राष्ट्रीय सभा में भी बहिष्कृत समुदाय का भी बहिष्करण होना तय: सर्वदेव ओझा

सर्वदेव ओझा, नेपालगंज, २५ अगस्त | उच्चस्तरीय संघीयता कार्यान्वयन तथा प्रशासन पुनस्संरचना निर्देशक समिति तथा संबिधान से राष्ट्रीय सभा में भी बहिष्कृत समुदाय का भी बहिष्करण होना तय । 
sarvdev ojha
आज नेपाल के संविधान के विषय में विभिन्न समुदायों और समूहों की आवाज संविधान में नहीं समावेश होने के कारण हर गली नुक्कड पर यही बहस चल रही है , मधेसी क्षेत्र , आदिवासी और जनजाति में तो ये और भी जोर शोर से चिंतन का विषय बना हुआ है और बहस भी जारी है ।
जब से ओली सरकार के द्वारा गठित उच्चस्तरीय संघीयता कार्यान्वयन तथा प्रशासन पुनःसंरचना निर्देशक समिति का पहला प्रस्ताव आया, जिसमे शासक संयंत्र के तहत जिले जिले को आधार विन्दु बनाकर साबिक के जिले में न्यूनतम तीन और अधिकतम तेरह संख्या में स्थानीय निकाय का कुल सात प्रदेश में ५६५ का प्रस्ताव आया है । अभी गाँव से लेकर केंद्र स्तर तक की राजनीतिक पार्टियों में भी गहन छलफल तथा विवाद का विषय  जन्म ले चुका है । इसका प्रमुख कारण देश में रहने वाली जनता अर्थात जनसंख्या, जनघनत्व को दरकिनार किया गया है और भौगोलिक अवस्था को यहाँ भी प्रमुखता से आधार बनाया गया ।
इस संबिधान में अभी तक आन्दोलनरत रहे समूहों का तो संबोधन अनिश्चित ही बना है , फिर संघीयता में प्रादेशिक सरकार को संबिधान की विभिन्न धाराओं में कमजोर करके रखा गया है, अब पुनः नए संयंत्र के तहत एक नया विवाद उच्चस्तरीय संघीयता कार्यान्वयन तथा प्रशासन पुनःसंरचना निर्देशक समिति के स्थानीय निकाय के प्रस्तावित संख्या में ही आ चुका है । विभिन्न पार्टी के नेता गण, पूर्व साबिक के जिला सभापति गण , साथ ही आन्दोलनरत पार्टी यह विषय और आने वाले दिन में अभी के सात प्रदेश में सीमांकन के प्रांतीय संरचना से लेकर स्थानीय प्रस्तावित संरचना (५६५) तक एक नया उलझाने वाला विवाद शुरू हो गया है । अब इसे यदि कारण और भविष्य में आने वाले राज्य सत्ता में पकड़ बनाये रखने वाले शासकीय और व्यवस्थापकीय नजर ही सब का अपना अपना है ही । आज के संबिधान में यदि इसी तरह सीमांकन में बिना फेरबदल का यथा स्थिति में संघीय व्यवस्थापिका , प्रांतीय व्यवस्थापिका , और स्थानीय व्यवस्थापिका का निर्वाचन होता है तो इस संबैधानिक संरचना से तो यह तय है की मधेसी ,आदिबासी ,जनजाति और दलित का प्रतिनिधित्व जनमत से न होकर वर्तमान प्रमुख पार्टियों के नेताओं की चाकरी और आशीर्वाद पर ही निर्भर होना पड़ेगा , और नेताओं की जेव भरने के बाहेक बाकी गुलामी के आलावा कोई विकल्प नहीं रहेगा । इसके बहुत से कारण इसी संबिधान के मौजूद व्यवस्था में ही अन्तर्निहित है ! आज नेपाल का संबिधान इसी संयंत्र के तहत चरण बद्ध रूप में राज्य में अपना बराबर का प्रतिनिधित्व को लेकर मधेसी ,आदिबासी ,जनजातियो के लिए संघियता अभिशाप के रूप में सिद्ध होने वाला है ! अब