र्सार्क सम्मेलन से जुडी उम्मीदें

प्रो. नवीन मिश्रा :आज जिस क्षेत्र को दक्षिण एसिया का नाम दिया गया है, उसकी ऐतिहासिक पहचान हिन्दुस्तान के ही रूप में रही है । भारत, पाकिस्तान और बंग्लादेश तो १९४७ तक, एक अविभाजित राज्य ही थे जिसकी आजादी के लिए एक संयुक्त लडर्Þाई लडी गई थी । श्रीलंका और बर्मा -अब म्यांमार) भी ब्रिटिश साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में भारतीय उपमहाद्वीप के साथ घनिष्ठ रूप से जुडे रहे हैं । न केवल इन दो देशों में बडी संख्या में भारतीय आप्रवासी निवास करते थे, वहाँ के आर्थिक, सांस्कृतिक जीवन में असरदार भूमिका भी निभाते थे । यह भी सच है कि बर्मा हो या श्रीलंका, इनको कोई भी भारतीय ‘विदेश’ नहीं समझता था । शरदचन्द्र चट्टोपाध्याय के बंगाली उपन्यास इसी तथ्य को प्रतिबिंबित करते हैं । तामिलनाडू के लिए श्रीलंका का घटनाक्रम हमेशा अपने घर आँगन की हलचल जैसा ही समझ जाता रहा है । रही बात नेपाल की, सो उसकी स्थिति इन उदाहरणों से बहुत भिन्न नहीं कही जा सकती ।sarc_himalini
अन्तर्रर्ाा्रीय कानून की दृष्टि से नेपाल हमेशा स्वाधीन बना रहा । पर नेपाल नरेश की स्वाधीनता अन्य भारतीय रजवाडों रियासतो की ‘पराधीनता’ से रत्तीभर र्फक नहीं थी । नेपाल के महाराजा को भी अपने दरबार में ब्रिटिश रेजिडेन्ट की नियुक्ति स्वीकार करनी पडÞी थी और ब्रिटिश प्रभुत्व को स्वीकार कर ही यह भूमिवद्ध राज्य अपने अन्तर्रर्ाा्रीय संबंधों का सञ्चालन, ब्रिटिश भारतीय सरकार के निर्देशानुसार करता रहा था । नेपाल और तिब्बत में दिलचस्पी रखने के बावजूद खास्ताहाल चीन यहाँ के घटनाक्रम को प्रभावित करने में अर्समर्थ था और नेपाल पूरी तरह भारत में तख्तनशीन औपनिवेशिक सरकार के अंकुश में था । घरेलू राजनीति में भी नेपाल नरेश स्वतन्त्र नहीं थे । असली शक्ति राणावंश के निरंकुश प्रधानमन्त्रियों के हाथ में थी, जो सेनाध्यक्ष भी होते थे । राणावंश का शादी-व्याह का नाता नेपाली राजवंश से था, अनेक भारतीय रजवाडÞों के साथ भी इसी कारण ब्रिटिश कृपा से सामन्तशाही नेपाल में बरकरार रह सकी थी । इसके साथ ही यह भी जोडÞने की जरूरत है कि भारत-नेपाल सीमा के पश्चिमी छोर को महाकाली अञ्चल में छोटी-बैतडÞी कर्ण्ााली वाला अथवा उत्तर प्रदेश बिहार को सैकडो मील छूता तर्राई वाला भू-भाग आम आदमी के लिए अदृश्य अन्तर्रर्ाा्रीय सीमा कभी भी रोकने टोकने वाली नहीं रही । इस पूरे इलाके में रहने वाले भारतीय और नेपाली खुशी-खुशी अपने को दोनों देशों की संतान समझते रहे हैं और भाषा, धर्म में समानता के कारण उनमें अन्तर करना बडÞा कठिन रहा है । नेपाल एक मात्र ऐसा विदेशी राष्ट्र है, जिसके नागरिक भारतीय सेना में भर्ती किए जाते हैं ।
