रिभर्स साइकिल से विश्वयात्रा पर युवक

ँसितारों को न छू पाना, कतई शर्म की बात नहीं। किंतु सितारों का न
होना, बाकई शर्म की बात है।’
वैसे तो सुनने में जरा अजीव सा लगेगा। नेपाल के एक युवक वीर
ेशप्रसाद दाहाल -२९ वषर्ीय) अपने एक सहयोगी मित्र बजेन्द्रकुमार महरा –
३४ वषर्ीय) के साथ उलटी दिशा में साइकल चलाकर अभी तक एशिया के
२९ और अप्रिmका के १५ देशों का भ्रमण सम्पन्न कर चुके हैं। किसी शायर
ने क्या खूब कहा है-
होते हैं जिन में हौसले, मिले जाते हैं उन्हें रास्ते
ये जिंदगी नहीं है, बुजदिलों के वास्ते।
इस शेर में जो कहा गया है, उसे सच साबित कर के दिखाया है वीरेश
दाहाल ने, जिन्होंने साइकल को विपरीत दिशा में चला कर विश्व में मुकम्मल
अमन और इंसानी भाईचारा का संदेश देते हुए नेपाल का नाम भी रौशन किया
है। आँखों में ऊंचे सपने संजोए इन दो युवकों से हिमालिनी के वास्ते हर्ुइ
रोचक बातचीत का सारांशः-
० आप का यह अभियान कब से शुरु हुआ –
-वि.सं. २०६२ साल पौष २० गते से
हम इस अनूठे सफर में निकले हैं। और अभी
तक हम ने एशिया के २९ और अप्रिmका के
१५ देशों का भ्रमण किया है।
० इस तरह विश्व भ्रमण करने का उद्देश्य –
-इस यात्रा से हम दुनिया में मुकम्मल
शान्ति हो और बंधुत्व की भावना में अभिवृद्धि
हो, यही संदेश देना चाहते हैं। वैसे तो कोई
भी आम पेशा अख्तियार कर हम भी जी
लेते। मगर लीक से कुछ हटकर कर दिखाना
था।
० यहां तक तो ठीक है। मगर साइकल
उल्टी चलाकर विश्व भ्रमण करने का विचार
कैसे आया –
-विश्व का ध्यान आकषिर्त करने के
लिए हम लोगों ने यह रास्ता अख्तियार
किया। अब निकट भविष्य में गिनिज बूक में
हमारा यह अजीबों गरीब सफर दर्ज होने जा
रहा है। इस सिलसिले में सारी प्रक्रियाएं पुर
ी हो चुकी हैं, जब तो हमें वर्ल्ड गिनिज बूक
से प्रमाणपत्र पाना शेष है। हमारे साथ-साथ
देश का नाम भी तो खुद व खुद रौशन होगा
न। हमारे विश्व भ्रमण से पर्यटन के क्षेत्र में
भी इजाफा होगा।
० आप लोगों का मकसद बहुत ही अच्छा है,
आप अपने मकसद में कामयाब हों। विदेशों
में घूमते वक्त कुछ कठिनाइयां तो पेश आई
होंगी – उनसे आप कैसे निपटते हैं –
-यह तो विल्कुल स्वाभाविक है। कभी साइकिल ही चोरी हो
जाती है तो कभी दूसरे देशों से भिसा मिलने में परेशानी। आर्थिक
समस्या तो हमेशा बनी रहती है। हाँ, विदेशों में रहने वाले नेपाली
भाई-बहनों का प्यार एक बहुत बडÞा सहारा है। विदेशों में कार्यरत
नेपाली सहयोगी जनों का हम तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हैं।
विदेशों में जहां नेपाली दूतावास नहीं है, वहाँ हम भारतीय दूतावास
से सहयोग लेते हैं। हमें उनसे मदद मिलती भी है।
० विदेश भ्रमण के क्रम में कोई रोचक स्मरणीय घटना –
-हाँ …. है न। रुवांडा में हमें उलटे ढंग से साइकल चलाते हुए
देख रहे मिनी ट्रक और कार आपस में टकरा गई थी। हालांकि कोई
मानवीय क्षति तो नहीं हर्ुइ। लेकिन दर्ुघटना से वहां लोगों का अच्छा
खासा जमावडÞा हो गया। और हम आसानी से अपने प्रचार-प्रसार के
मकसद में कामयाब हुए।
० आप लोगों से पहले किसी नेपाली ने ऐसा भ्रमण किया था –
-हां दोलखा के पुष्कर साह ने आज से ३-४ साल पहले साइकल
से १५० देशों का सफर तय किया था। मगर उन्होंने साइकल से
सीधी यात्रा की थी। हमारी यात्रा के मुकाबले उनकी यात्रा सहज
सरल थी।
० नेपाल सरकार से कोई मदद मिली या नहीं –
-नेपाल सरकार से तो हमें आज तक कोई मदद मिल नहीं
सकी। सरकार की यह बेरुखी हमारी समझ से दूर की बात है।
हां, गैर सरकारी संघ-संस्थाओं से गाहे-बगाहे कुछ मदद मिलती
है। व्यक्तिगत रूप से भी लोग सहयोग करते हैं। मिडिया ने अच्छा
साथ दिया है।
० इस मामले में आप लोगों के परिवार का रवैया कैसा रहा –
-पहले तो परिवार में कोई भी हमारे इस काम के र्समर्थक
नहीं थे। लेकिन बाद में धीरे-धीरे मिडिया ने जब हमें कभर करना
शुरु किया तो घर वालों का नजरिया भी बदलने लगा। अब कोई
समस्या नहीं।
० इस तरह साइकिल चलाना बहुत कठिन काम है। इसके लिए पूरा
अभ्यास करना पडÞा होगा –
-बेशक करना पडÞा। करीब ४-६ महीने का अनवरत अभ्यास
के बाद हम इस तरह साइकल चलाने में सफल हुए। अब उतनी
कठिनाई महसूस नहीं होती।
० आप लोग अपने इस नेक मकसद में कामयाब हों। हिमालिनी की
ढेर सारी शुभकामनाएं। आप कुछ कहना चाहेंगे –
-हां, हिमालिनी ने हमें कुछ कहने का, लोगों तक पहुँचने का
जो मौका दिया, उसके लिए हम हिमालिनी के शुक्रगुजार हैं।
-प्रस्तुतिः मुकुन्द आचार्य

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