र्सार्क का साझा गीत

अरुण ठकुरी:सही अर्थ की राजनीति का ध्येय मानवता को जोडÞना है । यह एक ऐसा शास्त्र है जो समस्त मानवता को एक आपस में आत्मीय सम्बन्ध स्थापित करके एक आदर्श विश्व निर्माण के लिए दिशाबोध करता है । आदर्श विश्व की परिकल्पना तथा आदर्श विश्व निर्माण करने का प्रयास मानव सभ्यता के शुरुआती समय से ही होता आया है । वर्तमान कालखण्ड में मानव द्वारा स्थापित संरचनाओं को उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है । ऐसी संरचनाएँ समाज के आधारभूत इकाईयों से लेकर अन्तर्रर्ाा्रीयस्तर संघ संस्थाओ के रुप में काम कर रही हैं । यद्यपि कतिपय मानवीय स्वार्थ शुरु से ही आदर्श विश्व के निर्माण के प्रयास को अवरुद्ध करते आए हैं । शायद यही कारण है कि क्षणिक और  निकृष्टतम हितों की पर्ूर्ति के लिए किए जाने वाले राजनीतिक अभ्यास के कारण राजनीति और राजनीतिज्ञ अपनी गरिमा और आदर्श से दूर जाते नजर आते हैं । कतिपय लोगों का मानना है कि राजनीति इन्सान इन्सान के बीच दूरी पैदा करती है, इन्सानियत को बाँटती है । विश्व का वर्तमान राजनीतिक परिदृष्य राजनीति के इस निकृष्टतम् स्वरूप की पुष्टि करता है ।sarc_himalini
मानव जीवन हमेशा से उत्कृष्ट प्रति आकषिर्त होता रहा है । यह एक ऐसी भावना है जो आदमी को अन्य प्राणियों से विशिष्ट बनाती आई है । यह भावना मानव सभ्यता के अस्तित्व के आरम्भ से निरन्तर रुप में विकसित होती आयी है । यह कहना बडÞा मुश्किल है कि यह दुनिया मानव सभ्यता के उत्कृष्ट स्वरूप को या आदर्श विश्व निर्माण के लक्ष्य को कब तक प्राप्त कर लेगी – वर्तमान परिदृश्य में धर्म, जाति, लिङ्ग, सम्प्रदाय, भूगोल, रंग, भाषा, जीवन शैली, शक्ति और समृद्धि के आधार पर होने वाली विभेदयुक्त राजनीति का बोलबाला है । हजारों लाखों नदियाँ लहू-लुहान हो चुकी हैं, करोडों हेक्टेयर जमीन सीँच चुकी है इन्सान के खून से, लेकिन हर आदमी के खून का रंग लाल होता है यह बात इन्सान आज तक नहीं समझ पाया है । हालांकि इन्सान-इन्सान के बीच दूरी मिटाने की कोशिश जारी है लेकिन कतिपय राजनीतिक आग्रह पर्ूवाग्रहों ने इस कोशिश को हमेशा कमजोर किया है । क्या राजनीति से इतर कोइ ऐसी चीज या माध्यम हो सकता है जो इन्सान-इन्सान के बीच की दूरी को मिटा सके – ऐसा कौन सा उपाय है, जो दुनियाभर की असमानताओं को भुलाकर सारी इन्सानियत को एक साथ खडÞा कर सके –
उपरोक्त गम्भीर प्रश्न का उत्तर किसी संवेदनशील मन-मष्तिष्क में ही प्रस्फुटित हो सकता है । ‘पृथ्वीगान’ के माध्यम से इन्सानियत को जोडÞने का प्रयास कोई समान्य बात नहीं है । गीत-संगीत की कोई जाति नहीं होती । यह विधा धर्म, लिङ्ग, सम्प्रदाय, भूगोल, रंग, भाषा, जीवन शैली, शक्ति और समृद्धि जैसे विषयों से मुक्त है । यह एक ऐसी विधा जो सीधे सीधे इन्सान की आत्मा को आल्हादित कर देती है । पेडÞों से टूटकर गिरते सूखे पत्तो से निकलता नाद, झरने के पानी में खिलखिलाते सुर, बादलों से निकलकर टप-टप करके गिरती बूँदों का राग और घने जंगलों से होकर गुजरती हर्ुइ हवा की सुर-लहरी को किसी  सोच या मान्यता की बेडिÞयों में कैद नही किया जा सकता । कोयल की कूक हो या भँवरे की भुन-भुन, षोडसी के आलिंगन में छलकती गगरी की छप-छप हो या शिशु की किलकारियों मे बजती सरगम राजनीतिक और भौगोलिक सीमाओं के परिवर्तन के साथ अपनी प्राकृतिक स्वरुप में कोई फेरबदल करती हैं – गीत-संगीत की भूमिका इन्सान द्वारा बनाए गए नियम और कतिपय सनकपर्ूण्ा प्रावधानों से अलग एक साझा विधा के रूप में हमेशा विश्व बन्धुत्व के सही अर्थों को मानव जीवन में स्थापित करने की रही है ।
