राष्ट्रवाद के नाम पर

श्रीमन नारायण
भारत के विरोध पर आधारित नेपाली राष्ट्रवाद के फेविकोल ने भले हीं ओली सरकार को एक जीवनदान दे दिया हो पर अनेकों बैशाखी के सहारे लड़खड़ाती हुई चल रही यह सरकार किसी भी समय धड़ाम से गिर सकती है । एक माह पूर्व, एमाले अध्यक्ष तथा देश के प्रधानमन्त्री के.पी. शर्मा ओली एवं माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड के बीच हुई नौ सुत्रीय समझौतों के कुछ बिन्दुओ पर बारीकी से समीक्षा किया जाय तो यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रथम दृष्टि में एमाले अध्यक्ष ने बाजी मार ली है तथा बड़ी ही आसानी से उन्होंने माओवादी सुप्रिमो को अपने चतुर सलाहकारो के जरिए शब्दाें के घने जंगल मे उलझाने मे सफलता पायी है । भय एवं त्रास के साये में जी रहे माओवादी के नेताओं के लिए एक तिनके की सहारे की जरुरत थी जो फिलहाल उन्हें हाथ लगी दिख रही थी पर हकीकत यह है कि माओवादी के लिए यह तिनका काम नहीं आने वाला है और उन्हें किसी नए ठिकाने की तलाश करने ही होंगे । अब माओवादियों को लगने लगा है कि राष्ट्रवाद का फेवीकोल सिर्फ ओली की ही कुर्सी को महफूज रख सकती है इससे उन्हें कुछ लाभ नहीं होने जा रहा ।
एमाले अध्यक्ष ओली एवं माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड के बीच हुए नौ सुत्रीय समझौतों में सबसे अहम बिन्दु माओवादी के दस वर्षो के सशस्त्र युद्ध (जिसे माओवादी लोग जनयुद्ध कहना पसन्द करते हैं) के दरम्यान हुए अपराध की घटनाओं एवं देश के विभिन्न अदालतों में चल रहे विचाराधीन मुद्दों में उन्हें माफी मिल सके इसके लिए देश के कानून में आवश्यक परिवर्तन करना है । इसमे ओली ने बतौर एमाले पार्टी अध्यक्ष तथा प्रधानमन्त्री दोनों की हैसियत से हस्ताक्षर किया है । इस सहमति का विरोध करते हुए अधिवक्ता अनन्तराज लुईटेल ने सर्वोच्च अदालत में मुद्दा भी किया परन्तु अदालत ने इसे राजनीतिक विषय कहकर मुद्दा को ही खारिज कर दिया । नौ सुत्रीय समझौतों ने देश के कानून के जानकाराें एवं स्वतन्त्र विश्लेषकों को भी हैरत मे डाल दिया है । आखिर देश राजनीतिक सहमति के दस्तावेज के आधार पर चले या संविधान और कानून के अनुसार ।
क्या किसी सरकार को टिकाने के लिए राजनीतिक सहमति बनाकर कानून एवं कानून के शासन को चुनौती दी जा सकती ? और राजनीतिक सहमति से अन्तरराष्ट्रीय कानून के प्रयोगों को भी निष्प्रभावी बनाया जा सकता है या नहीं ? माओवादी से अलग होकर विभिन्न घड़ों में राजनीति कर रहे करीब एक दर्जन पूर्व माओवादी दलों के बीच एकीकरण हुआ । उसका मुख्य एजेण्डा यही था कि अदालत मे विचाराधीन अवस्था मे रहे मुद्दो को सत्य निरुपण तथा मेलमिलाप आयोग को देना ताकि किसी के उपर भी मुद्दा ही नहीं चलाया जा सके । इसके लिए जरुरत पड़ी तो संविधान एवं देश के कानून में भी आवश्यक संशोधन किया जाए । करीब