राष्ट्राध्यक्ष की चिन्ता और मधेश की अपेक्षा : डॉ. श्वेता दीप्ति

देश की आधी आबादी मधेश में बसती है और वर्तमान में वहाँ की जनता अविश्वास की हवा में साँसें ले रही है । चुनाव की हवा साँस नहीं दे रही, बल्कि उनकी साँसों में उकसाहट पैदा कर रही है

वक्ताओं ने स्पष्ट तौर पर चेतावनी दी कि सरकार या जिम्मेदार पार्टियों के नेतागण अगर मधेश की समस्याओं को गम्भीरतापूर्वक नहीं लेंगे तो डा.राउत जैसी भावनाओं का जन्म होता रहेगा । इसलिए नेताओं को स्वहित नहीं बल्कि देश हित की ओर कदम बढ़ाना चाहिए ।


सरकार किस माहोल में और किस तरह से चुनाव को अंजाम देती है । वर्तमान परिस्थितियों का अगर आकलन किया जाय तो यही आसार नजर आ रहे हैं कि चुनाव का नजारा भी मसौदा संकलन के जैसा ही होगा और एकबार फिर शासकीय दमन की पुनरावृत्ति होगी ।


shweta dipti with president

डॉ. श्वेता दीप्ति, काठमांडू, २९ अप्रैल |  राष्ट्रपति अर्थात् राष्ट्र का अभिभावक, राष्ट्र का अध्यक्ष । देश का एक गरिमामय और सर्वोच्च पद, जहाँ बैठा शख्स किसी पार्टी विशेष का नहीं बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र का होता है, निरपेक्ष और किसी भी दुराग्रह से मुक्त । राष्ट्राध्यक्ष होने के नाते जाहिर है कि देश की बनती बिगड़ती परिस्थितियों पर इनकी तीक्ष्ण नजर होती है और अभिभावकीय चिन्ता भी । सर्वोच्च पद पर आसीन होने के बावजूद, ये कटु सत्य है कि इनकी शक्ति की सीमाएँ निश्चित और सीमित होती है । चिन्ता इन्हें होती है पर शक्तिपूर्ण समाधान करने का अधिकार इनके पास नहीं होता । जिसकी चुभन इस पद पर बैठे व्यक्ति को जरुर होती है । यह अहसास पूर्वराष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के वक्तव्यों से कई बार जाहिर हो चुका है ।
वर्तमान समय में सम्माननीय राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से भी देश की आशा, आकांक्षा और उम्मीदें जुड़ी हुई हैं । चैत्र २७ गते राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से एक सकारात्मक पहल की गई । राष्ट्रपति भवन में विभिन्न पार्टियों या संस्थाओं के व्यक्तियों का आना जाना लगा रहता है जिसकी अपनी वजह होती है । परन्तु इन सबसे परे २७ गते देश के समसामयिक विषयों पर विचार विमर्श का एक कार्यक्रम राष्ट्रपति भवन में आयोजित किया गया, जिसमें विभिन्न क्षेत्रो से आबद्ध व्यक्ति आमंत्रित थे । सम्भवतः राष्ट्रपति भवन में यह पहल, पहली बार हुई है, जो आम लोगों से सम्बद्ध होने का एक सराहनीय प्रयास है । देश के अभिभावक के समक्ष अपने क्षेत्र या देश से सम्बन्धित परेशानियों को रखने का यह एक अच्छा अवसर था । सौभाग्यवश इसमें शामिल होने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ ।
देखा जाय तो देश की नब्ज आम लोगों के पास ही होती है, जिसे परखना हमारे नेताओं का काम होता है । अगर नब्ज की सही रफ्तार समझ आ गई तो देश का कल्याण सम्भव है, वरना दुर्घटना तो अवश्यम्भावी है । इसलिए समय–समय पर जनता के समक्ष नेताओं का जाना राजनीति की एक सशक्त माँग है, किन्तु विडम्बना यह है कि नेताओं को जनता की याद सिर्फ वोट माँगने के समय आती है । उस समय जनता की परेशानियाँ, उस क्षेत्र के विकास या अविकास की बातें नेताओं की अपनी होती हैं, पर पद और पावर के साथ ही यह सारी बातें उनकी प्राथमिक सूची से कहीं दूर फिसल जाती हैं । फिलहाल देश में कथित तौर पर चुनावी बयार बताई जा रही है, जिसे अगर स्थलगत दृष्टिकोण से निरीक्षण किया जाय तो यह बयार नहीं बल्कि वो मंद हवा है जिसने देश की सम्पूर्ण क्षेत्र को नहीं, बल्कि कुछ क्षेत्र विशेष को ही छुआ है । यह और बात है कि चुनाव आयोग या राजनीतिक पार्टियों द्वारा चुनावी माहोल के दावे पर दावे किए जा रहे हैं ।
