र्सार्क भाषा साहित्य सम्मेलन

राष्ट्रपिता महात्मा गान्धी की १४४वीं जयन्ती के उपलक्ष्य में एवं राष्ट्रीय आजादी की ६६वीं वर्षांठ के अवसर पर राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी रूपाम्बरा द्वारा सिक्किम की राजधानी गान्तोक में २७ से २९ अक्टूबर २०१३ तक अंतर्रर्ाा्रीय भाषा साहित्य सम्मेलन का आयोजन हुआ था । सम्मेलन में भारत सरकार के मन्त्रालयों, विभागों, निगमों, उपक्रमों तथा प्रादेशिक सरकारों के प्रतिनिधि, सुप्रतिष्ठित लेखक, कवि, विद्वान लगभग २०० की संख्या में उपस्थित थे । सम्मेलन का उद्घाटन सिक्किम के माननीय मुख्यमन्त्री के स्थान पर एन.के. प्रधान, माननीय उच्च शिक्षामन्त्री ने किया तथा अध्यक्षता विशिष्ट अतिथि सिक्किम के विधानसभा सदस्य डोरजी नामग्याल ने किया । hindi dibas-himalini hindi magazine
मुख्य अतिथियों एवं उपस्थित प्रतिनिधियों को सम्बोधन करते हुए राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी रूपाम्बरा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कविवर स्वदेश भारती ने स्वागत मन्तव्य में कहा कि भाषा एवं साहित्य संस्कृति की नदी के दो तट होते हैं । नदी के प्रवाह के लिए तटांे का होना आवश्यक है । मनुष्य की सभ्याता के प्रारम्भ से लेकर आज तक भाषा और साहित्य ने समाज, राजनीति एवं मानव व्यवहार को प्रभावित किया, नये अवदान प्रदान किए । जहाँ राजनीति अवसरवाद तथा लोभ से मनुष्य को किसी न किसी प्रकार तोडÞती है; वहीं भाषा, साहित्य एवं संस्कृति मनुष्य को जोडÞती है । यह सम्मेलन भाषा साहित्य एवं संस्कृति के उन्नयन की दिशा में एक कारगर कदम है । भारत ने यह भी कहा कि मनुष्य जब भाषा और संस्कृति का दामन छोडÞ देता है, तब उसका अधोपतन प्रारम्भ हो जाता है ।
यह बात सही है कि भाषा साहित्य और संस्कृति के बिना एक पग भी आगे नहीं बढÞ सकते । सारे राष्ट्र के लिए भाषा होना जरूरी है । और वह हिन्दी होनी चाहिए । एन.के. प्रधान माननीय उच्च शिक्षा मन्त्री ने मुख्य अतिथि के रूप में अपने भाषण में कहा कि सिक्किम में बाँलीबुड हिन्दी चलती है, जिसे सिक्किम में बहुसंख्यक लोग बोलते हैं । सिक्किम में नेपाली, भुटिया और लेप्चा भाषाएं प्रचलित हैं, परन्तु लगभग ९५ प्रतिशत लोग नेपाली हिन्दी बोलते हैं । इससे लोगों में एकता स्थापित है । हमें अपनी भाषा को उत्तरोत्तर आगे बढÞाने के लिए प्रयास करना चाहिए ।
उद्घाटन समारोह में सम्मेलन स्मारिका के रूप में ‘रूपाम्बरा’ का भाषा-साहित्य विशेषांक डाँ. स्वदेश भारती द्वारा सम्पादित ‘बृहत् कार्यालयीन तकनीकी भाषा कोष’ तथा कई अन्य लेखकों की पुस्तकों का विमोचन हुआ । नेपाली के प्रख्यात लेखक, कवि वीरभद्र कार्की तथा १० सम्मेलनों में लगातार भागीदारी करने के लिए संसदीय कार्य मन्त्रालय, भारत सरकार में सहायक निर्देशक, राजभाषा सुश्री मृगनयनी को विशिष्ट हिन्दी सेवा सम्मान से सम्मानित किया गया ।
उक्त अन्तर्रर्ाा्रीय साहित्य संगोष्ठी का विषय था- भारतीय भाषाओं के उन्नयन तथा विकास में तकनीकी प्रशिक्षण की अनिवार्यता । इस संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रमोद मोहन जौहरी, मुख्य महाप्रबन्धक -मा.सं. एवं प्रशासन) गोवा शिपयार्ड लि. ने किया । डाँ. स्वदेश भारती ने संगोष्ठी का शुभारम्भ करते हुए कहा कि भाषा और साहित्य मानव शरीर में रीढÞ और मस्तिष्क की तरह काम करते हैं । भाषा और साहित्य की चिन्ता किसी को नहीं है । जबकि किसी भी राष्ट्र की र्सार्वभौम सत्ता के लिए चार बातें महत्वपर्ूण्ा होती हैं- १. संविधान, २. २ राष्ट्र ध्वज, ३. राष्ट्रगान, ४. राष्ट्रभाषा ।
