राष्ट्रीयता, संघीयता और संविधान के भ“वर में उलझा मधेश

डा. श्वेता दीप्ति:ये चंद शब्द नहीं हालात हैं नेपाल के । कमोवेश आज हर नेपाली इन शब्दों में उलझा हुआ ह,ै किन्तु सबसे अधिक मधेश, इन शब्दों के जाल में फंसकर अनिश्चितता की दौर से गुजर रहा है । कहीं जिज्ञासा है तो कहीं निराशा । लगभग तय है कि माघ ८ की मध्यरात्रि में जनता को संविधान  मिलने वाला नहीं है । लेकिन इन सब के बीच एक ज्वलन्त प्रश्न जो उभरकर आता रहा वह है राष्ट्रीयता । संघीयता के सवाल के साथ-साथ मधेश की राष्ट्रीयता पर भी प्रश्नचिहृन लगता रहा है ।ckr birgnj

कभी उसके पहनावे पर, कभी उसके रंग रूप पर तो कभी भाषा को हथियार बनाकर मधेश और मधेशी जनता को तौला जाता रहा है । इतना ही नहीं इन सबके कारण उन्हें वर्षों से मानसिक त्रास मिलती रही है । उन्हें बार-बार अपने ही देश में खुद को स्थापित करने की लडर्Þाई लडÞतÞी रहनी पड है । राष्ट्रीयता, संघीयता और संविधान कहने को ये तीन शब्द हैं किन्तु, इनकी व्यापकता इस अर्थ में है कि यह एक पूरे राष्ट्र को परिभाषित करता  है । जहाँ राष्ट्रीयता एक नागरिक को पहचान देती है, वहीं संघीयता राज्य को मजबूती प्रदान करता है और संविधान चाहे जितना भी अच्छा हो, उसकी सफलता उसकी शब्दावली पर नहीं, प्रत्युत् उस भावना पर अवलम्बित है जिससे वह कार्यान्वित की जाती है । जनता के द्वारा, जनता के लिए और जनता की सरकार यही चाहत हर राष्ट्र की सजग जनता को होती है । वर्षों से शोषित मधेश को संघीयता के बिना संविधान की चाहना नहीं है और जब वह अपने अधिकार की व्याख्या सत्ता और सरकार से चाहता है तो सवाल उसकी राष्ट्रीयता पर खडÞा किया जाता है । विखण्डÞन का दोष उनके ऊपर मढÞा जाता है । उस वक्त मधेश की शहादत याद नहीं रहती है । ओली जैसे महत्वाकांक्षी नेता के द्वारा मधेश के अस्तित्व को ही नकार दिया जाता है । नेपाल संक्रमण काल से गुजर रहा है, हर क्षेत्र संवेदनशील है और सत्ता का कर्त्तव्य है कि वह सभी को संबोधन करे । ऐसे नाजुक क्षण में जिम्मेदार नेताओं के ऐसे वक्तव्य आ रहे हैं जो मधेश की जनता को सिर्फउकसाने का काम कर रहे हैं और घर घर में सी.के. राउत के पैदा करवाने में अपनी अहम् भूमिका निर्वाह कर रहे हैं । कानून तमाशा किए हुए है, रोज किसी को बिना कारण गिरफ्तार किया जा रहा है और फिर छोडÞ दिया जा रहा है । सत्ता यह नहीं देख रही है कि उसका यह कदम किसी को जीरो से हीरो बनाने में कितना कारगर सिद्ध हो रहा है । उस हीरो के पीछे जनता की भीडÞ यह साबित कर रही है कि मिट्टी से जुडÞा वह शख्श आज मधेश के दिल में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो चुका है । मीडिÞया उसका प्रचार नहीं कर रही बल्कि खुद सरकार उसे जन-जन तक पहुँचा रही है ।
संघीयता की मांग अगर मधेश कर रहा है तो, राष्ट्रीयता कहाँ विखण्डिÞत हो रही है – अन्तरिम संविधान में स्पष्ट उल्लेख है, बहुजातीय, बहुभाषिक, बहुसाँस्कृतिक विशेषतायुक्त, समान आकांक्षा और नेपाल की राष्ट्रीय स्वतन्त्रता, अखण्डÞता, राष्ट्रीय हित तथा समृद्धि के प्रति आस्थावान रहकर एकता के सूत्र में आबद्ध रहकर सभी नेपाली जनता समष्टि में एक राष्ट्र है । इस अवस्था में एक वेश और भाषा का तो प्रश्न ही नहीं उठता और जब जागरुकता आई है तो समान आकांक्षा की पर्ूर्ति तो जनता चाहेगी ही । अब आरक्षण नहीं अधिकार की बातें हैं । इस आकांक्षा को राष्ट्रीयता से जोडÞकर मधेश और मधेशी के ऊपर शक करना निश्चय ही दर्ुभाग्यपर्ूण्ा है । संघीयता की माँग राष्ट्र को तोडÞना नहीं है बल्कि अपने अधिकारों का अपने हित में सदुपयोग करना है ।  