रिश्ते में गरमाहट लाने की कवायद

नेपाल की कम्युनिष्ट पार्टियों ने अपने माथे पर राष्ट्रवाद की इतनी भारी गठरी उठा रखी है कि जब भी भारत के साथ बेहतर सम्बन्ध बनाने की बात आती है या भारत के द्वारा नेपाल की किसी परियोजना में निवेश करने की बात होती है तो ये उस गठरी को पटक वहीं सें राष्ट्रवाद का रोना रोने लगते हैं ।

श्रीमन नारायण
प्रधानमन्त्री पुष्म कमल दाहाल “प्रचण्ड” दक्षिणी पड़ोसी भारत के साथ बेहतर दोस्ताना सम्बन्ध बनाना चाहते हैं ।भारत विरोधी अपनी छवि में भी वे बदलाव लाना चाहते हंै । सितम्बर के मध्य में होनेवाली उनकी भारत यात्रा से दोनों देशों को काफी उम्मीदें हंै । विगत एक वर्ष की कड़वाहट के कारण आपसी रिश्तों में जो खटास देखी जा रही हंै उसे भी दूर करने का प्रयास प्रधानमन्त्री प्रचण्ड जरुर करेंगे । उनकी भारत यात्रा में द्विपक्षीय रिश्तो को मजबूती प्रदान करना, बहुचर्चित पञ्चेश्वर परियोजना के डीपीआर का काम सम्पन्न करना, मधेश के दक्षिणी क्षेत्र में स्थित हुलाकी (डाकिया) सड़क के निर्माण में भारत का सहयोग, पुर्व पश्चिम रेल मार्ग के लिए भारत का सहयोग तथा विगत के दिनों में हुई आपसी सन्धियों की समीक्षा के लिए गठित प्रबुद्ध समुह के कार्यो की समीक्षा जैसे विषय प्रमुख एजेण्डा होंगे । वहीं तराई मधेश को राजधानी काठमाण्डौ से जोड़नेवाली द्रुतमार्ग के निर्माण में भी भारत का सहयोग एक प्रमुख एजेण्डा हो सकता है ।
दरअसल सन् १९५० से लेकर अबतक भारत के साथ नेपाल के आपसी रिश्तो में व्यवधान खड़ा करने का काम नेपाल की कम्युनिष्ट पार्टियां करती रहीं हैं । नेपाल की कम्युनिष्ट पार्टियों ने अपने माथे पर राष्ट्रवाद की इतनी भारी गठरी उठा रखी है कि जब भी भारत के साथ बेहतर सम्बन्ध बनाने की बात आती है या भारत के द्वारा नेपाल की किसी परियोजना में निवेश करने की बात होती है तो ये उस गठरी को पटक वहीं सें राष्ट्रवाद का रोना रोने लगते हैं । नेपाल के प्रधानमन्त्री दाहाल की पार्टी भी कम्युनिष्ट ही हैं और यह पार्टी भी इससे अलग नहीं है परन्तु अब यह पार्टी भारत के साथ बेहतर रिश्ता बनाना चाहती है । वैसे भी यह सरकार नेपाली कांग्रेस एवं मधेशवादी दलों की बैशाखी के सहारे चल रही है सो चाह कर भी भारत का विरोध उग्र रुप में नही कर सकती है ।pm-delhi-1
प्रधानमन्त्री पद का शपथ लेते हीं प्रचण्ड ने अपनी प्राथमिकताएं तय कर दी । पिछले एक साल से आन्दोलन में रहे मधेशी दलो की मांगो की पुर्ति के लिए नई सरकार ने संविधान मे संशोधन करने की बात कही है ।