आये नए इस विषय वास्तु पर जो उपयुक्त बहिष्करण की व्यवस्था के बाहेक की आज की विवाद उच्चस्तरीय संघीयता कार्यान्वयन तथा प्रशासन पुनस्संरचना निर्देशक समिति के स्थानीय निकाय के प्रस्तावित संख्या और संबिधान की धारा ८६ के उस राष्ट्रीय सभा के सदस्य और गठन व्यवस्था के बारे में । यहाँ धारा ८६(२) में कुल ५९ सदस्य रखने की व्यवस्था है , जिसमे कुल सात प्रदेश से प्रत्येक प्रदेश से ८ के दर से ५६ लोगो का प्रतिनिधित्व धारा ८६(२) क० में , जिसमे प्रत्येक प्रदेश से तीन महिला ,एक दलित ,एक अपांग वा अल्पसंख्यक का बाध्यात्मक सीट बाकी तीन सीट खुल्ला प्रतिस्पर्धा के द्वारा है । बाकी धारा ८६(२) (ख) के अनुसार नेपाल सरकार के सिफारिश में राष्ट्रपति के द्वारा तीन मनोनीत होंगे । लेकिन गौर की बात यह है कि यहाँ कही यह बाध्यात्मक व्यवस्था नहीं है कि बहिष्कृत वर्ग समुदायों में से यह प्रतिनिधित्व हो सकने वाला वर्ग ही राष्ट्रीय सभा में लाये । अतः इस विषय में संबिधान में हुए प्रावधान और सरकारी रणनीति को निम्न बूंदे में विभाजित करते हुए विस्तार में मेरा विश्लेषण इस प्रकार है,
१. योजनाबद्ध इससे पूर्व ही नेपाल सरकार ने स्थानीय स्वायत्त शासन ऐन २०५५ को दफा ७२(१) विपरीत जा कर तराई के सविक अधिकांस गाँव विकास समितियों को भी विलय कर कुल २११ नगर पालिका , उप महा नगर पालिका तथा महा नगर पालिका गठन पहले से कर चुका है , अब इस संख्या में तो फेरबदल की कोई सम्भावना नहीं दिखाई देती । हाँ कुछ गाँव को जरूर हेरफेर कर सकेंगे । अब नया प्रस्तावित स्थानीय निकाय का ५६५ संख्या में २११ यथावत रखते हुए बाकी ३५४ ही स्थानीय निकाय बचेंगे ! अब इन्ही सभी स्थानीय निकायों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष तथा प्रमुख और उपप्रमुख एवं प्रदेश सभा के सदस्यों के मत परिणाम के भार फरक पर ही प्रत्येक प्रदेश से असमान मतों संख्या से आठ लोगो के दर से राष्ट्रीय सभा के ५६ सदस्यों का चयन प्रक्रिया संबिधान के धारा ८६(२) (ख) में व्यवस्था किया गया है ।
२. आज के प्रादेशिक सीमांकन और जिला समूहगत संरचना सहित उच्चस्तरीय संघीयता कार्यान्वयन तथा प्रशासन पुनःसंरचना निर्देशक समिति के स्थानीय निकाय के प्रस्तावित संख्या पर ध्यान दे, प्रस्तावित सात प्रदेश में से केवल धारा ५६(३) के २ नम्बर प्रदेश के घोषित आठ जिले, जहाँ ७६ स्थानीय निकाय है, जिसका राष्ट्रीय सभा सदस्यों के १५२ निर्वाचित प्रतिनिधियों का मत का भार और थप इस प्रदेश के निर्वाचित प्रदेश सभा सदस्यों के मत का भार पर ही गड़ना होगा । अब यहाँ महेन्द्र राजमार्ग से जुड़े अधिकांश नगर पालिका भी घोषित है जहाँ मधेसी , थारू , आदिबासी समुदायों की उपस्थिति न्यून है तो वहाँ का प्रमुख और उपप्रमुख इस समुदाय का निर्वाचित होना असम्भव है ही , साथ में इस क्षेत्र से निर्वाचित प्रदेश सभा सदस्य और स्थानीय निकाय के प्रमुख और उपप्रमुख के निर्वाचन परिणाम मत का फरक मत पर उन आठ राष्ट्रीय सभा के सदस्य कौन, किस समुदाय से  कितने होंगे यह अपने ही अंदाज करे, यहाँ से अभी के सीमांकन और रणनीतिक चाल से मुश्किल में आठ में से चार का प्रतिनिधित्व सघन समूह बस्ती समूह के समुदायों में से राष्ट्रीय सभा में प्रतिनिधित्व हो सकेंगे ।
