगों से आर्थिक सहायता ली जा रहा है। माओवादी र्समर्थक लोग सरोकार समाज के नाम पर धन इकट्टा कर परियोजना निर्माण करना चाहते हैं।
कहा जाता है कि नौ सौ मेगावाट क्षमतावाली यह परियोजना काफी सस्ती है। काफी सस्ती होकर भी इसके १ मेगावाट बिजली के निर्माण में ग्यारह करोडÞ रुपये खर्च आएगे। कुल खर्च दश हजार करोडÞ के र्इदगर्ीद होगा। क्या महज कुछ लोगों के द्वारा पैसा इकठ्ठा कर लेने भर से इतनी बडÞी परियोजना बन पाएगी – फिर से हथियार उठाने की बात करनेवाली, कदम कदम पर व्रि्रोह की बात करने वाली पार्टर्ीीी बातों में आकर कौन सा दाता, देश निवेश करने दौडÞकर आएगा – कहा जाता है कि यह एक सस्ती परियोजना है। लिहाजा खुद नेपाल ही इसका निर्माण करे, अच्छी बात है। परन्तु आज तक क्यों नहीं बन पाया – देश में अनेकों पनबिजुली परियोजनाएं हैं, इसका सञ्चालन क्यों नहीं हुआ – जीमएआर के साथ अनुबन्ध होने से पहले इस विषय पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया – nepal rastrabad
दर असल जीएमआर का प्रस्ताव नेपाली एवं कुछ विदेशी कम्पनियों को भी रास नहीं आ रहा है। जीएमआर बिजुली उत्पादन शुरु करने के बाद कुछ प्रतिशत बिजली मुफ्त में नेपाल को देगी ही तथा इस परियोजना के लिए बनानेवाली संयुक्त निवेश की कम्पनी में नेपाल विद्युत् प्राधिकरण को बिना एक कौडÞी निवेश किए सत्ताइस प्रतिशत स्वामित्व देगी। इतना विरोध के बावजूद अगर जीएमआर इस परियोजना का निर्माण कर लेती है तो यह एक नजीर बन जाएगी और भविष्य में इन्ही शतोर्ं पर अन्य कम्पनियाँ भी काम करने के लिए बाध्य होंगी। लिहाजा यह परियोजना ही नहीं बन पाए, ऐसा ताना-बाना बुना जा रहा है और इस में शामिल हैं कथित राष्ट्रवाद के स्वघोषित पैरोकार। पचीस वर्षके बाद इस परियोजना का पर्ूण्ा स्वामित्व नेपाल को मिल जाएगा। जीएमआर के इतने अच्छे प्रस्ताव का विरोध हो रहा है। भूटान में भी कमोवेश इसी तरह का सम्झौता भारतीय ऊर्जा कम्पनप्ी ने किया था। आज भूटान की स्थिति काफी अच्छी है।
जीएमआर का विरोध करनेवाले नेपाल के कथित राष्ट्रवादी त्रिशूली ३ए का विरोध क्यों नहीं करते – जहाँ स्थानीय जनता, राजनीतिकर्मी, चार पर्ूव ऊर्जामन्त्री, नेपाल विद्युत प्राधिकरण के सञ्चालक समिति के सदस्यों के उग्रविरोध के बावजूद सरकार ने वषर्ात् के मौसम में अतिरिक्त ३० मेगावाट विद्युत उत्पादन के लिए चीन की ऊर्जा कम्पनी को इजाजत दिया है। इससे न सिर्फनेपाल के तीन अरब रुपये अधिक खर्च होंगे अपितु दो साल का अतिरिक्त समय भी लगेगा। भण्डारण क्षमता के अभाव मंे आज भी वषर्ात के मौसम में बिजली बेकार जा रही है, ऊपर से फिर आ बैल मुझे मार !
चीन के जिस निर्माण कम्पनी को त्रिशूली २ए का जिम्मा दिया गया है, उसे नेपाल की ही एक कम्पनी सिन्जेन ने खुद ब्लैक लिस्टेड किया है तथा सरकार से भी काली सूची में नाम डालने का आग्रह किया था, परन्तु सरकार ने उसे और अधिक महत्त्व दिया। विकास कार्य में बाधक किसी को भी नहीं बनना चाहिए, खास करके तब जब वह आपके हित में हो, देश हित में हो। देश में जारी लोडसेडिंग की भयावह अवस्था एवं खुद की आर्थिक क्षमता आदि को देखते हुए खोखले राष्ट्रवाद के नारांे से ऊपर उठना ही होगा।

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