राष्ट्रपति भवन में आयोजित कार्यक्रम समसामयिक विषयों पर आधारित था, जहाँ वर्तमान समस्याओं और उसके निदान पर चर्चा होनी थी । स्पष्ट है कि यह परिचर्चा मधेश की चर्चा के बिना सम्भव ही नहीं थी क्योंकि मधेश का सवाल अभी देश के लिए सुलगता हुआ सवाल है, जिसने राजनीति के हर क्षेत्र को प्रभावित कर रखा है, भले ही उपरी तौर पर इसे नकारा जाता हो, यह और बात है । देश की आधी आबादी मधेश में बसती है और वर्तमान में वहाँ की जनता अविश्वास की हवा में साँसें ले रही है । चुनाव की हवा साँस नहीं दे रही, बल्कि उनकी साँसों में उकसाहट पैदा कर रही है । उनकी इसी उकसाहट और बैचेनी का असर उक्त कार्यक्रम में देखने को मिला । उपस्थित गणमान्य सज्जन भले ही किसी भी पार्टी विशेष से सम्बन्धित हों, पर सबने एक सिरे से यह माना कि मधेश की समस्याओं और माँग को सम्बोधित किए बिना चुनाव में जाना, या कोई जबरदस्ती करना देश को दुर्घटना की राह पर धकेल सकता है । वक्ताओं ने स्पष्ट तौर पर चेतावनी दी कि सरकार या जिम्मेदार पार्टियों के नेतागण अगर मधेश की समस्याओं को गम्भीरतापूर्वक नहीं लेंगे तो डा.राउत जैसी भावनाओं का जन्म होता रहेगा । इसलिए नेताओं को स्वहित नहीं बल्कि देश हित की ओर कदम बढ़ाना चाहिए ।
कार्यक्रम में मधेश के प्रायः सभी क्षेत्रों से लगभग ५० प्रतिनिधि उपस्थिति थे, जिनमें से जगदीश अग्रवाल(बारा), इजहार मिकरानी(रौतहट), डा.श्वेता दीप्ति(सप्तरी), डा. सुरेन्द्र झा(सिरहा), डा.सन्तकुमार दास(सप्तरी), पिंकी यादव(बारा), डा.राजेश अहिराज, हरिबाबु चौधरी, विश्वनाथ प्रसाद अग्रवाल(बारा) रामलखन हरिजन(नवलपरासी), रामनारायण देव (सप्तरी), उदितनारायण देव(सप्तरी), डा.सुरेन्द्रलाभ(धनुषा),कासिन्दर यादव (सिरहा), सरोज राय(सर्लाही), दीपक चौधरी (मोरगं),ड ा.उमाशंकरप्रसाद साह(रौतहट), बीणा झा, उपेन्द्र झा,रानी शर्मा, खिमलाल देवकोटा, विजय महासेठ, डा. उषा झा ने, सम्माननीय राष्ट्रपति के समक्ष काफी बेवाक तरीके से अपने विचारों को रखा । जगदीश अग्रवाल ने उद्योग के क्षेत्र में नई तकनीक की आवश्यकता और सरकार की आवश्यक नीतियों की ओर महामहिम का ध्यानाकर्षण कराया वहीं रौतहट के प्रतिनिधि इजहार मिकरानी ने संविधान में समावेशी के सवाल पर मुस्लिम समुदाय से जुड़ी समस्याओं को सामने रखा । भाषा की स्वतंत्रता और संविधान में उसकी मान्यता से सम्बन्धित बातों की ओर मैंने सम्माननीय राष्ट्रपति महोदया का ध्यानाकर्षण कराया और कहा कि शिक्षा अगर हमारा मौलिक अधिकार है तो उस अधिकार के संरक्षण की आवश्यकता है । मधेश के प्रायः हर घर में मित्र राष्ट्र भारत से एक बेटी बहु बनकर आती है । किन्तु यहाँ आकर उनकी शिक्षा बाधित हो जाती है क्योंकि, वो हिन्दी भाषा के माध्यम से शिक्षित होकर आती हैं जिसे यहाँ मान्यता प्राप्त नहीं है । बिहार या उत्तरप्रदेश से आई हुई बेटियाँ यहाँ आकर अपनी आगे की पढाई चाह कर भी पूरी नहीं कर पाती हैं । इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में उन्हें भाषा की स्वतंत्रता होनी चाहिए । राष्ट्रपति जी से मैंने व्यक्तिगत तौर पर अनुरोध किया कि देश के तीन सर्वोच्च पदों पर महिलाओं की उपस्थिति ने जिस गौरव का अहसास कराया था, उसे व्यवहारिक रूप में भी अमल में लाया जाना चाहिए । निर्वाचन में महिलाओं को आरक्षण नही बल्किं समान अवसर मिलना चाहिए । साथ ही देश की वर्तमान परिस्थितियों की ओर ध्यानाकर्षण कराते हुए कहा कि कोई भी देश वैचारिक सामंजस्यता से चलता है । परन्तु आज देश को जिद से चलाने की कोशिश की जा रही है । देश को जिद की नहीं जुनून की आवश्यकता है, क्योंकि जिद गलत है, जबकि जुनून कुछ पा