अगर ऐसा नहीं हुआ तो अब तक जिस स्वराज शब्द का प्रयोग मात्र अधिकार के लिए हो रहा है कल उसके स्वरूप को बदलने से कोई इनकार नहीं कर सकता है । यदा-कदा यह सुनने को मिल जाता है कि आन्दोलन के समय ऐजेण्डÞा में संघीयता शब्द था ही नहीं । किन्तु राजनैतिक दलों की जो संघीयता के लिए प्रतिबद्धता थी उसे नकारा भी नहीं जा सकता है । पहचान के आधार पर संघीयता में जाने की बात थी किन्तु यह आधार देश के लिए कुछ तर्कसंगत नजर नहीं आता है । जहाँ १२५ जाति और १२३ भाषाओं का प्रयोग होता है वहाँ सिर्फजाति और पहचान के आधार पर संघीयता का सवाल कुछ सही नहीं लगता । फिलहाल इस पहचान शब्द को परिमार्जित कर साझा पहचान और सन्तुलन के साथ सम्बद्ध कर के देखा जा रहा है । इसके पाँच आधार तय किए गए हैं-जातिगत वास की स्थिति, भाषा का प्रयोग, सांस्कृतिक पहचान, ऐतिहासिकता और भौगोलिक परिस्थितियाँ । पहचान शब्द को अब इन आधारों के साथ जोडÞकर व्याख्यायित किया जा रहा है और इसे ही आधार मानकर सात प्रदेशों की संरचना तैयार की गई है । किन्तु यहाँ भी मधेश को कमजोर करने की पूरी तैयारी है । जो प्रदेश हमेशा से मधेशी क्षेत्र रहे हैं उन्हें पहाडÞ के साथ जोडÞने की कोशिश की जा रही है । प्रेस चौतारी के कार्यक्रम में के.पी.ओली ने कहा कि संघीयता बच्चों का खेल नहीं है, और भौगोलिक अखण्डÞता को कमजोर करने वाली कोई भी सहमति मान्य नहीं होगी । देश को पीछे नहीं धकेलना है बल्कि आगे ले जाना है और इसके लिए कम से कम प्रदेश बनाना होगा । किन्तु उन्हें यह तो समझना ही होगा कि जहाँ प्रक्रिया या बहुमत का सवाल है वहीं सहमति के बिना कोई निष्कर्षनहीं निकल सकता है । फिलहाल माघ ८ के मद्देनजर मधेश को छावनी में परिणत कर दिया गया है हर जगह सेना की टुकडिÞयाँ फैली हर्ुइ हैं । इन बातों को देखते हुए यह तो स्पष्ट हो रहा है कि दवाब के तहत संविधान लागु करने की कोशिश की जा रही है । पिछले दिनों में ओली के जो भी वक्तव्य आ रहे हैं उससे मधेश के प्रति कोई अच्छे संदेश प्रसारित नहीं हो रहे हैं ।
विश्व की आँखें नेपाल की ओर लगी है । संविधान निर्माण के आकाश पर अनिश्चितता के बादल मंडÞरा रहे हैं । छः दशक से भी लम्बी प्रतीक्षा नेपाली जनता ने की है और संविधान निर्माण के लिए छः वर्षों का लम्बा प्रयास भी है पर फिलहाल कुछ प्राप्ति की आशा नहीं दिख रही है । पिछले संविधान सभा के विघटन की छाया इस संविधानसभा पर भी दृष्टिगोचर हो रही है और कारण है आज की राजनीति में व्याप्त अराजकता, अस्थिरता और दिशाहीन सोच । सत्तालिप्सा इस कदर हावी है कि संविधान निर्माण से ज्यादा नेतागण इस सोच में अधिक लगे हैं कि कोईराला के बाद प्रधानमंत्री कौन बनेगा और राष्ट्रपति की गद्दी किसे मिलेगी ।  