रे अभागे मन

रवीन्द्र झा ‘शंकर’
प्रभोः मेरे लिए ‘मैं’ जितना प्यारा हूँ, उससे कहीं अधिक तुम्हारे लिए ‘मैं’ प्यारा हूँ । फिर मैं अपने लिए इतनी चिन्ता क्यों करता हूँ ? क्या तुम पर विश्वास नहीं है ? क्या हृदय ने तुम को भलीभाँति नहीं पहचाना ? सचमुच मैं तुमपर निर्भर तो नहीं हूँ । पतिव्रता स्त्री का सबकुछ चला जाय, एक पति बचा रहे, तो वह सारे अगाव को हँसती हुई सह लेती है ः क्योंकि उसके लिए पति से बढ़कर प्यारी–से–प्यारी चीज दूसरी कोई नहीं जो व्यभिचारिणी स्त्री सबके पास अपने हृदय की जाँच कराती फिरती है, पर किसी को प्राण नहीं दे सकती, वह कही पर वैसा आश्रम भी नहीं पाती, उसका मन किसी भी जगह निश्चित होकर नहीं ठहर सकता । इसी तरह हमारा मन भी अभी एकनिष्ठ नहीं हो सका है । वह अभी तक यह निश्चित नहीं कर सका है कि अपने को कहाँ दिया जाय ? हृदय के ग्राहक तो बहुत है ।

यश, अर्थ, विद्या, स्त्री, पुत्र, संसार आदि सभी हृदय खरीदना चाहते है । परन्तु चाहते हैं प्रायः बिना ही मूल्य क्योंकि हृदय का उचित मूल्य इनमें से किसी के पास भी नहीं है । पूरे दाम देकर हृदय खरीदने का सामथ्र्य किसी में भी नहीं दीख पड़ता । दुःख तो इसी बात का है कि जो हृदय की यथार्थ कीमत जानता है और पूरी कीमत दे सकता है, उसको हृदय पहचान कर अपना नहीं बना सका, प्यार न करने पर भी जो प्यार करता है, याद न करने पर भी जो याद आता है, उस चिरकाल के सखा को जीवन मरण के सहचर जीवनबन्धु को चाहते हो ।
रे अभागे मन तू किस सम्पत्ति के लाभ से किसकी मगा से मुग्ध होकर भूल रहा है ? धन चाहता है ? रूप चाहता है ? प्रतिष्ठा चाहता है ? बतला तो सही, उसके समान धनी और कौन है ? किसका इतना ऐश्वर्य है ? सभी लोकों में तो उसका ऐश्वर्य छा रहा है, बता, इतना रूप और किसका है ? जो स्वर्ग से लेकर मृत्यु लोक तक समाता नहीं ।

आकाश, चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र सभी में उसके रूप का बाजार लग रहा है । पशु–पंक्षी, कीट–पतंग और स्त्री–पुरुष के मुखों और नेत्रों में उसके कैसे अपूर्व रूप का विकास हो रहा है । न मालूम कब से कितने लोग इस रूप को देखते–चले आ रहे है, कितने प्रकार से कितने लोगों ने इसे समझने की चेष्टा की, परन्तु, किसी ने इस रूप की थाह नहीं पायी । किसी को यह रूप कभी पुराना नहीं लगा, कितने दिन बीत गये ध्रुव ने देखा, प्रहलाद ने देखा, अम्बरीस ने देखा, नारद आदि ऋषियो ने देखा, फिर ब्रज की गोपियों ने देखा, ग्वाल बालको ने देखा । अर्जुन, उद्धव, युधिष्ठिर, विदुर भीष्म ने देखा, पर देखा वही एक रूप, वही असीम शोभा, वही नयनों को हरने और हृदय शीतल करने वाली सुन्दरता । उसमे कभी कोई कभी नहीं हुई । जिसने देखा वही पागल हो गया । उसके स्नेह–ममता के सभी बन्धन खुल गये । अर्थ, रूप, यौवन, यश आदि सब का मोह छूट गया ।
उस प्राणराम को प्राण अर्पण कर देने पर जैसा निश्चित हुआ जाता है, वैसा और किसी को अर्पण करने पर नहीं होता, क्योंकि अन्य किसी में इतनी सामथ्र्य ही नहीं है । उसके समान तुम्हारे दुःख से दुखी होने वाला और कोई नहीं है । छोटे बच्चे की चिन्ता जितनी माता को रहती है, उतनी दूसरे किसी को नहीं रहती, क्योंकि माता के समान उसका आत्मीय दूसरा कोई नहीं है ।

इसी प्रकार उस हृदय सूखा परमात्मा के समान भी तुम्हारा परम आत्मीय दूसरा कोई नहीं हो सकता । संसार में कितने लोग कितना पाप करते है, कितना विरुद्धाचरण करते हैं, इसके लिये क्या वह उनको आश्रय नहीं देता ? क्या उनके लिये वह सूर्य का प्रकाश, वायु या जल का प्रवाह बन्द कर देता है ? कभी नहीं । वह जानता है कि तुम्हारा यह भाव सामयिक है ।

सदा के लिए नहीं । उसके साथ तो तुम्हारा निगूढ़ सम्बन्ध है, उसे तुम एक दिन अवश्य समझोगे । वह किसी भी बात के लिए घबराता नहीं । तब तुम्हें भी क्यों घबराना चाहिए ? दुःख, दारिद्रय, रोग, शोक, ताप सभी आये, खूब आये, किसी तरह भी डरो मत । यह सारी सौगात उसी के घर से तो आती है । बड़े सम्मान से सिर झुकाकर उसके दान को ग्रहण करो । ऐसा दिन फिर कब मिलेगा ? उसके लिये हुई भार को उठाने का ऐसा अच्छा मौका और कब होगा ? इस तरह उसे जोर से पकड़ने, जानते और समझने का सु–अवसर दूसरा नहीं हो सकता, अतः उसका दिया हुआ भार सिर चढ़ाने में कभी पीछे मत हटो, दुःख न करो । तुम्हारा ऐसा बन्धु दूसरा कौन होगा ? जिसके नाम लेने से जिसकी बात सुनने से, हार के सारे काम नहाना, धोना, खाना, सब भूल जाते है, उसको हृदय में पाकर क्या कभी दुःख को समझा जा सकता है ?

वह तुम पर इतना प्रेम करता है, इस बात को जान लेने के बाद दुःख की बात याद करने में भी तुम्हे लज्जा मालूम होगी । इससे कहा जाता है कि लाभ या हानि, अर्थ या अनर्थ, हेय या उपादेय, जन्म या मृत्यु, विच्छेद या मिलन, जो कुछ भी प्राप्त हो, सब कुछ उसका दिया हुआ समझकर निश्चित हो रहा रे अभागे मन ।
मैं उसका उसका सेवक हूँ– यह सोचकर उसके सम्पूर्ण आदेश पालन करने के लिए तैयार रहो । अरे ऐसा मित्र और कोई नहीं है । इतना प्रेमपूर्ण और कोई नहीं है । प्राण भी इतने अपने नहीं है, यह समझकर निर्भय निश्चित होकर उसके विश्व में विचरण करो ।
जब तक रहे, जिन्दगी फुरसत न होगा काम से
खुद समय ऐसा निकालो प्रेम कर लो भोलेनाथ से ।

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