राष्ट्रीयता की बहस एवं अघोषित अनागरिक का आक्रोश

डा. पुष्पज राय ‘चमन’ :मधेश समय समय पर राज्य द्वारा सृजित, पोषित एवं जबरन आरोपित विभेद के विरुद्ध अपनी अस्वीकृति दर्ज कराता रहा है चाहे वह आन्दोलन के विभिन्न माध्यम से हो या सांकेतिक विरोध स्वरुप ही क्यों न हो, इतिहास इसका गवाह है । परन्तु जव जव मधेश ने विभेद के

महर्षि अरविन्द के अनुसार ‘‘राष्ट्र क्या है ? यह भूमि का एक टुकड़ा नही है, न संज्ञा या सर्वनाम और न ही मन का गल्प । यह विशाल शक्ति है । जिस मे सम्पूर्ण जनता की शक्तियां निहित है जैसे महिषासुरमर्दिनी भवानी एक ही शक्तिपूंज मे केन्द्रिभूत और एक व्यक्तित्व में समाहित करोड़ो देवताओं की शक्ति से स्वरूप धारण करती है ।
विरुद्ध अस्वीकृति की आवाज को वुलन्द किया खसवादी शासकों ने उसे विदेशी, अराष्ट्रीय, विखण्डनकारी जेसे शब्द से लांछित कर बन्दूक और बूट से रांैदने का सिलसिला कायम रखा । तत्काल बुलन्द आवाज धीमी पड़ गई पर सुलगना बरकरार रहा तथाकथित राष्ट्रवादी नेताओं की दृष्टि उस पर नही पड़ी, पड़ी भी तो अपनी जातीय फौजी संगठन के भरोसे नजरअन्दाज किया जाता रहा । कुछ खसवादी नेताओं द्वारा जारी किया गया फरमान जिसे कर्मकाण्डी रूप में संविधान के रूप में अलंकृत कर जबरन आरोपित करने का दुःसाहस किया जा रहा है वह तथाकथित संविधान वस्तुतः सदियों से छल और बल से शोषण करनेवाले खस शासक के पुनः सदियों तक शासन करने के अधिकार का नवीकरण प्रमाणपत्र मात्र कहा जा सकता है । मधेशियों ने जब उसे समुचित समान अधिकार दिए बगैर अस्वीकार करने का निर्णय लिया पुनः एक वार वही पुराना रवैया कायम है । राष्ट्र, राष्ट्रीयता का हवाला देते हुए आन्दोलन के मूल मर्म और माँग को विकृत और विषाक्त करने का कुकृत्य किया जा रहा है । अपने को राष्ट्रवादी और अपनी चिन्तन और विचार ही राष्ट्रीयता की परिभाषा समझने वाले खसवादी अहंकार और विदेशों से आयातित माधव नेपाल जैसे कुछ नेताओं की शकुनी की भूमिका के कारण राष्ट्र, राष्ट्रीयता की परिभाषा ही नही अपितु उसका अस्तित्व भी अव बहस का विषय बनाया जा रहा है ।
स्वाभाविक ही है जव मातृभूमि की अस्मिता की लड़ाई हो तो ‘करो या मरो’ की भावना स्वतः आ जाती है, यह नैसर्गिक है और यह भी सत्य है कि इस भावना से अनुप्राणित आन्दोलन कभी भी नही हार सकती है, कभी भी नही थक सकती है परिणाम जो भी हो, मूल्य जो भी चुकाना पड़े किंचित मनोमलीनता नही उभरती । परिस्थिति निश्चय ही विषम है और जब परिस्थिति विषम हो तो राज्य का धर्म है समत्व भाव को हृदयांगम कर समुचित निर्णय लेने का । राज्य का धर्म है नागरिक के बढ़ते असन्तोष एवं विद्रोह को सम्वोधन करना । यदि राज्य अपने धर्म से विमुख हो जाय तो उसका अधोःपतन होना तय है और अधोःपतन की ओर अग्रसर राज्य के अस्तित्व को अधिक समय तक नही बचाया जा सकता है । इतिहास की ज्वलन्त घटना है जो भी सभ्यता या राष्ट्र अपने पहचान के मूल प्रश्न और नागरिक की भावना को समझने से परहेज करता है वह सोने की लंका, अटलांटिस का वैभव, ट्राय की शक्ति हो या हस्तिनापुर की सम्पदा टिकना नामुमकिन है ।
