Tue. Sep 18th, 2018

र्सार्क में चीन की दिलचस्पी

डा. श्वेता दीप्ति:भारत र्सार्क स्थापना करने वाले राष्ट्रों में से एक है तो चीन २००५ से र्सार्क के पर्यवेक्षक की भूमिका निर्वाह कर रहा है । गौरतलब है कि एकबार फिर चीन ने अपनी दिली इच्छा जताई है कि उसे र्सार्क में शामिल कर लिया जाय । क्या चीन की इस इच्छा को सहजता के साथ स्वीकार किया जा सकता है – भारत और चीन दो सशक्त राष्ट्र हैं और वर्तमान में चीन भारत, नेपाल, बंगलादेश, श्री लंका आदि देशों के साथ व्यापारिक और आर्थिक घनिष्ठता बढÞा रहा है । र्सार्क के अधिकांश देश चीन के पक्ष में ही दिख रहे हैं । किन्तु जहाँ तक भारत का सवाल है, वह आँखें मूँदकर चीन और पाकिस्तान पर विश्वास करने की स्थिति में नहीं है । र्सार्क शिखर सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में उपस्थित पर्यवेक्षकों में से एक चीन के उप विदेशमंत्री ने चीन के पिछले सहयोग कार्य का हवाला देते हुए कहा कि चीन र्सार्क का सदस्य न होते हुए भी र्सार्क के सहकार्य में China flagशामिल है और भविष्य में भी और नजदीकी के साथ काम करना चाहता है । नेपाल और पाकिस्तान दोनों ही चीन को र्सार्क में शामिल करना चाहते हैं । १२/१३ नवम्बर २००५ ढाका शिखर सम्मेलन में यह प्रस्ताव नेपाल की तरफ से लाया गया था । उस समय नेपाल में राजतंत्र था और तत्कालीन राजा ज्ञानेन्द्र ने यह प्रस्ताव रखा था । बाद में इस प्रस्ताव के साथ बंगलादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका भी साथ हो लिए । १८वाँ र्सार्क सम्मेलन शुरु होने से पहले ही यह सवाल फिर उठने लगा कि क्या चीन को र्सार्क में शामिल कर लिया जाय – हालाँकि इससे सम्बन्धित कोई निर्ण्र्ााइस सम्मेलन में नहीं लिया गया और यह इतना आसान भी नहीं है । भारत कभी इस बात के लिए सहजता से तैयार नहीं हो सकता । क्योंकि चीन और पाकिस्तान भारत के ऐसे दो पडÞोसी हैं जिनपर विश्वास करना उनके लिए आसान नहीं है । विश्व परिदृश्य में एक उभरती हर्ुइ शक्ति के रूप में भारत को देखा जा रहा है और यह बात चीन और पाकिस्तान  हजम कर ले ऐसी स्थिति भी नहीं दिखती तो, क्या पाकिस्तान चीन को इसलिए र्सार्क में लाना चाहता है कि, भारत अलग थलग पडÞ जाय – र्सार्क देश पूरे विश्व के भूगोल का तीन प्रतिशत है । विश्व आबादी के २१ प्रतिशत लोग यहाँ रहते हैं । र्सार्क देशों के कुल भूक्षेत्र, आबादी और अर्थव्यवस्था का करीब ७० प्रतिशत भारत में है । र्सार्क देशों में भारत ही ऐसा देश है जिसकी सीमा आठ सदस्यीय देशों में सात से जुडÞती हैं । भारत एक लम्बी सीमा चीन से साझा करता है और नेपाल इसके बीच में है । इसलिए भारत और चीन, इन दोनों देशों के बीच नेपाल की भूमिका क्या होनी चाहिए – सम्मेलन शुरु होने से पहले नेपाल के वित्तमंत्री रामशरण महत, विदेशमंत्री महेन्द्र बहादुर पाण्डेय और सूचना मंत्री मिनेन्द्र रिजाल ने यह वक्तव्य दिया कि चीन को र्सार्क का सदस्य बनाया जाय । इस वक्तव्य के पीछे नेपाल की नीति क्या है वो फिलहाल अस्पष्ट है । जहाँ तक चीन का सवाल