२२ नवम्बर से काठमांडू में शुरु होने जा रहे र्सार्क शिखर बैठक की तैयारी युद्धस्तर पर है । र्सार्क के सदस्य राष्ट्र भारत के विदेश मन्त्रालय के कर्मचारी तथा नेपाल स्थित भारतीय राजदूतावास के प्रथम सचिव अभय कुमार के लिए १८ वां र्सार्क शिखर सम्मेलन महत्वपर्ूण्ा है । आसन्न शिखर सम्मेलन में अभय कुमार के दो अलग व्यक्तित्व सामने आएंगे । पहला एक कूटनीतिक अधिकारी के रूप में, और दूसरा एक कवि के रूप में । र्सार्क के अस्तित्व में आने के बाद सन् १९८५ में पहली बार बांग्लादेश की राजधानी ढाका में शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था । अनेक अवरोधों के बावजूद बीते हुए ३० वर्षों मे १७ शिखर सम्मेलन सफलता पर्ूवक सम्पन्न हो चुके हैं । पिछले ३ दशक मे र्सार्क सम्मेलन आयोजित करने का नेपाल को तीसरी बार अवसर मिला है । र्सार्क संगठन अपने उद्देश्यों को पूरा करने में कितना सफल रहा – र्सार्क संगठन की क्या-क्या उपलब्धियाँ रही या र्सार्क संगठन के उद्देश्य की पर्ूर्ति हेतु उत्पन्न होने वाले व्यवधानों को दूर करने के लिए किस तरह के उपाय अपनाए जाने चाहिए जैसे विषयों पर गम्भीर विचार-विमर्श और अधिक गृहकार्य की आवश्यकता है । बीते ३ दशक और १७ शिखर सम्मेलनों में र्सार्क क्षेत्र की जनता की भावनात्मक रुप से र्सार्क संगठन से जुडÞ पायी हैं या नहीं – यह एक विचारणीय विषय है । निश्चय ही अतिथि सत्कार, कतिपय औपचारिक समारोह, मीडिया कवरेज जैसे कार्यों के अलावा र्सार्क के शिखर सम्मेलन हमेशा से ही रंगहीन, भावहीन, नीरस और औपचारिक क्रियाकलापों के बीच सम्पन्न होते आए हैं । उद्घाटन समारोह के दौरान आयोजनकर्ता राष्ट्र के द्वारा प्रस्तुत किए जानेवाले धार्मिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियांे के प्रति फरक मान्यता वाले राष्ट्रों के प्रतिनिधियो की स्वाभाविक उदासीनता से शुरु होनेवाली नीरसता की निरन्तरता के साथ सम्मेलन समाप्त हो जाता है । वास्तव में र्सार्क सम्मेलन की शुरुआत एक ऐसे कार्यक्रम से होनी चाहिए जिस में र्सार्क संगठन के सभी राष्ट्रो के प्रतिनिधियों को भावनात्मकरुप में एक सूत्र में जोडÞ सके ।
गीत-संगीत आत्माओं के बीच भावनात्मक एक्यवद्धता कायम करनेका एक मजबूत आधार है । यह एक ऐसी सोच है जो सिर्फकिसी ‘कवि चित्त’ और साहित्यिक मन की गहराइयों से ही प्रस्फुटित हो सकती है । गीत-संगीत की शक्ति को कवि अभय कुमार ने महसूस किया और एक साझा गीत की रचना की जो र्सार्क सदस्य राष्ट्रों के बीच एकता तथा सहयात्रा का वातावरण निर्माण करने के लिए प्रेरणा गीत के रूप में र्सार्कगान बनने की तैयारी में है । राष्ट्रीयगान या नेशनल एन्थम का मूलभूत उद्देश्य लोगों को एक-आपस में जोडÞना है । यह सुसभ्य, सुसंस्कृत तथा सुशिक्षित मानव तथा मानव समाज की पहचान भी है । किसी भी समाज या समुदाय की सभ्यता उस समाज या समुदाय की कला, संस्कृति तथा साहित्य के विकास से प्रतिबिम्बित होती है । दक्षिण एशिया क्षेत्र के राष्ट्रों का अत्यन्त गौरवशाली और समृद्ध इतिहास रहा है । हालांकि समय के साथ राज्यों का निर्माण और विनिर्माण होना इतिहास की एक सीख है । राज्यों के गठन और विघटन के कारण इतिहास के पन्नों पर दर्ज हैं । लेकिन साहित्य, संस्कृति और कला राज्यों के निर्मार्ण और विनिर्माण के वाजूद अपने प्राकृत अस्तित्व के साथ जीवित हैं । जहाँ तक राष्ट्रगान का सर्न्दर्भ है, यह किसी भी राष्ट्र विशेष की तात्कालिक परिस्थिति को प्रस्तुत करता है । विश्व के वर्तमान राष्ट्रगान कहीं राष्ट्रनिर्माता की प्रशस्ति करते हैं तो कहीं राष्ट्रीय ध्वज की आराधना के रूप में है । कतिपय राष्ट्र के राष्ट्रगान युद्ध और व्रि्रोह के भाव से प्रेरित दिखायी देते है ।