डा. अनिल कुमार शर्मा, मुख्य महाप्रबंधक, भारत सरकार टकसाल, मुर्म्बई ने कहा कि हमें हिन्दी को र्सार्क देशों मे अनुवाद के माध्यम से ले जाना चाहिए तथा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में सरकार की व्यापक भूमिका होनी चाहिए । केपी सत्यानन्दन निर्देशक, रेलवे बोर्ड, रेल मन्त्रालय ने कहा कि हिन्दी कार्यान्वयन में रेल मन्त्रालय सबसे आगे है । हमने सारे देश में कम्प्यूटरों पर टिकट आरक्षण करने के लिए हिन्दी का साफ्टवेयर प्रोन्नत किया । हमारे सभी विभागों एवं कार्यालयों में हिन्दी का काम बहुत तेजी से चल रहा है । इस सम्मेलन में हमें अन्तर्रर्ााट्रय राजभाषा शील्ड सम्मान देकर जो प्रोत्साहन दिया गया है, उसका हम सम्मान करते हैं और यह आश्वस्त करते हैं कि भारतीय रेल हिन्दी कार्यान्वयन में सबसे आगे चलने के लिए हर तरह से तैयार है । नगेन्द्र कुमार मिश्र, प्रबंधक, इंजीनियर्स इंडिया लि. ने कहा कि अंग्रेजी की मानसिकता को हटाना चाहिए । हिन्दी के विकास में हिन्दी के पंडित अधिक बाधा डÞालते हैं । हिन्दी कोश तो बनाए गए, लेकिन शब्द बेहद क्लिष्ट हैं । साहित्य की भाषा अलग होती है । बोलचाल और काम करने की भाषा अलग होती है । साहित्यकार सम्पादक महेन्द्र गगन ने कहा कि भारतीय भाषाओं में अधिक अनुवाद होना चाहिए । अनुवाद प्रशिषण पर अधिक से अधिक ध्यान देना चाहिए ।
हिन्दी की दिशा तथा दशा को सुधारना हम सब का सम्मिलित काम है । मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान है । यह बात सच है कि अब अंग्रेजी की मानसिकता को हटाना चाहिए । क्रमशः हिन्दी प्रयोग एवं प्रचार-प्रसार में कठिनाइयां और निदान विषय पर चर्चा आरम्भ हर्ुइ । इस सत्र के अध्यक्ष साहित्यकार महेन्द्र गगन थे । इस संगोष्ठी का शुभारम्भ करते हुए प्रमोद मोहन जौहरी, मुख्य महाप्रबंधक, गोवाशिपयार्ड ने कहा कि हम झील बने तो ठहरे रहे, दरिया बनते तो दूर निकल जाते । हिन्दी को दरिया की रवानी बनाना है । आम आदमी कौन सी भाषा समझ सकता है, वैसी ही भाषा का प्रयोग होना चाहिए । सरकारी कार्यालयों में पदस्त हिन्दी अधिकारियों को यह बात समझना है । नगेन्द्र कुमार मिश्र, वरिष्ठ प्रबंधक इंजीनियर्स इंडिया ने कहा कि तकनीकी ज्ञान के लिए मानसिकता को बदलना जरूरी है । तकनीकी भाषा के अंदर तकनीकी शब्द बंधा होता है । शब्दों के चयन में स्तरीय ज्ञान होना जरूरी है । तकनीकी भाषा के अंदर तकनीकी शब्द बंधा होता है । शब्दों के चयन में स्तरीय ज्ञान होना जरूरी है । अनुवाद बिना मूल भाषा ज्ञान और मनोयोग के ठीक-ठीक नहीं हो पाता । अशोक कुमार अधिकारी, पंचायती राज मन्त्रालय ने कहा कि हम मानसिक गुलामी के शिकार हैं । जब हम इस गुलामी को छाडेंÞगे तभी हिन्दी को अपना पाएंगे । सरल, बोल-चाल की भाषा को हिन्दी के माध्यम से ही हिन्दी को आम जनता तक पहुँचाना है । संगोष्ठी का समापन करते हुए डा. सी.एच. चंद्रैया, हैदरावाद से पधारे साहित्यकार ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि देश को हिन्दी के राष्ट्रसंघ की भाषा स्वीकृत कराने में आगे आना चाहिए । संविधान में राजभाषा की जगह राष्ट्रभाषा होना चाहिए । हिन्दी को राष्ट्रसंघ की भाषा बनाने के लिए जोदार प्रयास होना जरूरी है ।
समापन सत्र के अंत में मुख्य अतिथियों प्रतिभागियों, मीडिया एवं सिक्किम, गान्तोक के विशिष्ट अतिथियों को सम्बोधित करते हुए अकादमी अध्यक्ष डा. स्वदेश भारत ने कहा कि भाषा साहित्य के बिना जीवन शून्य तथा जर्जर होता है । शब्दों की महत्ता को समझना ही बुद्धिमत्ता है । भाषा-साहित्य मनुष्य के जीवन को आनन्द से भर देता है । इसलिए भाषा साहित्य के प्रति आस्थावान होना सभी के लिए जरूरी है ।
होटल टाशी डेलेक में आयोजित प्रेस कांप|mेंस में गान्तोक सिक्किम में स्थित राष्ट्रीय मीडिया, दूर्रदर्शन, आकाशवाणी आदि के २५ प्रतिनिधि उपस्थित थे । उक्त अन्तर्रर्ााट्रय र्सार्क भाषा साहित्य सम्मेलन द्वारा गान्तोक में १६ सूत्रीय प्रतिवेदन प्रस्ताव पारित किया गया । जिसमें हिन्दी के र्सवागिण विकास के लिए अनेक उपयोगी प्रस्ताव पेश किए गए । व्
-प्रस्तुतिः स्वदेश भारती, राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी)

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