दर्जन माओवादी दलो की एकता की खुशीयाली में मिठाई खाने में व्यस्त माओवादी नेताओं के चेहरे पर हवाई तब उड़ने लगी जब एमाले अध्यक्ष ओली के द्धारा ही नियुक्त नेपाल सरकार के महान्यायाधिवक्ता हरी फुयाल ने उन्हे यह मशवरा दिया कि जनयुद्धकालीन गम्भीर अपराध में माफी के लिए राष्ट्रपति के समक्ष सिफारिस नहीं किया जा सकता है । द्वन्द्व के नाम पर गैर राजनीतिक घटना में किसी की सजा माफी के लिए सिफारिस किया जाएगा तो वह सर्वोच्च अदालत के फैसले के विपरीत होगा लिहाजा ऐसे कदम न उठाए जाए । साथ ही उन्होंने देश के नए संविधान की धारा २७६ का हवाला देते हुए कहा कि माफी सम्बन्धी कानून बनाते वक्त सर्वोच्च अदालत के फैसला एवं अन्र्तराष्ट्रीय कानून को भी ध्यान मे रखना आवश्यक है ।
फिलहाल जनयुद्ध में हुए जघन्य अपराध के आरोप में माओवादी सुप्रिमो प्रचण्ड के ऊपर देश के विभिन्न जिलो में ३७ मुद्दा दायर किए गए हैं जबकि पूर्व माओवादी नेता डा. बाबुराम भट्टराई पर १४ तथा रामबहादुर थापा एवं अग्नि सापकोटा सरीखे नेताओं पर भी विभिन्न अदालतो में मुद्दा चल रहा है । माओवादी के नेताआें पर अपहरण एवं हत्या सम्बन्धी मुद्दा दायर किए गए है ।
नौ सुत्रीय समझौतों का हवा निकालने का काम तो सत्य निरुपण तथा मेलमिलाप आयोग के अध्यक्ष सुर्य किरण गुरुङ ने भी किया । प्रधानमन्त्री ओली द्धारा अपनी कुर्सी को बचाने के लिए नौ सुत्रीय सहमति मार्फत माओवादी सुप्रिमों को यह लिखित आश्वासन दिया गया था कि माओवादी के खिलाफ लगे सभी मुद्दे वापस ले लिए जाएंगे परन्तु गुरुङ ने कहा कि गम्भीर प्रकृति के मानवाधिकार उल्लंघन की घटना में किसी को भी माफी नहीं दी जा सकती है । क्याेंकि अन्र्तराष्ट्रीय तौर पर भी इसको मान्यता मिलनी चाहिए । यहा“ अगर माफी दे भी दिया जाएगा तो अन्र्तराष्ट्रीय क्षेत्राधिकार आकर्षित होगा । वैसे भी इस तरह के विषय खास देशों तक में ही सीमित तो रहते नहीं है ?
उनका सुझाव था द्वन्द्व के नाम में विद्रोही पक्ष या राज्य के द्वारा हुए बलात्कार, निहत्थे लोगों की गैर न्यायिक हत्या, अपहरण, लापता, सम्पत्ति कब्जा, हिरासत में यातना एवं हत्या, चन्दा या भोजन नहीं देने के कारण हत्या, घर में आगजनी, मारपीट कर अपाहिज बनाना, बाल सैन्य भर्ती, कब्जा में लेकर हत्या करना सरीखे अपराध में अगर माफी दिया जाएगा तो अन्र्तराष्ट्रीय समुदाय इसे स्वीकार नहीं करेगा । अन्र्तराष्ट्रीय सन्धि अनुसार अगर हम सिफारिस नहीं करेंगे तो राष्ट्र संघ का त्रिव्युनल यहा“ आएगा और अन्र्तराष्ट्रीय मापदण्ड के हिसाब से देखेगा फिर परिस्थिति बिगड़ जाएगी । श्रीलंका में तमिल विद्रोह की घटना की छानबिन एवं कारवाई के लिए पुर्व राष्ट्रपति महिन्द्रा राजापाक्षे एवं वर्तमान राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसेना के द्वारा गठित अलग–अलग आयोगों को राष्ट्र संघ ने मान्यता देने से इनकार कर दिया है लिहाजा हमें इन चीजो पर भी ध्यान देना चाहिए । उनके इस सुझाव के बाद माओवादी के नेता एवं कार्यकर्ता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं ।