है तो उसकी वर्चस्व नीति स्पष्ट है । वह अपनी विस्तारवादी नीति के तहत काम करना चाहता है और नेपाल में उसे प्रश्रय भी देना चाहता है । चीन भौगोलिक दृष्टि से पर्ूर्वी एशिया का देश है । उसकी सीमा भूटान, नेपाल, पाकिस्तान और भारत से जुडÞती है । किन्तु यही एक वजह उसे र्सार्क का सदस्य नहीं बना सकती क्योंकि अगर ऐसा है तो रूस भी र्सार्क सदस्य हो सकता है क्योंकि उसकी सीमा भी अफगानिस्तान से जुडÞी हर्ुइ है । यह तो तय है कि भारत र्सार्क में तब तक मजबूत स्थिति में है जबतक चीन उसमें शामिल नहीं है । चीन के शामिल होने से दक्षेस में एक नए ध्रुवीकरण का जन्म हो जाएगा जो भारत को हाशिए पर ला सकता है । इसलिए भारत कभी भी चीन को र्सार्क में शामिल करने पर अपनी सहमति नहीं दे सकता है ।
नेपाल चीन के पक्ष में है क्योंकि चीन का सहयोग उसे मिलता है । आज र्सार्क सम्मेलन जिस सभागार में सम्पन्न हुआ, वह चीन द्वारा निर्मित है । भारत के प्रधानमंत्री का सुरक्षा कवच चीन के सौजन्य से ही सम्भव हुआ । र्सार्क के मद्देनजर सुरक्षा की हर आवश्यक चीजों को चीन ने मुहैया करवाया । चीन ने दस करोडÞ यूआन का सुरक्षा उपकरण नेपाल को उपलब्ध कराया है । बुलेटप्रूफ दस गाडिÞयाँ वहाँ से आई हैं । कहने का तार्त्पर्य यह कि र्सार्क की सुरक्षा का भार चीन ने उठाया क्या अन्य र्सार्क देशों में यह क्षमत्ाा नहीं थी – मोदी ने हेलिकाप्टर उपहार में दिया इससे तो अच्छा होता कि सुरक्षा व्यवस्था पर ही खर्च कर दिया होता ।  भारत से आई गाडÞी पर नवाज को बैठने में एतराज था किन्तु चीन की गाडÞी में बैठने से कोई गुरेज नहीं । ये बातें जाहिर करती हैं कि कौन किसके कितने करीब है । सभी जानते हैं कि पाकिस्तान को आणविक सहायता चीन और अमेरिका से मिली है । यह और बात है कि आज अमेरिका ने अपना दामन छुडÞा लिया है । खैर ये सारी वजहें हो सकती हैं कि नेपाल चीन का साथ दे रहा है । चीन का नेपाल पर प्रभाव का एक और उदाहरण सामने आ रहा है । संचार माध्यम के द्वारा अब यह बात भी सामने आ रही है कि भारतीय प्रधानमंत्री के जनकपुर भ्रमण रद्द होने के पीछे चीन का हस्तक्षेप है और अगर ऐसा है तो सामान्य सी बात है कि भारत कभी भी र्सार्क में चीन की उपस्थिति नहीं चाहेगा । क्योंकि चीन के बढÞते वर्चस्व और विस्तारवादी नीति से भारत भलीभाँति परिचित है और पाकिस्तान से उसकी नजदीकी से भी वह वाकिफ है । किन्तु इन सभी के बीच नेपाल को यह नहीं भूलना चाहिए कि नेपाल के विकास में चीन के सहयोग के साथ-साथ भारत का सहयोग भी अपेक्षित है क्योंकि कई आन्तरिक बातें ऐसी हैं, जो नेपाल को चीन से अधिक भारत के करीब लाती हैं ।
