राष्ट्र के साथ बलात्कार करने वालों की क्या सजा हो ? डा. मुकेश झा

डा. मुकेश झा २० अगस्त , जननी जन्मभूमिश्च,स्वर्गादियपि गरीयसी।

शास्त्रों का मानना है की जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी उच्च है। परंतु आज की वस्तू स्थिति को देखें तो पारिवारिक स्तर पर जननी की और राष्ट्रीय स्तर पर जन्मभूमि दोनों का हाल कैसा है वह सर्व विदित है। पारिवारिक माता की बात को अभी तत्काल के लिए हटाकर अगर हम राष्ट्र माता की बात करें तो हम देखेंगे की अपनी ही माता को कितना लांछित एवम् बेइज्जत होना पड़ रहा है। इस लांछन को अगर बलात्कार की संज्ञा दी जाय तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। बलात्कार का अगर शाब्दिक अर्थ लेतें हैं तो जो कार्य बिना अनुमति के किया या कराया जाता है उसे बलात्कार कहा जाता है। तो क्या आज की स्थिति में राष्ट्र के मुताबिक, राष्ट्रके लिए जो वास्तव में होना चाहिए, जो जनकल्याण के लिए उपयुक्त है क्या वो कार्य हो रहा है? राष्ट्र की गति जिस तरफ होनी चाहिये उस तरफ हो रही है? राष्ट्र देवी कुछ और चाह रही हैं और पद लोलुप दुराचारी लोग कुछ और कर रहे हैं।

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राष्ट्र का स्वरुप जननी के रूप में, नारी के रूप में है। अगर समाज में किसी नारी के साथ कोई अभद्र व्यवहार होता है, कोई उसकी इज्जत के तरफ आँख उठाता है तो उसके लिए तरह तरह के कानून और प्रावधान है परंतु राष्ट्र माता के इज्जत पर तो रोज ही आँख उठ रहा है, हर समय इनको संसार के सामने बेइज्जत किया जा रहा है तो उसके लिए क्या?
सब जानते हैं आज जो भी नेपाल के प्रधानमंत्री हैं उनका वास्तविक स्वरूप क्या है, साथ ही उनका भूत और वर्त्तमान भी किसी से अज्ञात नहीं है फिर भी बार बार दुःशासन की तरह राष्ट्र देवी की आँचल को इनके हाथों में खींचने के लिए दे दिया जाता है और बौद्धिक वर्ग, सामाजिक सचेतक पांडवों की तरह निरीह बने बस देखते रहते हैं। बड़े बड़े राष्ट्र सेवक भीष्म की तरह मौन हैं। आखिर राष्ट्र देवी को ऐसी परिस्थिति में कब तक रहना होगा? जितने भी उच्च स्तरीय पदाधिकारी हैं उन्होंने देश की छवि को दुनियाँ के सामने किस स्तर पर ला कर रखा है? अगर किसी से भूल वस कुछ हो जाये तो माफ़ी के लायक समझा जा सकता है परंतु अगर दुराचार सोच समझ कर किया जाये तो उसके लिए क्या सजा हो?
जैसे घर के हर बेटे का यह दायित्व है की वह अपने माँ के आबरू पर उठने वाले हर आँख को निकाल ले उसी तरह देश के हर सपूत के यह पहला कर्त्तव्य होना चाहिए की राष्ट्र देवी, राष्ट्र माता, जन्मभूमि के आबरू पर उठने वाले हर आँख को निकाले चाहे वह आँख किसी की भी हो। अगर बेटे यह नहीं कर पाएं तो वैसे कपूत को जिन्दा रहने का कोई हक नही।
समस्या का अगर ठोस समाधान नहीं किया जाये तो वह दिन व दिन बढ़ती जाती है। राष्ट्र देवी की समस्या भी अब कुछ ऐसी मोड़ पर आई है जिसका समाधान उनके सपूतों को निकालना ही होगा नहीं तो उनके बहते हुए आंसू के भागीदार हर वह व्यक्ति होगा जो अभी मौन है। दुनियां में और पाप का शायद प्रायश्चित्त भी है परंतु माँ के साथ किये गए पाप का कोई प्रायश्चित्त नहीं है। साथ ही कर्म फल का सिद्धान्त, जिसे वामपंथी और नास्तिक लोग नहीं मानते, वह भी यही कहता है की अगर कहीं दुराचार हो रहा है तो उसके विरुद्ध आवाज नहीं उठाने वालों को भी उसी फल को भोगना पड़ता है जिस फल को वह दुराचारी भोगता है। अतः राष्ट्र देवी के ऊपर हो रहे अनाचार, पापाचार, दुराचार, शोषण एवम् बलात्कार के विरुद्ध आवाज उठाना हर सचेत नागरिक का कर्तव्य है ।

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