राष्ट्रवाद बनाम मधेशवाद

मुरली मनोहर तिवारी
नेपाल में संविधान जारी होने से अब तक राष्ट्रवाद और मधेशवाद में जंग छिड़ी हुई है, ऐसा लगता नेपाल दो खेमों में बंट गया है । एक राष्ट्रवादी जिसे पहाड़ी समाज नेतृत्व कर रहा है, दूसरा मधेशी समाज । आइए समझे दोनों में क्या अंतर है । राष्ट्र कहते हैं, एक जन समूह को, जिनकी एक पहचान होती है, जो कि उन्हें उस राष्ट्र से जोङÞती है । इस परिभाषा से तात्पर्य है कि वह जन समूह साधारणतः समान भाषा, धर्म, इतिहास, नैतिक आचार, या मूल उद्गम से होता है ।
मधेशवाद, मधेशी लोगों के समूह की उस आस्था का नाम है जिसके तहत वे खुद को साझा इतिहास, परम्परा, भाषा, जातीयता और संस्कृति के आधार पर एकजुट मानते हैं । इन्हीं बंधनों के कारण मधेशी इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उन्हें आत्म–निर्णय के आधार पर अपने सम्प्रभु राजनीतिक समुदाय की स्थापना करने का आधार है ।
नेपाली राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर रहने वाले लोगों को अपने–अपने राष्ट्र का अस्तित्व स्वाभाविक, प्राचीन और स्थिर लगता है । इस विचार की ताकत का अंदाजÞा इस हकीकत से भी लगाया जा सकता है कि इसके आधार पर बने समुदाय वर्गीय, जातिगत और धार्मिक विभाजनों को भी लाँघ रहे हैं । जब राष्ट्र–राज्य की स्थापना हो रही है तो उसकी सीमाओं में रहने वालों की अपेक्षा हो जाती हैं कि वे अपनी विभिन्न अस्मिताओं के ऊपर अपने राष्ट्र–राज्य (मधेश) के प्रति निष्ठा को ही अहमियत दें और अपने राज्य के बेहतरी के लिए आवाज उठाए । वे राष्ट्र–राज्य (मधेश) के कानून का पालन करेंगे और उसकी आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान भी दे देंगे । सामान्य अर्थाें में राष्ट्र शब्द देश का पर्यायवाची बन जाता है, एक राष्ट्र कई राज्यों में बँटा हो सकता है ।
राष्ट्रवाद को १८वी सदी से पहले तक कोई जानता तक नहीं था । पिछले २०० सालों से राष्ट्र और राष्ट्रवाद का स्वरूप उभरता चला गया । रवींद्रनाथ ठाकुर जैसी हस्तियाँ इस विचार को संदेह की निगाह से देखते थे । उन्होंने राष्ट्रवाद को अजगर नीति और उच्चकों की शरणस्थली भी कहा था ।
राष्ट्रवाद १८वी सदी की सबसे ताकतवर विचारधारा रही है । जिसने इंसानो को हमेशा–हमेशा के लिए बदल डाला । राष्ट्रवाद विभिन्न विचारधाराओं को भी अपने आगोश में समेट लेता है । गौर करने से साफ हो जाता है कि किस प्रकार राष्ट्रवाद के प्रश्न के साथ कई सैद्धांतिक उलझनें जुड़ी हुई हैं । मसलन, राष्ट्रवाद और आधुनिक संस्कृति व पूँजीवाद का आपसी संबंध क्या है ? पश्चिमी और पूर्वी राष्ट्रवाद के बीच क्या फर्क है ? एक राजनीतिक परिघटना के तौर पर राष्ट्रवाद प्रगतिशील है या प्रतिगामी ? हालाँकि धर्म को राष्ट्र के बुनियादी आधार के तौर पर मान्यता प्राप्त नहीं है, फिर भी भाषा के साथ–साथ धर्म के आधार पर भी राष्ट्रों की रचना होती है । सवाल यह है कि ये कारक राष्ट्रों को एकजुट रखने में नाकाम क्यों हो जाते हैं ? सांस्कृतिक और राजनीतिक राष्ट्रवाद को अलग–अलग कैसे समझा जा सकता है ?
यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरुरी है कि आपस में समानता होने के बावजूद राष्ट्रवाद, देशभक्ति और मधेशवाद में अंतर है । अव्वल तो राष्ट्रवाद और देशभक्ति में मीलों का अंतर है । राष्ट्रवाद अनिवार्य तौर पर किसी न किसी कार्यक्रम और परियोजना का वाहक होता है, जबकि देशभक्ति की भावना ऐसी किसी शर्त की मोहताज नहीं है । और मधेशवाद किसी सीमित मुद्दा और अधिकार के लक्ष्य प्राप्ति का जरिया है ।
माक्र्सवाद भी राष्ट्रवाद से संबंधित सिद्धांत मुहैया कराने में नाकाम रहा है । दुनिया भर के मजÞदूरों को एक होने का नारा देने वाले माक्र्स और एंगेल्स मानते थे कि मजÞदूरों का कोई देश नहीं होता । इस तरह माने तो मधेश और नेपाल के सारे मजदूर किसी श्रेणी में नहीं आते । फिर एमाले, माओवादी का राष्ट्रवाद महज एक छलावा सिद्ध होता है ।
दरअसल, राष्ट्रवाद से संबंधित सभी व्याख्या थोड़ी दूर चलने के बाद पेचीदा हो जाती हैं । राष्ट्रवाद के धार्मिक संस्करण (जैसे, ईरान का इस्लामिक राष्ट्रवाद या भारतीय राजनीति के धार्मिक पहलू) सेकुलरीकरण की प्रक्रिया को अगर पूरी तरह ठप नहीं कर पाते तो धीमा अवश्य कर देते हैं । दूसरे, तीसरी दुनिया के अधिकतर देशों में राष्ट्रवाद करीब आधी सदी बीत जाने के बाद भी उद्योगीकरण और खेतीहर अर्थव्यवस्था की जद्दोजहद में फँसा हुआ है ।
राष्ट्रवाद वस्तुतः उपनिवेशवादी राजनीतिक आंदोलनों के हाथों गढ़े जाने के कारण मूलतः राजनीतिक विषय है । नेपाल के उपनिवेशवादियों ने मनमाने ढंग से मधेशियों की उपेक्षा की जिसके कारण नेपाल और मधेश, जातीय समुदाय के परस्पर संघर्ष में विभाजित हो गये हैं ।
राष्ट्रवाद और मधेशवाद के संघर्ष में फासीवादी सोच भी सामने आयी है, जैसे जर्मनी में साठ लाख यहूदियों को भट्ठी में झोक दिया गया, उसी प्रकार मधेशियों की हत्या हो रही है । ये राष्ट्रवाद के खतरे हैं । इन खतरों पर तब और ज्यादा सजग और सतर्क होना चाहिए, जब सत्ताधारी दल इसकी खूबीयाँ बघारने में लग जाएं ।
पहाड़ी दलो के पास राष्ट्रवाद की अंतिम परिभाषा नहीं है । उसका इरादा लोकतंत्र को खत्म कर देना है । क्या कभी ऐसा होता है, किसी पहाड़ी दल का कार्यकत्र्ता किसी निति, घटना, घोटाले के वक्त अपने ही दल के खिलाफ देश हित में नारे लगा रहे हो, कि उनके लिए दल नहीं देश महत्वपूर्ण है । निंदा–परनिंदा छोड़ दिया जाए तो भी दलों की राजनीति, सिर्फ दलों के हित के लिए होती है ।
हिंसा का इतिहास हर पहाड़ी दल के सरकार में मिलेगा । हम हर घटना को राष्ट्रवाद के चश्मे से नहीं देख सकते । मधेशी की हत्याएँ किस सरकार में नहीं हुई ? क्या कोई भी हाथ में नेपाली झंडा लिए खड़ा हो जाएं, वह बड़ा राष्ट्रभक्त माना जाएगा ? आखिर कब तक झंडा लेकर मधेशी को डराया जायेगा । कौन कहता है मधेशी राष्ट्रभक्त नहीं होते ? बिल्कुल होते हंै, हर मधेशी अपनी सोच के हिसाब से देश को संवारने सजाने की ही कल्पना करता है । मधेशी कार्यकत्र्ता भी पहाड़ी दल को अपना जीवन सौंप देते हंै, पर उन्हें धर्म, रंग, नश्ल, जात, भाषा के नाम पर चिन्हित कर प्रताडि़त किया जाता है ।
नेपाल में राष्ट्रवाद एकाधिकार लादने का हथकंडा है । एकाधिकारवाद में आवाम वो नहीं कर सकते जो राज्य और उसके मुखिया को पसंद नहीं हो । सत्ता पर जिस दल का कब्जÞा है, वह प्रशासन के दम पर विरोधी के नाक में दम कर देती है ।
जब भी कोई पहाड़ी दल राष्ट्रवाद का नारा उछाले, तो उसका इरादा राष्ट्रवाद नहीं, राष्ट्रवाद के नाम पर एकाधिकारवाद कायम करना होता है । हर पीडि़त, शोषित को चुप करा देना होता है । जहाँ किसी दल में नेता की चलती है, बाकी सब उसके इशारे पर चलते है । वहाँ मधेशी को इंसाफ से वंचित किया जाता है ? भय का माहौल कायम किया जाता है । सुनवाई होती नहीं, लेकिन फैसला पहले आ जाता है, और मधेशी दोषी करार दे दिए जाते है ।
एक राष्ट्र–एक भाषा–एक संस्कृति जैसी सोच ने नेपाल में तमाम तरह की विविधताओं को कुचल दिया, वही मधेश ने अपनी विविधताओं को इस विचारधारा के खिलाफ संघर्ष करते हुए खुद के अस्तित्व रक्षा के जद्दोजहद में है ।
नेपाली राष्ट्रवाद में टैक्स–राष्ट्रवाद का चेहरा छुपा हुआ है, क्योकि कभी ये आवाज क्यों नहीं उठती की बैंक उधोगों के करोड़ो के कजर्Þ माफ कर देती है, और गरीब किसानो के कर्ज क्यों नहीं माफ करती ? टैक्स–राष्ट्रवाद सिर्फ अमीरों की सोच है, और गरीब विरोधी है । राष्ट्रवाद महजÞ एक गाली है, एक मुक्त समाज में इसकी कोई जगह नहीं हो सकती ।
आज पूरी दुनिया एक सी भाषा बोलती है, एक सी यात्रा करती है, एक सा खाना खाती है । उसके लिए राष्ट्रीय सीमाओं के कोई खास मायने नहीं रह गये हैं । इसके अलावा आर्थिक भूमण्डलीकरण, बड़े पैमाने पर होने वाली लोगों की आवाजाही, इंटरनेट और मोबाइल फोन जैसी प्रौद्योगिकीय प्रगति ने दुनिया में फासलों को बहुत कम कर दिया है । ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो अपने देश और सांस्कृतिक माहौल से दूर काम और जीवन की सार्थकता की तलाश में जाना चाहते हैं । दुनिया में हर साल किसी नए देश का झंडा बनता है, तो कई विलीन हो जाते है, यहाँ महत्वपूर्ण जमीन नहीं जीवन है ।

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