रहा सवाल पाकिस्तान का तो पाक और भारत के रिश्तों की कडÞवाहट तो सम्मेलन के दौरान स्पष्ट रूप से देखने को मिली । पूरे उद्घाटन सत्र में नवाज और नरेन्द्र एकदूसरे से नजरें चुराते रहे । दोनों के चेहरे पर तनाव और दूरी महसूस की जा सकती थी । नवाज के सम्बोधन में कहीं भी आतंकवाद नहीं था वहीं भारत २६/११ की पीडÞा को याद कर रहा था । पाक की धरती आतंकवाद के लिए प्रयोग होती रही है यह कई बार साबित हो चुका है तो क्या उसे आतंकवाद को सम्बोधन नहीं करना चाहिए था, जबकि आज सम्पर्ूण्ा विश्व इससे जूझ रहा है । यह भी एक कटु सच है कि नेपाल की धरती भी गाहे बगाहे इस नापाक काम के लिए प्रयोग होती रही है । इस स्थिति में नेपाल की कूटनीति क्या होनी चाहिए – आतंक की कोई जात नहीं होती और ना ही उसका कोई धर्म होता है ऐसे में हम यह सोच कर निश्चिंत रहें कि हम पर इसका असर नहीं होगा तो यह हमारी खुशफहमी होगी । नेपाल की भौगोलिक बनावट कुछ ऐसी है कि उसे तीन महत्वपर्ूण्ा देशों का चाहे अनचाहे साथ मिल रहा है । भारत नेपाल के प्रति सिर्फरोटी और बेटी के सम्बन्ध के नाते लचीला नहीं है, वह अच्छी तरह जानता है कि नेपाल को खुश रखना उसकी आवश्यकता ही नहीं विवशता है क्योंकि, नेपाल चीन और पाक के बीच कवच का काम करता है । और वहीं पाक और चीन नेपाल को सहायता करके वह जरिया बनाना चाहता है जहाँ से भारत पर हाथ डालना सम्भव हो सके ।
भारत अपने पडÞोसी देशों से रिश्ते सुधारने की पहल कर चुका है ।  भारतीय प्रधानमंत्री स्पष्ट रूप में कह रहे हैं कि भारत तभी खुश रहेगा जब उसका पडÞोसी देश खुश रहेगा । नेपाल की राजनीति और नेपाल के लोगों की सोच में भारत को लेकर काफी हद तक सुधार हुए हैं । सम्मेलन के दौरान मोदी ने दिल्ली और काठमान्डू के बीच सीधी बस सेवा का उपहार दिया है । भारत अच्छी तरह जानता है कि यह बस सेवा सुरक्षा की दृष्टि से चुनौतीपर्ूण्ा है । किन्तु यह एक नए संदेश को भी प्रेषित कर रहा है । इसे एक व्यापक पर्रि्रेक्ष्य में देखने से यह पता चलता है कि र्सार्क देशों और भारतीय उपमहाद्वीप में सामरिक दृष्टिकोण से यह एक महत्वपर्ूण्ार् कदम है । इसका प्रभाव विश्व राजनीति में आँका जाएगा और भारत की रणनीति के रूप में देखा जाएगा । भारत का अपने पडÞोसी देशों से राजनीतिक टकराव है, इसलिए उसे सावधानी से नीति निर्धारण की आवश्यकता है । नेपाल के साथ सम्बन्ध विश्वासी और भरोसेमन्द हो इसके लिए नेपाल के मनोभाव को समझते हुए कदम उठाने की आवश्यकता है । कई अच्छे आसार दोनों देशों के बीच दिख रहे हैं । कई महत्वपर्ूण्ा समझौते हुए हैं, जिनपर आम जनता की उम्मीदें टिकी हर्ुइ हैं । किन्तु इन सब के बीच यह भी गौरतलब है कि नेपाल के निर्माण सेक्टर में चीन का अच्छाखासा निवेश है और प्रस्तावित योजनाएँ भी अधिक हैं । साथ ही नेपाल की जनता का अच्छा र्समर्थन भी उसे प्राप्त है । ऐसे में नेपाल की पूरी कोशिश होगी कि आज न कल चीन को र्सार्क में स्थान मिल जाय और पाक चीन का सदाबहार मित्र है क्योंकि उसकी सामरिक आवश्यकताओं को वही पूरा करता है । ऐसे में उसका भी साथ देना लाजमी ही है । किन्तु र्सार्क का नियम है कि किसी भी प्रस्ताव पर अगर एक देश की भी रजामन्दी नहीं है तो वह प्रस्ताव लागू नहीं हो पाएगा जैसा कि इस सम्मेलन में भी पाक की वजह से कई प्रस्तावों को मंजूरी नहीं मिल पाई, इस हालात में फिलहाल चीन का सपना साकार होने की अवस्था तो नहीं दिख रही है ।

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