इस बात का इतने विस्तार से उल्लेख इसलिए जरूरी है कि विभाजन के पहले औपचारिक रूप से भारत का हिस्सा रहने पर भी भारत के साथ नेपाल के घनिष्ठ एवं आत्मीय सम्बन्ध, पाकिस्तान, बंगलादेश या श्रीलंका की तुलना में, कम मजबूत नहीं समझे जाने चाहिए । पूर्वोत्तर में भुटान, ब्रिटिश काल में भारत का रक्षित राज्य था, जो सहर्षवैदेशिक संबंधों में और प्रतिरक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार की सलाह, स्वेच्छा से स्वीकार करता था । बौद्ध धर्म के अनुयायी, बुद्ध की कर्मभूमि भारत को तर्ीथ मानते रहे हैं और भारत को अपना स्वाभाविक संधि मित्र और हितैषी । दक्षिण एशिया के दो अन्य देश, अफगानिस्तान और मालद्वीप हैं । अफगानिस्तान का उदय एक राष्ट्र-राज्य के रूप में अभी हाल में ही हुआ है- २०वी सदी के पर्ूवार्ध में । इसके पहले इस भूमिवद्ध प्रदेश में अनेक परस्पर प्रतिद्वन्द्वी कबीलों का ही बोलवाला था । औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के दौर में रूस और ब्रिटेन, दोनों ने ही, इस बात में भलाई समझी कि अफगानिस्तान को बीच में रखकर आपसी मुठभेड के खतरे को टाला जा सके । अफगानिस्तान की सरहद पश्चिमी पंजाब के उत्तर पश्चिमी सीमांत को छूती थी और बहुसंख्यक अफगान पख्तूनों की जातीय सांस्कृतिक पहचान इस इलाके में रहने वाले हिन्दूस्तानियों से अभिन्न है । रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी काबुली वाला से यह बात झलकती है कि उद्यमी पठान कितनी दूर तक पहुँच जाते थे और हिन्दुस्तानियों के लिए सिर्फपञ्जाब में ही नहीं, दूर दराज इलाके में भी जाने पहचाने भरोसे के मित्र समझे जाते थे । अफगानिस्तान का ऐसा कोई घनिष्ठ नाता अपने दूसरे पडÞोसियों, इरान या सोवियत रुस के मध्य एशियाई गणराज्यों के साथ नहीं रहा । कुल मिलाकर, अफगानिस्तान की पहचान दक्षिण एशियाई ही है, मध्य एशियाई अथवा पश्चिम एशियाई नहीं । मालद्वीप का भी घनिष्ठ रिश्ता सदियों से श्रीलंका और केरल के अलावा किसी अन्य विदेशी से नहीं रहा है । जब हम इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को और पारंपरिक अनुभव को ध्यान में रखते हैं तो यह बात बहुत विचित्र लगती है कि दक्षिण एशिया में सहयोग की अपेक्षा संर्घष्ा के दर्शन ज्यादा होते हैं ।
दक्षेस अर्थात् र्सार्क का प्रस्ताव पहले पहल बंग्लादेश के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जियाऊर रहमान ने रखा । यह बात साफ है कि उनका असली मकसद एशिया के तमाम छोटे पडÞोसियों को एक जूट कर उसको संतुलित रहने का था । किसी रचनात्मक पहल का प्रयत्न इसे समझना नादानी ही होगी । जनरल जिया ने तख्ता पलट के बाद सत्ता ग्रहण की थी और उनके लिए यह जरूरी था कि वे अपने प्रशासन को वैधानिकता का जामा पहनाने के लिए ऐसे कदम उठाएँ, जो उन्हें बांग्ला राष्ट्र के हित का, अपने पर्ूववर्ती नेताओं से बेहतर संरक्षक प्रमाणित कर सके । बांग्लादेश का सोचना यह भी था कि नदी जल विवाद के बारे में नेपाल और बांग्लादेश के हित सोच, भारत के विरुद्ध एक से हैं और इसलिए शायद इन दोनों के बीच सहकार्य सम्भव होगा । अनेक बिद्वानों का यह भी मानना था कि यह पहल अमेरिकी इशारे पर की गई थी ताकि प्रकारांतर से पाकिस्तान और बांग्लादेश के फौजी तानाशाहों को दक्षिण एशिया में मान्यता दिलाई जा सके । बहरहाल, चार पाँच वर्षतक र्सार्क संबंधी गतिविधियाँ अनौपचारिक रूप से ही चलती रही और इसका स्वरूप अमर्ूत बना रहा । जाहिर है कि भारत खुद कोई पहल नहीं