र्सवशक्तिमान बने हने की लालसा:शिव पौडेल


र्सवाच्च अदालत द्वाा दिया गया फैसला ठीक है या नहीं यह प्रश्न ही अपने आप में प्रतिक्रियात्मक है। प्रश्न संविधान सभा के अधिका को सीमिति किए जाने का नहीं है। इस प्रकण में देखी गई एक मूल समस् या संविधान सभा की आजकता है। संविधान सभा के निर्वाचन के पश्चात नेपाली जनता की आशा, भोसा औ श्रद्धा का केन्द्र हुआ कती थी। लेकिन निर्वाचन के बाद अब तक की गतिविधि देखने प लगता है कि संविधान सभा दिया गया काम इमानदाीपर्ूवक नहीं कने, मेहनत कने से कताने औ शिष्टता भी प्रदर्शित नहीं कने लेकिन दूसे के अस् ितत्व को ही निषेध कने, दूसे के अधिका का कटौती क नैतिकता का धातल समाप्त क ही हैङ इस स् िथति में संविधान सभा के प्रति पहले वाला विश्वास कैसे कायम ह सकता है।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि अपना ही दायित्व पूा नहीं क पाने वाले संविधान सभा के ऊप प्रश्न उठाना मिल सकता है या नहीं-सभा सम्मेलन में सडक प ेडियो,टेलीविजन, पत्रपत्रिकाओं आदि में तो संविधान सभा की अकर्मण्यता प सवाल उठाए ही जा हे हैं। लेकिन जनता के द्वाा किये गए इस तह के सवालों का जवाब देने की नैतिक साहस हमो नेताओं में है ही नहीं। सामान्य जनता के प्रश्न को भी तब तक नहीं सुना जाता है जब तक कि वह आन्दोलन का रूप नहीं ले ले। लोकतंत्र संस् का में ढले समाज के व्यक्ति कुछ ज्यादा ही दलगत प्रभाव में हते हैं। इसलिए भी नेपाल में दलों की आजकता के विरूद्ध आन्दोलन कने का समय अभी नहीं आया है। ऐसे में उत्त ढूंढने कहां जाएं –
दूसा सवाल यह भी उठता है कि जनादेश के आधा प बनी संविधान सभा द्वाा अपना काम किए बिना ही उसके ऊप सवाल कने का अधिका किसे है-संवैधानिक अधिका प्रयोग कने वाली संविधान सभा को संविधान के नीचले कानूनी निकाय द्वाा सवाल कने की हैसियत है भी या नहीं-संवैधानिक निकायों में कार्यपालिका संविधान सभा के द्वाा ही बनाया जाना है। ाष्ट्रपति संवैधानिक होने की वजह से सक्रिय ाजतंत्र जैसा होने की बिलकुल भी संभावना नहीं है।बांकी बचा र्सवाेच्च न्यायालय। यदि इसे भी संविधान सभा के बो में प्रश्न कने का अधिका नहीं हुआ तो निश्चित मानिए संविधान सभा आजकता की ओ बढ हा है औ आगे भी काफी हदों को पा क आगे बढेगा। इसकी कई बा हमें झलक भी देखने को मिल चुकी है। ऐसे में या तो संविधान सभा के सदस् यों में सद्बुद्धि की कामना क सकते हैं या फि से जन आन्दोलन की तैयाी कनी पड सकती है। किसी भी व्यक्ति या संस् था को र्सवशक्तिमान बनाया गया तो वह आजक औ विवेकहीन बनता ही है। खुद को र्सवशक्तिमान की संज्ञा देक औ जनता से चुने जाने की आड में खुद को र्सवाेच्च मानने की आड में संविधान सभा को ना तो इस देश की जनता ने औ ना ही अन्तमि संविधान ने हमेशा अपनी ही आयु बढाने की इजाजत देता है।
र्सवाेच्च अदालत के फैसले का संविधान सभा सदस् यों द्वाा तीखी आलोचना हर्ुइ। कुछ उत्तेजित सदस् यों ने तो न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग की बात तक कह डाली। इसका मतलब यह है कि संविधान सभा के ऊप सवाल ही नहीं उठाया जा सकता है तो तो क्या ६०१ सभासदों की संख्या ही ाज्य है – क्या ६०१ लोगों की मर्जी से ही यह देश चलेगा- क्या ६०१ लोग जो निर्ण्र्ााक देंगे वही इस देश का कानून हो जाएगा- क्या ६०१ सभासदों ने किसी दबाब औ लालच में आक इस देश को किसी दूसे देश में विलय की घोषणा क देंगे तो क्या नेपाली जनता उसे भी मान लेगी- ऐसा कभी नहीं हो सकता। इसलिए संविधान सभा र्सवशक्तिमान औ अनन्त होगा ऐसा नहीं कहा जा सकता है। तो आखि क्यों कुछ दल के कुछ नेता यह स् वीका कने के लिए तैया नहीं हैं कि संविधान सभा की अवधि भी सीमित है औ इसे असीमित अधिका नहीं दिया गया है।
