रुद्राक्ष का माहात्म्य

सेव्यः सेव्यः सदा सेव्यः शंकर सर्वदुःखहा

रुद्राक्ष शिव को बहुत ही प्रिय है । इसे परम पावन समझना चाहिए । रुद्राक्ष के दर्शन के स्पर्श से तथा उस पर जप करने से वह समस्त पापों का अपहरण करनेवाला माना गया है । शिवजी पूर्वकाल में हत्यारों दिव्य वर्षो तक घोर तपस्या में लगा रहा । लीलावश अपने दोने नेत्र खोले । नेत्र खोलते ही नेत्र पुरों से कुछ जल की बूंदे गिरी । आँसू की उन बूँदो से वहाँ रुद्राक्ष नामक वृक्ष पैदा हो गये । भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए चारों वर्णों के लोगों को बाँट दिये ।
भूतल पर भारत में मथुरा, अयोध्या, काशी तथा नेपाल और अन्य देशों में पाया जाता है रुद्राक्ष । रुद्राक्ष ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र जाति के लोग भी वर्णन के अनुसार लगाया जा सकता है । ब्राह्मणादि जातिवाले रुद्राक्षों के वर्ण श्वेत, रक्त, पीत तथा कृष्ण जानने चाहिए । मनुष्यों को चाहिये कि वे क्रमशः वर्ण के अनुसार लगा सकते है ।
भोग और मोक्ष की इच्छा रखने वाले चारो वर्णों के लोगों और विशेषतः शिव भक्तों को शिव–पार्वती की प्रसन्नता के लिए रुद्राक्ष के फलों को अवश्य धारण करना चाहिये । यह स्वास्थ्य दृष्टिकोण से भी उपयुक्त है, खासकर हाइप्रेसर वालों के लिए । आँवला के फल के बराबर जो रुद्राक्ष हो, वह श्रेष्ठ बताया गया है । जो बेर के फल के बराबर हो, उसे मध्यम श्रेणी का कहा गया है । जो चने के बराबर हो, उसकी गणना निम्न कोटि में की गयी है ।
जो रुद्राक्ष आँवले के फल के बराबर होता है, वह समस्त अनिष्टों का विनाश करनेवाला होता है तथा जो रुद्राक्ष बेर के फल के बराबर होता है, वह उतना छोटा होने पर भी लोक में उत्तम फल देनेवाला होता हे । तथा जो गुजाफल के समान बहुत–बहुत छोटा होता है, वह सम्पूर्ण मनोरूपों और फलों की सिद्धि करनेवाला होता है । एक छोटे रुद्राक्ष को विद्वानों ने एक बड़े रुद्राक्ष से दश गुना अधिक फल देनेवाला बताया है ।
पापों का नाश करने के लिए रुद्राक्ष धारण आवश्यक बताया गया है । वह निश्चय ही सम्पूर्ण अभीष्ट मनोरूपों का साधक है, अतः उसे अवश्य ही धारण करना चाहिये । लोक में मंगलमय रुद्राक्ष फल देनेवाला देखा जाता है । जिसे कीड़ो ने दूषित कर दिया हो, जो खण्डित हो, फूटा हो । जिसमें उभरे हुए दाने न हो, जो वर्णयुक्त हो तथा जो पूरा–पूरा गोल न हो, इन छह प्रकार के रुद्राक्षों को त्याग देना चाहिये, जिस रुद्राक्ष में अपने आप ही डोरा पिरोने के योग्य छिद्र हो गया हो, वही यहाँ उत्तम माना गया है । जिस में मनुष्य के प्रयत्न से छेद किया गया हो, वह मध्यम श्रेणी का होता है ।
रुद्राक्ष धारण बड़े–बड़े पातकों का नाश करनेवाला बताया गया है । ग्यारह रुद्राक्षों को धारण करने वाला मनुष्य रुद्रस्वरूप ही हो जाता है । इस जगत में ग्यारह सौ रुद्राक्ष धारण करके मनुष्य जिस फल को पाता है, उसका वर्णन सैकड़ों वर्षों में भी नहीं किया जा सकता ।
रुद्राक्षधारी पुरुष अपने खान–पान में मदिरा, मांस, लहसुन, प्याज, सहिजन आदि को त्याग दे । ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, गृहस्थ और संन्यासी सब को नियमपूर्वक रुद्राक्ष धारण करना उचित है । इसे धारण किये बिना न रहे, यह परम रहस्य है । इसे धारण करने का सौभाग्य बड़े पुण्य से प्राप्त होता है । यह रुद्राक्ष, प्राणी के शरीर पर जब तक रहता है तब तक स्वल्प मृत्यु, उसे बाधा नहीं पहुँचाती है । त्रिपुण्ड को धारण कर तथा रुद्राक्ष से सुशोभित अंगवाला होकर मृत्युंजय का जप कर रहे उस पुण्यवान मुनष्य को देखकर ही रुद्र दर्शन का फल प्राप्त हो जाता है ।
