राष्ट्रीयता किसी की मांग कर  खाने की वस् तु नहीं हो सकती

डा. बाबुराम भट्टर्राई

प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक जर्ज अखेल ने कहा था- जब चौतर्फी पाखण्ड का बोलबाला हो, ऐसी स्थिति में सत्य बोलना क्रान्तिकारी कदम होता है । नेपाल में इधर कुछ दिनों से

baburam bhattrai

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राष्ट्रीयता सम्बन्धी अत्यन्त गैरजिम्मेवार, आवेगात्मक, भ्रामक और पर्ूवाग्रहपर्ूण्ा सोच एवं अभिव्यक्तियों की बाढ की विभीषिका के समय राष्ट्रीयता सम्बन्धी गम्भीर राष्ट्रीय विमर्श कर ना आवश्यक हो गया है । राष्ट्रीयता किसी व्यक्ति, समूह अथवा दल विशेष के स्वार्थ सिद्धि का माध्यम व बौद्धिक विलास का साधन न होकर सम्पर्ूण्ा देश और जनता से सम्बन्धित दायित्व का विषय है । इसीलिए र ाष्ट्रीयता जैसे अत्यन्त गम्भीर और संवेदनशील विषय के गर्भ-गृह में प्रवेश कर ने से पर्ूव सभी को निजी स्वार्थ, संकर्ीण्ाता, आवेग और पर्ूवाग्रह का चश्मा उतारकर वैज्ञानिकता, यथार्थता एवं वस्तुवादी दृष्टिकोण रखना आवश्यक है ।
र ाष्ट्र एवं र ाज्य
सबसे पहले हमें राष्ट्र और र ाज्य के बीच जो वैज्ञानिक विभेद है, उसे समझना आवश्यक है । र ाष्ट्र अथवा र ाष्ट्रियता का तार्त्पर्य साझा भूगोल, साझी जनसंख्या -जाति, भाषा, संस् कृति समेत) साझी अर्थ व्यवस् था और  साझी मनोभावना का समष्टिगत अभिव्यक्ति है, जो विकासशील समाज के प्रवाह में गतिशील ढंग से विकसित  होता र हता है । दूसर ी ओर  र ाज्य का तार्त्पर्य निश्चित भौगोलिक परि वेश में ऐतिहासिक रुप से विकसित समाज व्यवस् था कायम र खने के लिए संगठित र ाजनीतिक शक्ति है । अर्थात् र ाष्ट्र अथवा र ाष्ट्रियता ऐतिहासिक रुप से विकसित स् िथर  मानवीय या सामाजिक तत्व है तो र ाज्य एक र ाजनीतिक तत्व है । र ाष्ट्र और  र ाज्य कहीं एक ही जगह और  एक ही रुप में समायोजित होता है तो कहीं एक ही र ाज्य में अधिक र ाष्ट्र/र ाष्ट्रीयता और  कहीं एक ही र ाष्ट्र/र ाष्ट्रियता विविध र ाज्यों में विभाजित हो सकती है । इस जटिल अवधार णा के विषय में वैचारि क अस् पष्टता अथवा भिन्नता वर्तमान में हमार ी र ाष्ट्रियता सम्बन्धी विमर्श के परि णाम स् वरुप एक प्रमुख समस् या के रुप में दृष्टिगत हो र हा है । क्योंकि एकल र ाष्ट्रिय र ाज्य में बाहृय र ाष्ट्रियता -अथवा एक र ाज्य का दूसर े र ाज्य के साथ सम्बन्ध) का प्रश्न स् वतः प्रमुख होकर  सामने आता है तो बहुल र ाष्ट्रिय र ाज्य में आन्तरि क र ाष्ट्रियता -या देश के अन्दर  विभिन्न र ाष्ट्रियता से सम्बन्धित र ाज्य) एवं बाहृय र ाष्ट्रियता दोनों ही महत्त्वपर्ूण्ा होता है ।