फेसबुक आन्दोलन से लेक गांव घ में होने वाले छोटे छोटे सभा सम्मेलनों में भी व्यक्त जनसाधाण की भावना यही है कि संविधान सभा की अवधि सीमित है औ उसे जल्द ही देश को संविधान बना क देना चाहिए। संयुक्त ाष्ट्र संघ, विदेशी ाजनयिक भी ाजनीतिक दल के नेताओं को ह बा यही सुझाव देते हैं कि जल्द से जल्द संविधान बने। इन सब बातों को सिोधार्य कने वाले हमो सभासद औ नेता आखि र्सवाेच्च अदालत के फैसले से क्यों तिलमिला गए- संविधान के अनुसा तो दो साल में ही संविधान बना लेने की जिम्मेवाी दी गई थी। लेकिन उस दिए गए अवधि में आखि ६०१ सभासद संविधान बनाने में क्यों असफल हुए- क्या किसी अनुसंधान, अध्ययन या गृहकार्य की कमी से नहीं बन पाई थी संविधान- ऐसा नहीं है। सच्चाई सभी को मालूम है। ाजनीतिक द्वेष, आपसी खींचतान औ इन सबके ऊप सत्ता का नशा हावी होने की वजह से ही तय समय में तो क्या अब तक संविधान नहीं बन पाया है। जितनी जागरूकता के साथ सका बदलने, प्रधानमंत्री बनने, मंत्री बनने औ दलों का विभाजन कने में सभासदों ने अपना बहुमूल्य समय नष्ट किया है। उतनी जागरूकता से यदि संविधान बनाने प ध्यान केन्द्रित हुआ होता शायद दो वषर्ाें में नहीं तो तीन वषर्ाें में अवश्य ही संविधान बन जाता।लेकिन संविधान सभा को सत्ता की जागी समझने वाले नेताओं को र्सवाेच्च अदालत के फैसले से दुस् ख होना स् वाभाविक है। अपनी नौकी खते में देख कोई भी तिलमिला सकता है। इसको अस् वाभाविक नहीं लेना चाहिए।
र्सवाेच्च अदालत ने संविधान सभा की अवधि ६ महीने से अधिक नहीं बर्ढाई जा सकती है इस फैसले को अन्तमि संविधान की संबंधित धाा की प्रतिबन्धात्क वाक्यांश को आधा बनाया है। इस प्रतिबन्धात्मक वाक्यांश में कहा गया है कि ६ महीने की तय समय में यदि संविधान का निर्माण नहीं हो पाता है तो संविधान सभा स् वतः भंग हो जाएगी। अदालत के द्वाा किए गए व्याख्या से यही लगता है कि संविधान सभा की अवधि अनन्त काल तक नहीं ह सकती है। संविधान सभा के द्वाा बा बा बनाई गई संविधान निर्माण की कार्यतालिका को पूा नहीं कना उसे अमल में नहीं लाने प र्सवाेच्च अदालत में सवाल उठाया गया है। ऐसा नहीं है कि संविधान सभा भंग क खुद र्सवाेच्च अदालत या उसके न्यायाधीश खुद ही कार्यपालिका या विधायिका की शक्ति हडपना चाहती है।
र्सवाेच्च अदालत ने ६ महीने के भीत तीन स् िथति की कल्पना की है। पहला ६ महीने के भीत अन्तमि संविधान के मुताबिक संविधान का निर्माण क उसे जाी कना। दूसा समय प संविधान जाी नहीं हो पाया तो जनमत संग्रह के द्वाा संविधान सभा के भविष्य के बो में फैसला कना औ तीसा कि फि से जनता के सामने जाक नयां चुनाव कवाना। इन तीनों स् िथति में ाजनीतिक दलों को सीधे जनता से सामना कना होगा। औ इस देश का कोई भी नेता अभी इस स् िथति में नहीं है या फि उसने कुछ भी वैसा नहीं किया है कि वह जनता का सामना क सके। खुद को जनता के मत प चुन क आने का दावा कने वाले नेताओं को आखि जनता के बीच में जाने से ड कैसा –
अतः र्सवाेच्च अदालत के द्वाा संविधान सभा की अवधि संबंधी फैसला का विोध कने का तार्त्पर्य संविधान सभा ाजनीतिक दल के नेता औ सभासद को खुद को कम क नहीं आंकना चाहिए। यह उनमें हीनताग्रस् त की अभिव्यक्ति को दर्शाता है। र्सवाेच्च अदालत के फैसले के बाद ६ महीना तक कडी मेहनत क संविधान के बांकी बचे काम को पूा कने में लगाना चाहिए। संविधान निर्माण के क्रम में विवादित देखे गए विषयों प यथासंभव सहमति जुटाने का प्रयास किया जाना चाहिए औ जिन विषयों प सहमति नहीं बन पाती है उन विषयों प जनमत संग्रह काया जाना चाहिए। इसके लिए र्सवाेच्च अदालत का फैसला आडे नहीं आने वाली है। अनन्त काल तक पदासीन होने की इच्छा सभी की होती है। लेकिन इसकी वैधानिकता का निर्धाण पद पाने से पर्ूव बनी विधि के द्वाा किया जाता है। अपने अनुकूल नियम पविर्तन क अपनी पद की आयु बढाते हने उसकी वैधानिकता नहीं मिल सकती है। ाज्य संचालन के लिए लोकतांत्रिक शासन प्रणाली अपनाने के लिए चुनाव औ उसके पणिाम को तो मानना ही पडेगा। ±±±

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