नेपाल के वर्तमान परिप्रेक्ष्य मे राष्ट्र और राष्ट्रीयता, गहन बहस का विषय बना हुआ है । और शायद राज्य स्वयं अपनी परिभाषा देने हेतु अपनी अन्तश्चेतना को कम्पायमान कर रही है । यही समय की माँग है । जब अविवेकी अंधे धृतराष्ट्र की हाथ मे बागडोर हो, सारथी इष्र्यायुक्त हठी दुर्योधन हो और भीष्म, द्रोणाचार्य, विदुर जैसे हस्ती को शासन के प्रभाव से मौन होना विवश होना पड़े, दूसरी ओर सत्य स्थापनार्थ व्रmान्ति के पक्ष में बाट जोह रहे कृष्ण चेतना सव्रिmय हो तो राज्य स्वंय भी उस बलि वेदी पर न्योछावर होने हेतु आतुर हो जाती है ताकि नवीन सत्य और सता का आरोहण सम्भव हो सके । राष्ट्र मात्र कोई भूमि का टुकड़ा नही है न ही किसी कलाकार की कल्पित कलाकृति और न ही किसी लकीरों में कैद भूमि की निर्जीव सता अपितु यह असीम प्रेम निर्मल भावों से अनुप्राणित प्राणप्रतिष्ठित प्रतिमा है जिसके सूक्ष्म तार में जीवन और मरण जुड़ा हुआ होता है । राष्ट्र ऐसी ही देवी प्रतिमा है और होनी चाहिए जिससे हरेक नागरिक की ऐसी भावना जुड़ी हो कि हर क्षण सहज ही प्राणन्योछावर करने की प्रवल भावधारा प्रवाहित होती रहे और ऐसा हो तो उस राष्ट्र को विश्व की कोई सेना क्या, स्वयं काल भी कुछ नही बिगाड़ सकता है । राष्ट्रीयता एक कर्मकाण्डी विचारधारा नहीं है अपितु जीवन और प्राण से भी अन्योन्याश्रित, अभिन्न और अविभाज्य धर्म है, एक अटूट विश्वास और परम निष्ठा है । इसे आरोपण नही किया जा सकता है । किसी भी तरह किसी भी रूप में । अपितु यह स्वतःस्र्फुत विशुद्ध भाव है, जिसके लिए जीवन का अर्पण सहज और सहर्ष होता है ।
महर्षि अरविन्द के अनुसार ‘‘राष्ट्र क्या है ? यह भूमि का एक टुकड़ा नही है, न संज्ञा या सर्वनाम और न ही मन का गल्प । यह विशाल शक्ति है । जिस मे सम्पूर्ण जनता की शक्तियां निहित है जैसे महिषासुरमर्दिनी भवानी एक ही शक्तिपूंज मे केन्द्रिभूत और एक व्यक्तित्व में समाहित करोड़ो देवताओं की शक्ति से स्वरूप धारण करती है । जब तक मातृभूमि अपने को मन की आंखो में भूमि के एक टुकड़े अथवा व्यक्तिओं के समूह से बढ़कर दर्शाती नहीं, जब तक महान भगवती और मातृभूमि कि सौन्दर्य–छवि में जो मन को वशीभूत और हृदय को अभिभूत कर ले, रुपायित नहीं होती माँ और उसकी सेवा के सर्वात्मसातकारी अदम्य भावना में ये छोटे–मोटे डर और आशंकाए तिरोहित नहीं होंगे तब तक चमत्कारी कार्य करनेवाली और तमसाछन्न राष्ट्र की रक्षिका देशभक्ति उदित नहीं हो सकती है ।”
वस्तुतः राष्ट्र और राष्ट्रीयता मानव अन्तःस्थल से स्वतःस्पूर्mत सहज भाव है और ये ऐसे उपजते हैं जैसे माँ के लिए बालकों में सहज निश्छल प्रेम का उद्भव होता है । राष्ट्र, मातृभूमि माँ है और वह निश्छल प्रेम ही राष्ट्रीयता है । नेपाल एक बहुराष्ट्रीय राष्ट्र है इस सत्य को नकारा नही जा सकता है । अतः सभी राष्ट्र के मूल पहचान और संस्कृति को आत्मसात् करना ही होगा और इस से ही राज्य में मजबूती प्रदान करेगा अन्यथा शक्तिशाली, समृद्ध राज्य की कल्पना कदापि नहीं की जा सकती है । यदि कोई राष्ट्र अपनी पहचान, भाषा और संस्कृति समान पहचान हेतु उतावले हों परन्तु राज्य उसे नकारता ही रहे तो वह दमित एवं उपेक्षित राष्ट्र अपनी पहचान हेतु कोई भी रास्ता