इस सर्न्दर्भ में हमें सबसे पहले नेपाल एकल र ाष्ट्रीय र ाज्य है अथवा बहुल र ाष्ट्रीय र ाज्य है, इस पर  पहुँचना आवश्यक है, इस निष्कर्षपर  पहुँचे बिना र ाष्ट्रीयता पर  बहस सत्य तथ्यों का संवाहक नहीं हो सकती । पृथ्वीनार ायण शाह द्वार ा आर म्भ की गई सुगौली सन्धी तक पहुँचकर  वर्तमान नेपाल के निश्चित स् वरुप को विगत के शासक चाहे जितना भी जोडÞ लगाकर  एकल र ाष्ट्रीय र ाज्य का उद्घोष कर ें, पर न्तु धर ातलीय यथार्थ में बहुल र ाष्ट्रीय र ाज्य की ही पुष्टि होती है । हिमाल, पहाड, उपत्यका और  तरर् ाई-मधेश की विविधतायुक्त भौगोलिक परि वेश में हजार ों वर्षों से जीवनयापन कर ते आ र हे विविध जाति, भाषा के मानव समूह का समय क्रम के अनुसार  र ाष्ट्र-र ाष्ट्रीयता के रुप में विकास की बातों को अस् वीकार  कर ना, दिन में ही आँख मूँदकर  र ात्रि के भ्रम में पडÞने के बर ाबर  होगा । इसी हेतु -एक बहुल र ाष्ट्रीय र ाज्य में यदि र ाष्ट्रीयता के सर्न्दर्भ में चर्चा हो तो आन्तरि क र ाष्ट्रीयता और  बाहृय र ाष्ट्रीयता दोनों ही मुददों को) समन्वयात्मक एवं परि पूर क ढंग से प्रस् तुत कर ना आवश्यक है । विगत के र ाजतन्त्रात्मक सत्ताधारि यों ने अपने संकर्ीण्ा सत्तास् वार्थ हेतु लम्बे अन्तर ाल तक नेपाल को खस-आर्य एकल र ाष्ट्रीय र ाज्य के रुप में प्रस् तुत कर  आन्तरि क र ाष्ट्रीयता के प्रश्न को सच्चाई से दूर  र खकर  एक पक्षीय रुप से मात्र बाहृय र ाष्ट्रीयता की बातें कर ते र हे । वही पुर ानी हुकूमत का चोला पहने हुए दर बार  के कुल लोग अभी भी आन्तरि क और  बाहृय र ाष्ट्रीयता को संतुलित ढंग से ऊपर  उठाने वाली प्रगतिवादी शक्तियों को मण्डले अथवा अन्धी र ाष्ट्रवादी दृष्टिकोण से ‘र ाष्ट्रघाती’, ‘विदेशी-दलाल’ आदि उपशब्दों के माध्यम से कीचड उछालने का जो प्रयास कर  र हे हैं, उस दुष्प्रयास को समस् त देशभक्त एवमं शक्तियों को समय में ही उचित प्रतिवाद कर ना आवश्यक है । आग लगाकर  चोर ी कर ने की प्रवृति से सभी को अवगत होना और  उसे पर ास् त कर ना आज की माँग है ।
बाह्य र ाष्ट्रीयता का प्रश्नर्
वर्तमान में भूमण्डलीकृत साम्राज्यवाद के युग में नेपाल जैसा दो विशाल पडÞोसी र ाज्यों के बीच में अवस् िथत विशिष्ट भू-र ाजनीतिक परि वेश में बाहृय र ाष्ट्रीयता का प्रश्न विशेष गम्भीर  एवं पेंचिदा होने की बात जगजाहिर  है । खासकर  सुगौली सन्धी के बाद अर्थ र ाजनीतिक रुप से दक्षिण की ओर  ढलना और  आसमानी विकास की प्रक्रिया में जकडÞी हर्ुइ नेपाल के बाहृय सम्बन्ध को किस प्रकार  सन्तुलित बनाया जाय एवं र्सार्वभौमसत्ता की र क्षा आदि गम्भीर  प्रश्न हमार े सामने विद्यमान हैं । पिछले चर ण में दक्षिण में अवस् िथत भार त तथा उत्तर  में अवस् िथत चीन दोनों इसी शताब्दी के अन्त तक विश्व समक्ष महाशक्ति बनने की दौड में प्रवेश कर  चुके है एवं दोनों ही अपनी सामरि क स् वार्थ र क्षा नेपाल में स् वाभाविक ढंग से ढूढÞने की स् िथति में हमें र ाष्ट्रीयता सम्बन्धी पर म्पर ागत मान्यताओं को भी विकसित एवं परि मार्जन कर ना आवश्यक है ।
