र्सार्क, उपहार और ऊर्जा समझौता

सम्पादकीय
र्सार्क आया और चला गया । उम्मीदों के कई पुलिन्दे थे जो खुले भी, किन्तु फिर उसी में सिमट कर रह गए । अन्य र्सार्क सम्मेलन की भाँति इस १८वें सम्मेलन में भी भारत और पाक के रिश्तों की कसमसाहट ही र्छाई रही और पाक की मेहरबानी की वजह से उर्जा समझौता के अलावा कुछ हाथ नहीं आया । हाँ, देश की खातिरदारी की तारीफें अवश्य हर्ुइं । आने को तो कई राष्ट्रप्रमुख आए, पर किसने क्या कहा यह किसी को याद नहीं, याद रहने वाली और कईयों के मस्तिष्क को झकझोरने वाली अगर कोई बात है, तो वह है ट्रमा सेन्टर के उद्घाटन में मोदी द्वारा दी गई नसीहत । उन्होंने आइना दिखाया पर, अपनी ही छवि देखकर तिलमिलाहट हो गई । बात भी सही है भला किसी को क्या हक बनता है आपकी कमियों को दिखाने का – आप तो बस दिए हुए उपहार देखिए और दिल्ली से काठमान्डू और काठमान्डू से दिल्ली तक की सहज बस यात्रा का मजा लीजिए । जाते जाते एक और याद करने वाली बात हर्ुइ कि उद्घाटन सत्र में, एकदूसरे से आँखे चुराने वाले,  समापन सत्र में हाथ मिलाने को तैयार हो गए और यह उपलब्धि नेपाल के हिस्से में आई ।
मोदी का जनकपुर भ्रमण रद् होना, डा. सी.के. राउत का ऐन मौके पर जमानत देकर रिहा होना और फिर गिरफ्तार होना साथ ही र्सार्क के बहाने राजधानी का सजना सँवरना, गुजरा हुआ महीना इन्हीं रंगों में रंगा हुआ था । फिलहाल यह रंग अभी भी दिख रहा है र्सार्क के अवसर पर लगाई गई हरियाली का रंग बिखर ना जाए, ताजे बने जेब्रा क्रासिंग का, सभ्य जनता उपयोग करें इन बातों के लिए सम्बन्धित निकाय तत्पर दिख रहे हैं ।
नववर्षदस्तक दे चुका है और इसी के साथ ही हिमालिनी ने कई उतार चढÞाव के बावजूद अपने सत्रह वर्षपूरे कर लिए हैं । आने वाले कल में भी आप सुधी पाठकों का सहयोग और साथ मिलता रहे ये हिमालिनी परिवार की अपेक्षा है आपसे । आइए  कुछ नई उम्मीदों के साथ आनेवाले साल का इस्तकÞवाल करें ।  आने वाले वर्षकी अशेष शुभकामनाएँ ।

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