अपना सकता है, यहाँ तक कि पृथक अस्तित्व भी साकार कर सकता है । राज्य में अभी विभाजन की जो अघोषित लकीर खींची गई है उसके लिए जिम्मेदार कौन है ? तो गहन मन्थन करने पर स्पष्ट निचोड़ निकलेगा, राज्य ही इस के लिए प्रमुख जिम्मेदार है । देश की आधी जनसंख्या के उपर और एक सुदीर्घ समृद्ध इतिहास भाषा और संस्कृति से महिमा मंडित विशाल समुदाय जो स्वयं में एक राष्ट्र है, अपनत्व के लिए तरसता हो पर इसके बदले उसे राज्य द्वारा तिरष्कार, दमन और मौत का सामना करना पड़े तो फौजी संगीन के साए में सार्थक सम्बन्ध को टिकाना नामुमकिन है ।
किसी धरतीपुत्र को उसकी धरती से बेदखल कर उसकी पहचान, भाषा, वेष, संस्कृति को भी जबरन अपहरण कर लिया जाय और उसे अपनी नागरिकता के लिए भी दशकों से आन्दोलन करना पड़े परन्तु अन्ततः अघोषित रूप में अनागरिक ही बनना बाध्यता हो तो उससे विद्र ोह के अतिरिक्त क्या अपेक्षा की जा सकती है । नदी की प्रवल वेगयुक्त धारा हो और अवरुद्ध करने का दुःसाहस किया जाय तो वह धारा अपना रास्ता स्वयं निर्धारित कर अपने अस्तित्व को साकार करती है । यह प्रकृति का नियम है । प्रकृति के इस नियम से राज्य अछूता नहीं रह सकता है । संविधान में अंगीकृत नागरिकता सम्बन्धी जो प्रावधान लादने का दुःसाहस किया गया है वह मधेश और भारत के बीच जो खून का सम्बन्ध है उसे विभक्त करने का असफल प्रयोग किया गया है । वस्तुतः मधेश और भारत राजनीतिक रूप में पृथक हैं, परन्तु दोनो सहोदर हंै मूल रूप में । जब उदगम एक ही हो, शिराओं मे खून एक ही बहता हो तो सम्पूर्ण विस्तार एक होना स्वाभाविक ही है ।
अन्तरिम संविधान, जो कई बलिदानियों के खून से लिखा गया था, उससे भी मुकर जाना सिर्फ बेइमानी ही नही निहायत जानवरों से किया जाने वाला व्यवहार सदृश है । क्याेंकि जानवरों के पास अधिकार पाने या देने जैसी कोई भावना नहीं होती और न ही उसे किसी नागरिकता की ही आवश्यकता पड़ती है । नागरिकता की तो मालिक को आवश्यकता पड़ती है । अंगीकृत नागरिकता के वर्तमान प्रावधान से दोनों देशों में हो रहे वैवाहिक सम्बन्ध स्थापना करने के सिलसिले में नकारात्मक असर पड़ा है । वर खोजने के लिए आए पिता की जिज्ञासा वधु की नागरिकता से जुड़ी प्रावधान से ही आरम्भ होती है । होना स्वाभाविक ही है, हमारी संस्कृति की धरोहर है कि वधु किसी घर में अर्धाङ्गणी के रूप में आती है न की आगंतुक के रूप में ।
देश ने जब संघीयता को स्वीकार कर लिया है तो, पुराना जिला, अंचल, विकास क्षेत्र, जैसी संरचना स्वतः खारिज हो चुकी है यह समझना चाहिए, क्याेंकि संघीयता नवीन संरचना है । पुरानी संरचना को हटाए बिना उसे सुन्दर और सार्थक रूप नहीं दिया जा सकता है । इसी तरह पहचान और सामथ्र्य संघीयता के प्राण का स्रोत होता है, जिससे सुनियोजित रूप में हटाकर मधेश की धरती को क्षत विक्षत किया गया है । जो कभी भी मधेशियों को स्वीकार्य नही हो सकता आन्दोलन का वटमलाइन ही यही है । काफी देर हो चुकी है परन्तु संभावना अभी भी मौजूद है । राज्य अव भी सम्वेदनशील हो और मधेश की समस्या को सम्बोधन करे इसी में राज्य की भलाई है ।

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