३. अब विश्लेषण करे तराई के प्रस्तावित सात प्रदेश में से केवल धारा ५६(३) के ५ नम्बर प्रदेश के घोषित १२ जिले है , यहाँ असमान जनसँख्या पर लगभग ८ पहाडी जिला मिलाकर ९५ स्थानीय निकाय है, जिसका रास्ट्रीय सभा सदस्यों के १९० निर्वाचित प्रतिनिधियों का मत का भार और थप इस प्रदेश के अधिकांश निर्वाचित प्रदेश सभा सदस्यों की संख्या पुराने शासकीय शासक लोगो का ही बहुमत होना तय है , अब भला इनके मत का भार का भी संख्या यही से पता लगाया जा सकता है , साथ में यहाँ भी महेन्द्र राजमार्ग से जुड़े बहुतेरे अधिकांस नगर पालिका भी घोषित है साथ ही जहाँ मधेसी , थारू , आदिबासी समुदायों की उपस्थिति न्यून कर दी गयी है तो वहाँ का प्रमुख औरउपप्रमुख इस समुदाय का निर्वाचित होना असम्भव है । यहाँ पर उन आठ राष्ट्रीय सभा सदस्य कौन, किस समुदाय से, कितने होंगे यह सभी अभी से पता हो चला है, अंदाज करे,
४. अभी तक के प्रादेशिक सीमांकन और उच्चस्तरीय संघीयता कार्यान्वयन तथा प्रशासन पुनःसंरचना निर्देशक समिति के स्थानीय निकाय के प्रस्तावित संख्या तथा संबिधान के धारा ८६ के राष्ट्रीय सभा के कुल ५६ सदस्यों के गठन में सदियों से राज्य सत्ता के प्रनिनिधित्व से बंचित थारू , आदिबासी , जनजाति और मधेसी दलित तथा मुस्लिम समुदाय का बहिष्करण होना तय हो गया है । सिर्फ़ जीती हुई पार्टियों के नेताओं की गुलामी और आशिर्वाद पर ही टिका होगा, अन्यथा बाकी प्रदेश नम्बर १ , ३ , ४ ,५ , ६ तथा ७ में कुल ४८ राष्ट्रीय सभा सदस्य में से इन सभी प्रदेश से राष्ट्रीय सभा में , थारू आदिबासी , जनजाति और मधेसी तथा मधेसी दलित तथा मुस्लिम समुदाय का भी प्रतिनिधित्व होना असम्भव ही रहेगा ।
५. अब इन सब विवादों में उलझा हुआ आज का राजनीतिक पार्टी तथा नेतृत्व कभी पुराने स्थानीय जिला के प्रत्येक १३ इलाका को ही स्थानीय निकाय बनाने की कबायत कर रहा है , तो कही इसी प्रस्ताव को ही समर्थन करने की कवायत हो रही है  मगर यथार्थ शासको की चाल वास्तविक यही केवल नहीं है, बल्कि संबिधान में प्रतिनिधित्व और पहुँच के सवाल पर शासको द्वारा प्रतिनिधित्व से न्यून रखने की शाजिस हर स्तर पर तो है ही, चाहे धारा ५६(१) राज्य की संरचना की व्यवस्था हो या धारा ८४ में प्रतिनिधि सभा से लेकर धारा ८६ में भी उसी तरह यहाँ राष्ट्रीय सभा के सदस्य के ५६ सदस्यों में संबिधान की धारा ८६ का भी संयन्त्र यथावत प्राचीन संस्कार की तरह बन चुका है । अतः मेरा यह मूल्याङ्कन और विश्लेषण कुछ गलत हो तो पाठक वर्ग खुद न्याय करे और सुझाव भी दे । धन्यवाद
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