रूमानियत भरे इश्क की इंतेहा पर हम अंधे हो जाते हैं

रूमानियत को अकसर इश्क की इंतेहा समझा जाता है. चाहत के इस फसाने की निशानी सिर्फ वेलेंटाइन डे के दिन ही नहीं बल्कि हर जगह दिखाई देती है.

फिल्मों की ही बात करें तो क्लिक करें रोमांस को पर्दे पर बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जाता है. भारत में तो ज़्यादातर फिल्में क्लिक करें प्रेम कहानियाँ ही होती हैं जिसमें प्रेमी सच्चाइयों से परे रोमांस के फंतासीनुमा जीवन में रहते हैं.

लेकिन ये ज़रूरी नहीं कि किस्से कहानियों, उपन्यासों और फिल्मों के कथानक में दिखाई जाने वाली क्लिक करें रोमांटिक बातें हक़ीक़त की दुनिया का हिस्सा भी हों. सवाल ये है कि क्या प्यार में रोमांस ही सब कुछ है? कहीं रोमांस की ये तिलिस्मी दुनिया प्यार के रास्ते में बाधा तो नहीं?

दोस्ती और फलसफे पर किताबें लिख चुके मार्क वेर्नन पेश से लेखक और पत्रकार हैं. वह कहते हैं कि रूमानियत को लेकर हमारा नजरिया दरअसल लंबे चलने वाले रिश्तों का सबसे बड़ा दुश्मन है.

मार्के कहते हैं,“शादी पर होने वाले खर्च को ही लीजिए. हाल के सालों में यह तेजी से बढ़ा है. अगर जोड़े अपनी फंतासी और उसकी मौद्रिक कीमत के बारे में सोचने लगें तो क्या होगा”.

उन्होंने कहा,“या सिनेमा पर ही गौर करें. बॉक्स ऑफिस पर रोमांटिक कॉमेडी फिल्में बड़ा कारोबार कर रही हैं. प्रेमियों के एक दूसरे की बाहों में खो जाने वाला सही नुस्खा मिल जाए तो आप करोड़ों कमा सकते हैं. डेटिंग वेबसाइट्स का कारोबार मंदी को मात देकर पिछले साल 60 फीसदी की दर से बढ़ा है”.

 

मार्के बताते हैं,”प्यार अंधा होता है या दूसरे लफ्जों में कहें तो रूमानियत भरे इश्क की इंतेहा पर हम अंधे हो जाते हैं और फिर नतीजतन हम जिंदगी में कुछ खोने लगते हैं.”

 

मार्क को लगता है कि यह इस दौर का सबसे दुखदाई मिथक है. मिथक और भी हैं. हम यह समझने लगते हैं कि कोई है कि जिसके होने भर से हमारी जिंदगी मुकम्मल हो जाती है और जिसके बगैर हम खुद को अधूरा महसूस करने लगते हैं.

इस आदमी की तलाश, उससे इश्क और फिर दो बदन से एक जान होने का खूबसूरत हादसा. नए जमाने की जिंदगी में यह एक मुश्किल चुनौती है.

मार्क कहते हैं कि यह साबित करना मुश्किल है और हैरत जाहिर करते हैं कि जोड़ों पर एक दूसरे की उम्मीदों को पूरा करने का किस कदर दबाव होता होगा. यह उन्हें मदद करने की बजाय रिश्तों को कमजोर करता है.

ये इशक नहीं आसां

प्यार को लेकर कई मिथक हमारे बीच मौजूद हैं.

सामाजिक तौर पर यह नजरिया गलत है क्योंकि यह प्यार को आदर्श की तरह पेश करता है. प्यार कहीं मिलता नहीं बल्कि किसी के साथ होने के होने के दरम्यां आने वाले खट्टे-मीठे उतार-चढ़ाव के बीच किया जाता है. वह उतना ही गलत हो सकता है जितना कि हम होते हैं.

यह बात आपको चौंका सकती है कि दूसरी शादी ज्यादा बेहतर चलती है. खासकर तब जबकि किसी ने रिश्तों की रूमानियत की इंतेहा पर जाकर अपनी राहें जुदा की हो.

हाल ही में एक अध्ययन में यह पाया गया कि जोड़ों की आपसी समझदारी, उन्हें मिलने वाला सामाजिक सहयोग और वित्तीय स्थायित्व जैसी चीजें रिश्तों की कामयाबी के लिए जरूरी हैं.

इन जोड़ों ने जिंदगी की जद्दोजहद से शायद बहुत कुछ सीखा है. वे अपनी मुश्किलों के बारे में सलीके से बात करते हैं और अपने साथी, रिश्तेदारों और दोस्तों पर भरोसा करते हैं.

क्या आपने कभी सोचा है कि इश्क का मौत से इतने करीब का रिश्ता क्यों है. यहां तक कि शेक्सपियर ने भी जब इश्क की कहानी लिखो तो इसे हादसा ही कहा.

अब इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि लोग रूमानियत के मिथक से इन्कार कर रहे हैं. 90 के दशक के बनिस्पत तनहा जिंदगी बसर करने वाले लोगों की तादाद 50 फीसदी बढ़ी है.

कई रिपोर्टों में कहा गया है कि अकेले रहने का मतलब अपनी आजादी को बेहतर तरीके से जीना और दोस्ती सरीखे दूसरे रिश्तों के लिए ज्यादा वक्त निकालना है.

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