मधेशी दलों की भी हालत यही है, उन्हें भी कर्ुर्सर्ीीी दौडÞ ही प्यारी है । संविधान सहमति का दस्तावेज होता है पर इस सहमति को जुटाने में सारा समय गुजर गया और हाथ में कोई उपलब्धि नहीं है । काँग्रेस और एमाले का जो नाटकीय स्वरूप उभर कर आ रहा है वह देश को द्वन्ध में धकेलने के लिए पर्याप्त है । संविधान निर्माण के सम्बन्ध में संघीयता, शासकीय स्वरूप, निर्वाचन प्रणाली और न्याय प्रणाली से सम्बन्धित विषयों में असहमति है । संघीयता के सर्न्दर्भ में राज्य की पर्ुनर्संरचना के पश्चात् संघीय प्रदेश की संख्या कितनी होगी और क्या नाम रखे जाएँगे, प्रदेशों की सीमा का निर्धारण कैसे होगा इन सारी बातों में सहमति नहीं हो पाई है । काँग्रेस और एमाले ने जो प्रस्ताव सामने रखा है, उसमें पंचायतकालीन १४ अंचल को ७ अंचल में समेटा गया है । यह ऐसा प्रस्ताव है जो किसी भी तरह से पहचान, स्वायत्ता, विभेद और उत्पीडÞन को सम्बोधित नहीं करता है । मधेशी जनता, जो प्रगति चाहती है, वर्षों से हुए विभेद का अन्त चाहती है और जिसके लिए मधेश की मिट्टी ने बलिदान दिए हैं, इन सारी भावनाओं का इस प्रस्ताव में कहीं सम्मान नहीं है । यह पिछली सोच की पुनरावृत्ति ही है । पहले संविधान सभा में राज्य पर्ुनर्संरचना के सर्न्दर्भ में पहचान को प्राथमिकता देते हुए जातीय और क्षेत्रीय उत्पीडÞन और विभेद का अन्त कर स्वायत्त प्रदेश के निर्माण पर बल दिया गया था और साथ ही प्रदेशों को स्वशासन में आधारित होने तथा शक्तिशाली होने पर विशेष ध्यान दिया गया था । इस आधार को रखकर संघीय प्रदेशों का निर्माण करते समय संख्या और सीमा के विषय में देश के भीतर जातीय और क्षेत्रीय रूप में वर्षों से विभेद और उत्पीडÞन के शिकार जाति और क्षेत्र कौन कौन से हैं, इन विषयों पर ध्यान दिया जाना चाहिए । अगर ऐसा होता है तो स्वाभाविक रूप से जातीय, क्षेत्रीय उत्पीडÞन और विभेद का शिकार मधेश और मधेशी थारु तथा पहाडÞ के लिम्बु, र्राई, किरात आदियों की समस्याओं का समाधान स्वतः हो जाएगा । पर यह सोच कहीं नहीं दिख रही है ।
नेपाली काँग्रेस और एमाले के साझा प्रस्ताव ने देश की राजनीति को दो भागों में बाँट दिया है-बहुमत और अल्पमत । अल्पमत का झुकाव माओवादियों की ओर होना भी स्पष्ट रूप से सामने है । काँग्रेस और एमाले इन दोनों में ही मधेश को या फिर पूरे राष्ट्र को सम्बोधित करने की क्षमता का अभाव है । नेपाली राजनीति लगातार एक जटिल प्रक्रिया के रूप में परिवर्तित होता जा रहा है । राजनीति और राजनीतिज्ञ के खेल को देख कर लगता है कि ये संविधान निर्माण के प्रति गम्भीर ही नहीं हैं, बस गम्भीर होने का दिखावा कर रहे हैं । प्रक्रिया की रट लगाकर आन्दोलन और उन्माद को बढÞावा दिया जा रहा है । संविधान के संकट को दूर करने का एकमात्र विकल्प है सहमति और इसे ही परे ढकेल कर सत्तासीन अपनी मर्जी लादने की कोशिश में हैं, जो सिर्फऔर सिर्फद्वन्ध को जन्म देगा और कुछ नहीं । भले ही मधेश को छावनी में तब्दील कर दिया जाय पर राख में दबी चिन्गारी कभी भी आग का रुख पकडÞ सकती है । सहमति ही इसका विकल्प है और इसे ही वो पचा नहीं पा रहे हैं । यह सच है कि वो बहुमत में हैं पर जिस जनता ने सत्ता में आने का अधिकार दिया अगर उनकी ही अवहेलना कर दी जाय तो जनता की असन्तुष्टि विकराल रूप ले सकती है । जनता के द्वारा दिए गए अवसर का पहले संविधान के ही तरह असफल बनाने की ओर आज की राजनीति अग्रसर हो चुकी है ।  आज भी उनके अन्दर सत्ता और शक्ति का ही मद हावी है । यदि माघ ८ को संविधान लाना है यह सोच सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों में है तो सहमति का मसौदा तैयार करना ही होगा किन्तु फिलहाल ऐसी कोई सम्भावना नजर नहीं आ रही है ।

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