नेपाल के विकास एवं निर्माण काम में भारत के सहयोग को सरकार आवश्यक मानती है तथा पड़ोसी राष्ट्र भारत के साथ बेहतर एवं दोस्ताना ताल्लुकात चाहती हैं । प्रचण्ड सरकार का यह मानना है कि अगर दोनों देशों के नेताओं का द्विपक्षीय भ्रमण से आपसी रिश्ता बेहतर होंगे तथा परस्पर विश्वास भी बढेंगे । नेपाल के राजनीतिक इतिहास में दूसरी बार प्रधामन्त्री बनने का अवसर पाने वाले एक मात्र नेपाली कम्युनिष्ट नेता प्रचण्ड भारत की अहमियत को समझ रहे है ।
पुष्पकमल दाहाल की नेतृत्ववाली साझी सरकार ने दोनों पड़ोसी के साथ आपसी रिश्तों को सुधारने के लिए भारत में उपप्रधान एवं गृहमन्त्री बिमलेन्द्र निधी तथा चीन मे उपप्रधान एवं वित्त मन्त्री कृष्ण बहादुर महरा को भेजा, उनके इस कदम को काफी सकारात्मक माना जा रहा हैं तथा सराहा भी गया हैं । प्रचण्ड की विशेष दूत कूटनीति का असर तो देर सवेर दिखेगा ही परन्तु इसके शुरुआती संकेत अच्छे जरुर दिख रहे है ।
यह विशेष दूत कूटनीति के प्रभाव का ही नतीजा रहा है कि उत्तरी पड़ोसी चीन के राष्ट्रपति सी जिनपीड्ड की नेपाल भ्रमण सुनिश्चित हो पायी वही दक्षिणी पड़ोसी भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का भी नेपाल दौरा तय माना जा रहा है ।
प्रधानमन्त्री प्रचण्ड भारत के दौरे पर जाने से पहले देश के संविधान मे जरुरी संशोधन हेतु एक विधेयक भी संसद के पटल पर दर्ज करा देना चाहते हैं परन्तु अब इसकी सम्भावना काफी कम दिखती हैं ।

शायद दिल्ली से लौटने के बाद इसमें तेजी आ सके । आन्दोलनकारी मधेशियों तथा जनजातियों की मांगो के प्रति प्रचण्ड सरकार ने सम्वेदनशीलता दिखाई है । संविधान संशोधन के जरिये मधेशियों की मांगो को संविधान मे लिपिबद्ध कराने के लिए प्रचण्ड सरकार इमानदार दिखती है । डेढ वर्ष पूर्व कुछ मध्य पहाड़ी जिलाें मे आयी भूकम्प से पीड़ित लोग अब भी पुनर्वास एवं पुनःनिर्माण के लिए बाट जोह रहे है । प्रधानमन्त्री प्रचण्ड को उम्मीद है कि भारत का सहयोग इसमे लाभकारी सावित हो सकता है ।
वैसे सत्ताधारी माओवादी केन्द्र के कुछ नेताआें सहित देश की अन्य बामपन्थी पार्टी जो सत्ता से बाहर है प्रधानमन्त्री दाहाल को अभी से आगाह करा रहे है कि भारत के साथ वैसे किसी भी तरह का सम्झौता न हो, जो नेपाल के हित मे ना हों । नेपाल के किसी भी प्रधानमन्त्री का जब भारत दौरा होना सुनिश्चित होता है तो नेपाल की बामपन्थी पार्टीया, नेता, बामपन्थी बुद्धिजीवी, लेखक एवं पत्रकार अनावश्यक रुप से दबाव बनाना शुरु कर देते हैं ताकि भारत के साथ किसी भी तरह का सम्झौता ही न होने पाए ।

परन्तु जब मामला चीन का होता है तब वे कम्बल ओढ़कर सो जाते है । लोकतन्त्र में संसद से निर्वाचित बहुमत प्राप्त दल के नेता जिसके पास देश का कार्यकारी अधिकार भी हैं, उस पर इस तरह अनावश्यक दबाब बनाना गलत है । बंधे हाथ से मित्रता सम्भव नही है अत्याधिक उत्साह, निराशा, कुण्ठा एवं पुर्वाग्रही होकर विदेश सम्बन्ध नही बनाए जाते । फिर प्रधानमन्त्री प्रचण्ड को किसी दल से राष्ट्रवाद की प्रमाण–पत्र लेने की क्या जरुरत ? रिश्तों में गरमाहट लाने की उनकी इच्छा तथा प्रयास के सफल होने के आसार तो दिखाई देते हैं । व्

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