नेपाल के सर्वोच्च अदालत ने २०७१ साल फागुन १४ गते को दिए अपने फैसले में कहा है कि गम्भीर अपराध में किसी को माफी नहीं दिया जा सकता है । माओवादी पीड़ित एक नागरिक के द्वारा दायर रिट में सर्वोच्च अदालत ने कहा कि द्धन्द्धकाल में इस प्रकृति के फौजदारी कुसूर में नहीं मुद्दा वापस लिया जा सकता है ना ही माफी दी जा सकती है । संविधान संशोधन के लिए कांग्रेस के समर्थन की दरकार होगी जो सम्भव नही दिखता । वैसे नौ सुत्रीय समझौतो के सार्वजनिक होते ही माओवादी पीड़ितों ने प्रधानमन्त्री ओली के निवास का घेराव किया था । ओखलढुंगा से पुर्व सांसद बालकृष्ण ढुंगेल के खिलाफ सर्वोच्च अदालत ने जनवरी ७ तारीख को दिए अन्तिम फैसले के कार्यान्वयन के लिए भी सरकार को पत्र दिया जा चुका है । सर्वोच्च अदालत के फैसले से माओवादी के नेता एवं कार्यकर्ता घबराए हुए है तथा वे अपनी गर्दन फंसी हुई महसूस कर रहे हैं । नौ सुत्रीय समझौतों से उन्हें आस जगी भी परन्तु धीरे–धीरे उन्हें यह एहसास होने लगा है कि क्यों झापा के कुमाई ब्राह्मणाें को नेपाल में अधिक कुसाग्र बुद्धि का माना जाता है ? कृष्ण बहादुर महरा ने संसद में ही कहा था कि क्या ओली के प्रधानमन्त्री रहते हम लोग जेल जाएँ ? उसके वाद से ही सरकार के नेतृत्व परिवर्तन का प्रयास हुआ था पर अदालती भय से समझौतों के कागज पर माओवादी के नेता ने दस्तखत कर सरकार की आयु तो बढ़ा ही पर उनकी खुद की मुसीबत टलती नहीं दिख रही ।
कहा जाता है कि उत्तरी पड़ोसी के आश्वासन और राष्ट्रवाद के नाम पर प्रचण्ड ने ओली सरकार को समर्थन जारी रखने का निर्णय किया था । शर्त यह कि आर्थिक वर्ष २०१६÷२०१७ का बजट आते ही ओली जी पद से राजीनामा दे कर प्रचण्ड जी के लिए कुर्सी छोड़ देंगे परन्तु अब जबकि प्रचण्ड ओली से पुरानी सहमति के अनुसार पद छोड़ने को बोल रहे हैं तो ओली का जबाब है कि इस विषय पर कोई बात ही नहीं हुई थी । प्रचण्ड अब अगर सरकार से समर्थन वापस ले ले तो भी उनपर यकीन कौन करेगा ? मधेशवादी नेता बनते–बनते घर वापसी को पसन्द करने वाले माओवादी नेता मातृका यादव ने एकीकरण के बाद कहा कि ओली पर भरोसा न किया जाए वरना हमे धोखा मिलेगा । एक दूसरे को धोखा देना तो कम्युनिष्टों की फितरत रही है । वैसे नौ सुत्रीय समझौतों ने फिलहाल माओवादी को असमंजस में तो डाल ही दिया है । राष्ट्रवाद के नाम पर माओवादी ने भले ही एमाले को अपना समर्थन दिया हो पर शायद वे भूल गए कि नेपाल मे राष्ट्रवादी होने के लिए सिर्फ भारत के विरोध करने का नाटक भर करना होता है सचमुच में न तो यह मुमकिन है न अब तक कोई कर पाया है ।

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