कर सकता था, क्योंकि उसका बडÞे पडÞोसी का अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयत्न खारिज किया जा सकता था । दूसरे श्रीलंका और भारत आन्तरिक राजनीति में हिंसक उपद्रवों के दमन में व्यस्त थे । क्षेत्रीय सहयोग संगठन की बात लगभग ठंढेÞ बस्ते में चली गई । र्सार्क की औपचारिक स्थापना सात दिसम्बर १९८५ में ही हर्ुइ । तबतक दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों में थोडÞी बहुत स्थिरता आ चुकी थी । अबतक र्सार्क को लेकर जितना भी राजनयिक संवाद हुआ था और र्सार्वजनिक बहसें चली थी, उससे इस बात पर सहमति बन गई थी कि इस संगठन में उभय पक्षीय विवाद नहीं लाये जायेंगे । पहला शिखर सम्मेलन बंगलोर में सम्पन्न हुआ, जहां यह तय किया गया कि संगठन का मुख्य कार्यालय काठमांडू में होगा, पहला अध्यक्ष बांग्लादेश द्वारा मनोनीत किया जाएगा । यह शिखर सम्मेलन नवंबर, १९८५ में आयोजित किया गया था और इसमें उन क्षेत्रों को भी रेखांकित किया गया, जिसमें सहकार्य जरूरी और सम्भव था । वैसे इन क्षेत्रों की सूची १९८३ में ही सरकारी अफसरों के सचिव स्तर की वार्ता में तय कर ली गई थी । इस सूची में कृषि, स्वास्थ्य सेवाएं, मौसम विज्ञान, डÞाक तार सेवाएँ, दूरसंचार तथा यातायात एवं विज्ञान तथा टेक्नाँलाँजी के अलावा खेलकुद और सांस्कृतिक विषय भी शामिल किए गए थे ।
पहले शिखर सम्मेलन में ही यह बात साफ हो गई कि उभय-पक्षीय विवादों को संगठन के सम्मेलनों से बाहर निपटाना आसान नहीं होगा । राष्ट्रपति जयवर्द्धने ने इस सम्मेलन में आतंकवाद को परिभाषित करने की बात उर्ठाई, उनका प्रयत्न भारत को बचाव की मुद्रा में डÞालने का था । लिट्टे और सिंहल सरकार ने सीधे वार्ता कराने के प्रयत्नों ने बाँकी सभी मुद्दों को पीछे धकेल दिया । आने वाले वर्षों में पाकिस्तान भी बारम्बार काश्मीर विवाद को दक्षेस सम्मेलनों में उठाता रहा, इस कारण क्षेत्रीय सहयोग की अन्य महत्वकांक्षी रचनात्मक परियोजनाएं खर्टाई में पडÞती रही । क्षेत्रीय सहयोग के लिए स्थापित यूरोपीय समुदाय से तुलना करना तो बहुत दूर की बात है । दक्षिण पर्ूव एशिया के क्षेत्रीय सहयोग संगठन, आशियान की तुलना में भी र्सार्क दिशाहीन और गतिशून्य, निर्रथक औपचारिक संगठन नजर आता है । भले ही, र्सार्क के हर सदस्य देश में र्सार्क को प्रोत्साहित करने के लिए विदेश मन्त्रालय में एक विशेष विभाग का गठन किया गया है, इसे दोयम दर्जे का ही समझा जाता है और यहाँ नियुक्त होने वाले अधिकारी इस तैनाती को सजा काटने के समान समझते हैं । र्सार्क खेल हो या फिल्म महोत्सव, इनमें आम आदमी की हिस्सेदारी नगण्य रहती है और इनको लेकर आयोजकों को छोडÞ किसी और में रत्ती भर भी उत्साह नहीं दिखता । फिलहाल नेपाल में होने जा रहे अगले र्सार्क शिखर सम्मेलन की तैयारी जोरों पर है । जमीन से लेकर आसमान तक कोलाहल जारी है । अब देखना यह है कि विगत शिखर सम्मेलनों की तरह आगामी शिखर सम्मेलन भी मात्र रस्मअदायगी तक सीमित रहती है या फिर इससे कोई ठोस निर्ण्र्ाानिकल कर सामने आता है ।

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