विगत लम्बे समय से र्सार्क के लिए साझागान की आवश्यकता को महसूस किया जा रहा था । इसी आवश्यकता को महसूस करते हुए कवि अभय कुमार ने र्सार्क गान की रचना की है । आसन्न १८ वें र्सार्क शिखर सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में र्सार्क सदस्य राष्ट्र बीच कायम सम्बन्धों को भावनात्मक रूप में और अधिक सुदृढ बनाने हेतु सदस्य राष्ट्रों के साझा गान अर्थात् ‘र्सार्क एन्थम’की रचना तथा र्सार्क एन्थम को संगठन के आधिकारिक गान की मान्यता देने के लिए नेपाल सरकार के विदेशमन्त्री माननीय महेन्द्र पाण्डे ने आवश्यक पहल करने का आश्वासन दिया है । यह एक ऐसा ऐतिहासिक अवसर होगा जब नेपाल सरकार की अग्रसरता में शुरु किए जानेवाले र्सार्कगान से र्सार्क संगठन के सदस्यों को एक साझा गीत और संगीत से साथ-साथ चलने की प्रेरणा को नयी ऊर्जा मिलेगी ।
र्सार्कगानका विचार इस क्षेत्र के लिए नया प्रतीत हो सकता है । लेकिन क्षेत्रीय तथा अन्तर्रर्ाा्रीय गान की अवस्था पर दृष्टि डालें तो कतिपय क्षेत्रीय तथा अन्तर्रर्ाा्रीय संगठन इस विचार को अवलम्बन कर चुके हैं । दक्षिण-पर्ूर्वी एशियायी राष्ट्रों के संगठन -आशियान) द्वारा ‘आसियान वे’ को सन् २००८में आधिकारिक गीत की मान्यता दी । यूरोपियन संघ ने बिथोवेन सिम्फोनी नं. ९ -ओड टु जोय) तथा अप्रिmकी संघ ने ‘लेट्स अल यूनाइट एण्ड सेल्रि्रेट टुगेदर’ को शर्ीष्ाक गीत बनाया है । उपरोक्त सभी संगठनों ने स्वीकार किया है कि प्रचलन में लाए गए गीतों ने सदस्य राष्ट्रों के बीच आपसी एकता तथा भावनात्मक ऐक्यबद्धता को अधिक सुदृढ किया है । दक्षिण एशिया क्षेत्र की ९ प्रमुख भाषाओं में रचित तथा सदस्य राष्ट्रों कीे पहचान, सम्मान, तथा समृद्धि प्रति समर्पित र्सार्क गान नेपाल के रेडियो गुञ्जित हो रहा है । कला र्राई, सुमी सिंह, सरला र्राई, आभा मुकारुङ, सपन घिमिरे, तथा रोशन थपलिया के स्वरों को सपन घिमिरे ने खूबसूरत अंदाज में संगीतबद्ध किया है ।
र्सार्क संगठनके ८ सदस्य राष्ट्र नेपाल, भारत, मालदिव्स, श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान, पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान की राष्ट्रीय भाषाओं मे रचित र्सार्कगीत ने आपसी सहयात्रा के द्वारा विकास तथा समृद्धि की ओर अग्रसर होने का सन्देश दिया है । इस गीतमें उल्लेखित नाग तथा चीन पर्वत र्सार्क की पर्ूर्वी सीमाएँ हैं । महावेली श्रीलंका की सबसे लम्बी नदी है और एडम्स पीक सबसे पूजनीय शिखर । धिवेही मालदिभ्स की सरकारी भाषा है । गीत में दक्षिण एशियायी राष्ट्रों की जीवन रेखा के रूप में बहनेवाली सिन्धु, गंगा तथा ब्रहृमपुत्र का वर्ण्र्ााहै । इस क्षेत्र की जीवन्त सांस्कृतिक विविधता एवं आपसी ऐक्यबद्धता की शक्ति से लक्ष्य प्राप्ति की ओर अग्रसर होने की आकांक्षा का अनुष्ठान किया गया है । शान्ति, बन्धुत्व और साझा विकास की सहयात्रा के मूलमन्त्र के रूप में रचित र्सार्कगान किसी समारोह या औपचारिक गान के रूप में ही नहीं इसे र्सार्क राष्ट्र की जनता के साझागीत के रूप में स्थापित करना र्सार्क संगठन की प्राथमिकता का विषय बनना जरुरी है । ८ सदस्य राष्ट्र की जनता के होठों पर नाचने वाला र्सार्कगीत निश्चय ही एक आदर्श मानव सभ्यता निर्माण के प्रयास में मील का पत्थर साबित हो सकता है, इस प्रयास को र्सार्थक अंजाम तक पहुँचाना र्सार्क सदस्यों का कर्तव्य भी है ।

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