लेने की, ऊँचाई पर जाने की चाहत होती है और यही जुनून देश को विकास की ऊँचाइयों पर ले जा सकता है । देश को वैचारिक सामंजस्यता की आवश्यकता है न कि जिद और अहम की । अगर यह माना जा रहा है कि देश के एक हिस्से को हाशिए पर रखकर निर्वाचन कराना सही है, तो यह सोच गलत है । क्योंकि देश का हर क्षेत्र चाहे वो पहाड़ हो, हिमाल हो या तराई हो देश के लिए महत्तवपूर्ण है इसे साथ लेकर चलना ही देश की निश्चित दिशा तय कर सकता है । डा. सुरेन्द्र लाभ ने काफी भावनात्मक तरीके से क्षेत्र नं. २ की समस्याओं को उठाया और अनुरोध किया कि देश फिलहाल जिस अविश्वसनीयता के दौर से गुजर रहा है, उससे देश को निकालना आवश्यक है क्योंकि देर अब भी नहीं हुई है । अर्थशास्त्र के प्राध्यापक उमाशंकरप्रसाद ने स्पष्ट तौर पर कहा कि नेताओं को अपनी मनमर्जी से नहीं बल्कि देश हित में काम करने की आवश्यकता है । चर्चा में दलित समस्या, आन्दोलन के दौरान हुए दमन और हिंसा की बातें, नेताओं के कड़वे शब्दों के प्रयोग की बातें और शहीदों के परिवार की पीड़ा को भी रखा गया और सराहनीय बात यह थी कि महामहिम ने सबों को काफी धैर्यपूर्वक और ध्यान से सुना, बिल्कुल एक जिम्मेदार अभिभावक की भाँति, जो निश्चय ही एक उम्मीद को मन में जगाता है । सबकी यह उम्मीद थी कि राष्ट्रध्यक्ष होने के नाते उनकी एक सक्रिय भूमिका की आवश्यकता देश महसूस कर रहा है और उनकी तरफ से एक सक्रिय पहल होनी ही चाहिए ।
महामहिम ने अत्यन्त शालीनता के साथ यह विश्वास दिलाया कि उनकी सीमा के अन्तर्गत जो बातें आती हैं, उसमें वो अवश्य पहल करेंगी । उन्होंने माना कि देश में पहाड़ी और मधेशी के बीच जिस दुर्भावना ने जन्म लिया है, उसके लिए कहीं ना कहीं राजनीतिक अवस्था जिम्मेदार है । स्थलगत तौर पर देखा जाय तो आज भी इन दोनों समुदायों में सौहार्द का वातावरण है, पर कहीं ना कहीं इनके मन में अविश्वास ने भी घर बना लिया है । जिसे हम सभी को मिलकर अपने स्तर से दूर करना होगा । संविधान के मसले पर उन्होंने कहा कि संविधान एक परिवर्तनशील दस्तावेज है । यह हमें मिला यह हमारी पहली उपलब्धि है, जिसका कार्यान्वयन हमारी दूसरी उपलब्धि होगी । आपने एक अच्छी बात यह कही कि, राष्ट्र है, जनता है, तो अधिकार की लड़ाई तो चलती रहती है । मैंने भी यह लड़ाई लड़ी है और मैं यह मानती हूँ कि इसमें कोई समझौता नहीं हो सकता, पर अभी जो मिला है हमें, उसका सम्मान करना चाहिए । निर्वाचन देश की आवश्यकता है, नहीं तो एक शून्यकाल सामने आएगा, जो निःसन्देह देश हित में नहीं होगा । इसलिए सभी को मिलकर आगे आना होगा । अत्यन्त आत्मीयता के साथ उन्होंने अपने विचारों को रखा । परन्तु एक कसक उनके अन्दर भी थी कि, उनके पास शक्ति से अधिक सीमाएँ हैं, जिसके तहत ही वो कदम परिचालन कर सकती हैं । यह एक संवैधानिक सच है कि, देश के सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति कई निकायों के फैसले के आधार को मानने के लिए बाध्य होता है । पर जो भी हो सम्माननीय राष्ट्रपति का यह कदम निश्चित तौर पर सराहनीय है और यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि इसे निरन्तरता दी जाएगी । शतप्रतिशत न सही आंशिक तौर पर ही कुछ तो असर जरुर दिखेगा, यह माना जा सकता है क्योंकि, उपस्थित २० प्रतिनिधि वक्ताओं में एक को छोड़ सबने माना कि देश की सबसे बड़ी माँग मधेश के अधिकारों को सम्बोधित करना है, अगर ऐसा नहीं होता है तो चुनाव की कोई सार्थकता नहीं रह जाएगी । अर्थात् मधेश में चुनाव की लहर लाने के लिए मधेश की माँग को स्थान देना होगा, यह समय की ही नहीं देश की माँग है । जिस तथ्य से हर सचेत नागरिक वाकिफ है और इस तथ्य से वह इनकार नहीं कर सकता है ।