भावी महाशक्ति चीन और  भार त के बीच में अवस् िथत सामरि क महत्व संजोए हुए नेपाल पर  वर्तमान महाशक्ति अमेरि का और  पश्चिमी शक्तियों की आँख गडÞाने की बात को अन्यथा नहीं लिया जा सकता । इस प्रकार  देश में अनोखे ढंग से बढÞती शीत युद्धकालीन त्रिपक्षीय सामरि क प्रतिस् पर्धा की घडÞी में हमें आज से ही नई र ाष्ट्रीय सुर क्षा एवं वैदेशिक नीति के विकास की ओर  ध्यान केन्द्रित कर ना होगा ।
अब हम लोगों को इक्कीसवीं शताब्दी की नई आवश्यकताओं के अनुरुप विकास की आकांक्षा र खनेवालों की कुछ अवधार णाओं पर  र ाष्ट्रीय विमर्श की कमी महसूस हो र ही है । सबसे पहले अब हमें नेपाल को भार त और  चीन बीच की पर म्पर ागत ‘बफर  स् टेट’ मानने वाली सोच का त्यागकर  नेपाल को तीव्र गति से आर्थिक विकास की ओर  उन्मुख भार त और  चीन के बीच ‘गतिशील पुल’ के रुप में विकास कर ना अत्यन्त आवश्यक है । भार त और  नेपाल दर्ीघकालीन प्रतिस् पर्धा होने पर  भी तत्काल दोनों अपनी-अपनी शक्ति संचय में लगे र हने के कार ण एक दूसर े से भिडने के पक्ष में नहीं है । अतः इस अवसर  का लाभ हम लोग उठा सकते हैं अर्थात उठाना पडेगा । दोनों पडÞोसी र ाज्यों से वर्तमान धर ातलीय यथार्थ और  भावी सम्भावनाओं के आधार  पर  सन्तुलित सम्बन्ध स् थापित कर  एवं पश्चिमी शक्तियों को भी उचित स् थान देकर  देश को सच्ची र ाष्ट्रीयहित के संर क्षण एवं पर््रवर्द्धन कर नेवाली नियमों का अनुसर ण कर ना अत्यन्त आवश्यक है ।
दूसर ी बात, भार त के साथ सुगौली सन्धि संर चनागत रुप से कायम हो चुकी ‘प्रभुत्व-पर ाश्रय’ -डोमिनेन्ट-डिपेन्डेन्स) सम्बन्ध को किस प्रकार  सुगठितकर  सामानता और  आपसी हित को पक्षपोषण की अवस् था में पहुँचाने के लिए नई सोच और  नीतियों का हमें विकास कर ना ही होगा । इस विषय में हमार ी स् पष्ट धार णा यह है कि वर्तमान र ाष्ट्रीयता और  अन्तर्र ाष्ट्रीय शक्ति सन्तुलन को ध्यान में र खकर  हमें तत्काल बाहृय शक्तियों से सीधा टक्कर  लेने के बजाय कूटनीतिक सन्तुलन बनाकर  आन्तरि क र ाष्ट्रीय एकता को मजबूत कर ने तथा तीव्र आर्थिक विकास और  समृद्धि के र ास् ते से पर  निर्भर ता घटाते हुए अन्ततः पर्ूण्ा स् वाधीनता और  आत्मनिर्भर ता हासिल कर नेवाली नीति का अवलम्बन वस् तुपर क और  र ाष्ट्रीय हित में होगा । अन्यथा चर म गर ीबी और  अल्प विकास के दुश्चक्र में जब तक फँसे र हेंगे, हम जितना बाहृय र ाष्ट्रीयता का डंका बजाएं पर न्तु वह अर ण्य-र ादेन मात्र साबित होगा । इसी दूर गामी सोच के कार ण ही हमने भार त, चीन लगायत सभी से ‘ विप्पा’ सम्झौता कर  बडेÞ पैमाने पर  