जहां रुद्राक्ष की पूजा होती है, वहाँ से लक्ष्मी द्वार नहीं जाती, उस स्थान के सारे उपद्रव नष्ट हो जाते है तथा वहां रहने वाले लोगों की सम्पूर्ण कामनाएं पूर्ण होती है ।
एक मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् शिव का स्वरूप है । वह भोग और मोक्षरूपी फल प्रदान करता है । उसके दर्शन मात्र से ही ब्रह्महत्या का पाप नष्ट हो जाता है । वहाँ से लक्ष्मी दूर नहीं जाती, सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण होती है ।
दो मुखवाला रुद्राक्ष देवदेवेश्वर कहा गया है । वहाँ सम्पूर्ण कामनाओं और फलों को देनेवाला है । वह विशेष रूप से गोहत्या का पाप नष्ट करता है । जीत मुखवाला रुद्राक्ष सदा साक्षत् साधन का फल देनेवाला है । उसके प्रभाव से सारी विधाएँ प्रतिष्ठत हो जाती है । चार मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् ब्रह्म का रूप है और ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति देनेवाला है । उसके दर्शन और स्पर्श से शीघ्र ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष– इन चारो पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है ।
पाँच मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् कालाग्नि रुद्ररूप है । वह सब कुछ करने में समर्थ, सब को मुक्ति देनेवाला तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्रदान करनेवाला है । वह पंचमुख रुद्राक्ष अगम्य स्त्री के साथ गमन और पापन्न–भक्षण से उत्पन्न समस्त पापों को दूर कर देता है । छः मुखोंवाला रुद्राक्ष कार्तिकेय का स्वरूप है । यदि दाहिनी बाँह में उसे धारण किया जाय तो धारण करने वाला मनुष्य, ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाता है । इस में संशय नहीं है ।
सात मुखवाला रुद्राक्ष अनग नाम से प्रसिद्ध है । उसको धारण करने से दरिद्र भी ऐश्वर्यशाली हो जाता है । आठ मुखवाला रुद्राक्ष अष्टमुर्ति भैरवस्वरूप है । उसको धारण करने से मनुष्य पूर्णायु होता है और मुत्यु के पश्चात् शुलधारी शंकर हो जाता है । नौ मुखवाला रुद्राक्ष को भैरव तथा कपिलमुनि का प्रतीक माना गया है, अथवा नौ रूप धारण करने वाली महेश्वरी दुर्गा उसकी अधिष्ठात्री देवी मानी गयी है, जो मनुष्य भक्ति परायण होकर अपने बायें हाथ में नवमुख रुद्राक्ष धारण करता है, वह निश्चय ही मेरे समान सर्वेश्वर हो जाता है इसमें संशय नहीं है । दस मुखवाला रुद्राक्ष सक्षात् भगवान् विष्णु का रूप है । उसको धारण करने से मुनष्य की सम्पूर्ण कामनाएं पूर्ण हो जाती है ।
ग्यारह मुखवाला जो रुद्राक्ष है, वह रुद्ररूप है– उसको धारण करने से मुनष्य सर्वत्र विजयी होता है । बारह मुखवाला रुद्राक्ष को केश प्रदेश में धारण करने से मानो मस्तक रूप बारहों आदित्य विराजमान हो जाते हैं । तेरह मुखवाला रुद्राक्ष विश्वदेवों का स्वरूप है । उसको धारण करके मनुष्य सम्पूर्ण अभीष्टों को प्राप्त करता है तथा सौभाग्य और मंगललाभ करता है । चौदह मुखवाला जो रुद्राक्ष है, वह परम शिव रूप है । उसे भक्तिपूर्वक मस्तक पर धारण करे, इससे समस्त पापों का नाश हो जाता है ।
इस प्रकार रुद्राक्ष की महिमा को जानकर धर्म की वृद्धि के लिए भक्तपूर्वक पूर्वोक्ति मन्त्रोद्वारा विधिवत उसे धारण करना चाहिये । भस्म और रुद्राक्ष को धारण करने वाले मुनष्य भगवान् शिव को अत्यन्त प्रिय है । उसको धारण करने के प्रभाव से ही भक्ति–मुक्ति दोनों प्राप्त हो जाती है, इसमें सन्देह नहीं है । भस्म एवं रुद्राक्ष से युक्त होकर जो मनुष्य शिव प्रतिमा के सामने स्थित होकर ‘ॐ नमः शिवाय’ इस प्रयाक्षर मन्त्र का जप करता है? वह पूर्ण भक्त कहलता है । भस्म और रुद्राक्ष के महातम्य अनन्त है । शिव–शिव । व्

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