president with madheshi
बावजूद इसके देखना यह है कि सरकार किस माहोल में और किस तरह से चुनाव को अंजाम देती है । वर्तमान परिस्थितियों का अगर आकलन किया जाय तो यही आसार नजर आ रहे हैं कि चुनाव का नजारा भी मसौदा संकलन के जैसा ही होगा और एकबार फिर शासकीय दमन की पुनरावृत्ति होगी । क्योंकि असंतोष की आग बुझी नहीं है, राख की ढेर में चिनगारी मौजूद है, जो कभी भी भड़क सकती है । देश अगर सभी का है तो सरकार को यह अहसास दिलाना ही होगा कि चुनाव सबके लिए और सबके हित के लिए है, इसलिए इसमें सबकी सहभागिता आवश्यक है । वैसे प्रचण्ड सरकार चुनाव का माहोल बनाने की पुरजोर कोशिश कर रही है । एक नए खाके के साथ सीमांकन के मुद्दे को हाशिए पर रखकर नया संशोधन विधेयक तैयार किया गया है, जिसके लिए एमाले और मोर्चा दोनों साफ तौर पर कह रहे हैं कि उन्हें इसके सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं है, ऐसे में सरकार द्वारा चलायी गयी यह तीर कहाँ तक का कारगर सिद्ध होगा देखना यह भी है । पूरा देश एक असमंजस के माहोल में साँस ले रहा है । समस्याएँ हर ओर हैं, समाधान दिख नहीं रहा और यह स्थिति जितने लम्बे समय तक रहेगी परिणाम उतना ही घातक सिद्ध हो सकता है । समस्याओं का समाधान अपरिहार्य है और नेताओं की दूरदृष्टि देश की माँग है ।

 

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