लगानी और  उच्च प्रविधि देश में लाने की नीति को अपनाए हैं । क्योंकि यदि हम कुछ दसकों तक लगातार  दो अंकों की वृद्धि दर  हासिल न कर  सकें तो गर ीबी के दुश्चक्र से मुक्त नहीं हो सकते । इसी वृद्धि दर  को हासिल कर ने के लिए हमें प्रति वर्षकुल गार्हस् थ उत्पादन का ४०-४५ प्रतिशत अर्थात ६-७ खर्ब रुपये लगानी की आवश्यकता है, जो हमार ी आन्तरि क स्रोत के आधार  पर  तत्काल सम्भव नहीं है । इस वस् तुगत यथार्थ को समझे बिना हम लोग पुर ानी ही मान्यताओं को ढोते र हें तो पशुपति नाथ भी हमार ी र क्षा नहीं कर  सकते ।
कुछ प्रोयोजित शंकाएं
ऐसी मान्यता है कि र ाजनीतिक प्रतिस् पर्धा में पिछङने पर  लोग गाली-गलौज का सहार ा लेते है । इसी प्रकार  आन्तरि क र ाजनीतिक प्रतिस् पर्धा में अपनी ही प्रतिगामी और  यथास् िथतिवादी सोच के कार ण पर ाजित हुए कुछ लोग आजकल माओवादी पार्टर्ीीअध्यक्ष प्रचण्ड और  मुझे ‘बाहृय शक्ति का दलाल’ ‘देश का गद्दार ’ आदि मिथ्या आर ोपों की वषर्ा कर  र हे हैं । विशेषकर  जनयुद्ध के पिछले कालखण्ड से हमने भार त सम्बन्धी नीति में जो परिर् वर्तन लाया है, उसके आधार  पर  अच्छी भ्रामक तथ्यों की खेती कर ने का प्रयास किया जा र हा है ।
बहुत बार  बोल चुका हूँ कि हम लोग सुविचारि त ढंग से ही २०५२ साल के जनयुद्ध के प्रार म्भिक चर ण में र ाष्ट्रीयता के प्रश्न पर  विशेष जोडÞ और  जनतन्त्र के प्रश्न पर  आवश्यक ध्यान देनेवाली नीति तथा २०५८ के दर बार  हत्याकाण्ड पश्चात गणतन्त्र के प्रश्न पर  विशेष जोड एवं र ाष्ट्रीयता के प्रश्न पर  आवश्यक ध्यान देने वाली नीति अर्न्तर्गत पिछले चर ण में भार त के साथ सामान्यीकर ण सम्बन्ध की नीति लिए ही हैं । १२ सूत्रीय समझदार ी से लेकर  वर्तमान र ाजनीतिक घटना क्रम यही सिद्ध कर ते है कि हमार ी वह नीति विल्कुल सही तथा र ाष्ट्र और  जनता के हित में थी । तत्कालीन सत्ता द्वार ा देश में जनता विरुद्ध नर संहार  अभियान सञ्चालन पश्चात् हमने भार त, चीन, अमेरि का, संयुक्त र ाष्ट्रसंघ सभी के साथ नेपाल की समानान्तर  सत्ता की हैसियत से पत्राचार  किया है और  इससे हमें अभी भी गर्व की अनुभूति होती है । खुले एवं पार दर्शी ढंग से हर्ुइ वार्तालापों से वर्तमान में अतिर ञ्जित ढंग से दुष्प्रचार  कर नेवालों की नीयत क्या है – इसे सब को समझना अत्यन्त आवश्यक है ।
समग्र में, र ाष्ट्रीयता जैसे गम्भीर  एवं संवेदनशील विषय से कोई भी खेलवाडÞ न कर ें । र ाष्ट्रीयता किसी की माँग कर  खानेवाली वस् तु नहीं हो सकती । र ाष्ट्रीय स् वाधीनता एवं र्सार्वभौम सत्ता के विषय को दलगत स् वार्थ तथा सत्ता स् वार्थ से हमेशा ऊपर  र खना होगा । -कान्तिपुर  दैनिक से अनुदित)
-अनुवादिकाः पूनम झा)

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