राष्ट्रीय सहमति की सरकार फिलहाल नजर नहीं आ रहा

श्वेता दीप्ति, काठमांडू , 5 जून ।
एकबार फिर बहुमत का मद सर चढ़कर बोलने को तैयार है । बहुमत के इसी नशा ने मौत की कब्र पर संविधान की इबारत लिखी और अब जब सहमतीय राष्ट्रीय सरकार की बात चल रही है तो फिर से सत्तापक्ष ने अपनी इच्छा जता दी है कि संविधान कार्यानवयन के लिए सिर्फ तीन दलों की आवश्यकता है किसी और की जरुरत नहीं है ।
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बजट लागू करने से पहले रातोरात यह फैसला हुआ था कि बजट पेश हो जाने के बाद सत्ता हस्तांतरण या परिवर्तन हो जाएगा । राष्ट्र के हित में बहुमतीय सरकार का गठन किया जाएगा । किन्तु अब प्रधानमंत्री ऐसे किसी भी विचार के पक्ष में नहीं हैं । उन्होंने खुले तौर पर प्रचण्ड से यह प्रश्न किया है कि बहुमतीय सरकार बना कर क्या होगा, संविधान लागु करने के लिए सिर्फ तीन दलों की आवश्यकता है । एमाले के साथ हुए नौ बुन्दे समझौता की याद दिलाने प्रचण्ड बालुवाटार पहुँचे थे । किन्तु फिलहाल उन्हें ही समझा कर भेज दिया गया है । काँग्रस ने विपक्ष में बैठने का निर्णय किया है वहीं प्रचण्ड जल्द से जल्द राष्ट्रीय सरकार बनाने की चाहत रख रहे हैं । भूकम्प पश्चात् अचानक राष्ट्रीय सरकार बनै और संविधान का फल सामने आया पर अभी इसी राष्ट्रीय सरकार का कोइ औचित्य प्रधानमंत्री को नजर नहीं आ रहा । जबकि उनकी यह कुर्सी इसी राष्ट्रीय सरकार का दिया हुआ तोहफा है । खैर, यह तो राजनीति है जहाँ बातों और वादों को भुलाने का ही काम होता है । माओवादी नेता नारायण काजी के अनुसार भद्र सहमति पर कोई संतुष्टिजनक बात सामने नहीं आ रही है इसलिए अब दोनों पार्टी की टीम की बैठक बैठनी चाहिए ।
पिछली बार जब प्रचण्ड ने सत्ता परिवत्र्तन के खेल से अचानक खुद को बाहर कर लिया था तब यह कयास लगाया गया कि इसके पीछे चीन की सलाह है कि अभी सत्ता परिवर्तन नहीं होना चाहिए इससे जनता के बीच सही संदेश नहीं जाएगा । प्रचण्ड ने भी अपने धैर्य का परिचय दिया और अपने आपको पीछे कर लिया जिसकी वजह से काँग्रेस अध्यक्ष शेरबहादुर देउवा की अच्छी किरकिरी उनकी पार्टी में ही हुई ।
वैसे अभी भी प्रचण्ड का यही मानना है कि संविधान कार्यान्वयन के लिए राष्ट्रीय सहमति की ही सरकार की जरुरत है पर थोड़े सुर उनके बदले हुए हैं । कुछ दिनों पहले उन्होंने माना था कि ओली के नेतृत्व की सरकार नाकाम रही है किन्तु अभी वो कह रहे हैं कि राष्ट्रीय सहमति की सरकार में भी अगर ओली का नेतृत्व रहे तो बेटर है, हाँ देउवा भी सही ही हैं और खुद के लिए उनकी धारणा है कि जो त्याग करता है और निःस्वार्थ सेवा जनता की करता है उसे ही देश और जनता सम्मान देती है और याद रखती है । पर दिल की छुपी आरजू तो समझा ही जा सकता है । संविधान का कार्यान्वयन, पुनर्निमाण और मधेश समस्याओं का समाधान के लिए राष्ट्रीय सहमति की सरकार की ही जरुरत है इस बात पर वो अडिग तो हैं किन्तु कुछ बदला हुआ सा भी है जो फिलहाल नजर नहीं आ रहा ।
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