लक्ष्मीपूजन -दीपावली और र्सर्य षष्ठी व्रत -छठ

दीपावली
यह पर्व कार्त्तिक की अमावस्या को मनाया जाता है। कुछ रोज पहले से ही लोग अपने घर-द्वार, मकान-दुकान की सफाई में दिलोजान से जुट जाते हैं। आखिर लक्ष्मीजी को खुश करके अपने घर बुलाना जो है। सफाई और सजावट में एक होडÞ सी लगी रहती है। अमावस्या के दिन दीप जलाया जाता है। इसलिए हमारे भोजपुरी क्षेत्र में इसे ‘दिया-दियरी’ भी कहते हैं।
वैसे तो सामान्यतया इस अमावस्या की रात को प्रायः सभी हिन्दू माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं। स्थान भेद से पूजा की विधि में कुछ अन्तर भी मिलता है। दीपावली की पौराणिक पृष्ठभूमि कुछ ऐसी मिलती है। प्राज्योतिष के अधिपति नरकासुर -भौमासुर) ने अपने अत्याचारों से अपनी समस्त निरीह जनता को त्रस्त कर दिया था। लाखों लोग उसके अहंकार की खुराक बने थे। उसकी लिप्सा ने असंख्य बेबसों का धन लूटा था। और उसकी वासना ने सोलह हजार कन्याओं को अन्धकूप में डाल दिया था। चारों ओर घोर अन्धकार था। ऐसे समय में अचानक प्रकाश की एक स्वर्गिक रेखा झिलमिला उठी। भगवान् श्रीकृष्ण ने देश के र्स्वर्ग को नरक बनानेवाले नरकासुर का बध करने का निश्चय कर लिया। वे समर-यात्रा के लिए प्रस्थान कर रहे थे कि सत्यभामा सामने आकर बोलीं- देश के पुरुषों और स्त्रियों दोनों पर संकट आया है। ऐसी स्थिति में नारी का चुप बैठा रहना शोभा नहीं देता। युद्ध में आप पुरुषों का प्रतिनिधित्व करेंगे और मैं नारी का। मैं युद्ध में जाऊँगी। यह कहकर सत्यभामा कृष्ण के रथ में बैठ गईं। दोनों के सम्मिलित युद्ध से कार्तिक अमावस्या के दिन नरकासुर का संहार हुआ। अमा का अन्धकार जैसे फट गया। उसी की याद में हम दीपों की पंक्ति साजाते हैं। इस प्रकार दीपावली हमारा सांस्कृतिक विजयोत्सव भी है। इस रोज देश के पुरुष-नारी ने हमारे सांस्कृतिक संकट को अपने सम्मिलित उद्योग से टाला था। और हमारा मार्ग प्रशस्त किया था।
परन्तु यह त्यौहार आनन्द और उत्तरदायित्व दोनों का संदेश देता है। हम प्रमादवश आनन्द की लौ को देख लेते हैं, किन्तु उत्तरदायित्व के स्वर को सुन नहीं पाते। यह हमारे जातीय जीवन की असंगति है। यह असंगति उस दिन भी खडÞी हर्ुइ थी, जब नरकासुर ने जन-जन की लक्ष्मी को स्वायत्त कर लिया था। दर्ुगापूजा के अवसर पर बल्रि्रथा, लक्ष्मीपूजा में द्यूत-क्रीडÞा, इन प्रचलनों से हम खुद अपनी ही नजरों में गिरते जा रहे है। क्या इस तरफ गम्भीरतापर्ूवक सोचने का समय अभी भी नहीं आया –
दीपावली के दो दिन पहले धनतेरस का दीप -यम का दीया) जलाया जाता है। कार्त्तिक कृष्ण त्रयोदशी को ‘धन-तेरस’ के नाम से पुकारते हैं। यह ‘धन त्रयोदशी’ का अपभ्रंश है। इसे छोटी दीवाली भी कहते हैं। इस दिन रात में खाने-पीने के बाद घर की स्त्रियाँ यमराज को दीप देती हैं। लोक का विश्वास है कि यमराज को दीप देने से साल भर अनिष्ट नहीं होता, यमराज प्रसन्न रहते हैं। इसी रात के ब्राम्ह मुहर्ूत में दर्रि्रता को भगाया जाता है।
दीप-दान से अकाल मृत्यु टरे न टरे, पर संकट में भी अपने कर्तव्यों को न भूलना और विकट निराशा में भी आशा का दीप जलाना कितना बडÞा बल है, कितना बडÞा आश्वासन है ! जीवन का जूआ ढोना यों ही कठिन है, फिर दुःख-दुःख चिल्लाने से दुःखर्-दर्द की दुनियाँ में क्षण भर के लिए भी टिका रहना असम्भव हो जाएगा। जब भाग्य की रेखा को हम मिटा नहीं सकते, तब भाग्य पर रोना निर्रथक है। रोना निर्रथक ही नहीं, हानिकारक भी है, क्योंकि दुःख की भावना दुःख को बढÞा देती है। उपचार तो यही है कि हम काटों पर मुस्कुराना सीखें, साधना में आनन्द ढूंढें। माता लक्ष्मी ‘करुणामधुरा’ हैं-
अशेषभुवना मोदमादधानां शुचिस्मिताम्।
करुणामधुराकारां लक्ष्मी देवीमुपास्महे।
-उस देवी की उपासना करता हूँ, जो अखिल विश्व को आनन्द प्रदान करनेवाली पवित्र मुस्कानवाली और करुणा की मधुर आकृतिवाली हैं।)
हम लक्ष्मी की सुन्दर आकृति और मुस्कान पर जाते हैं, पर उस पवित्र करुणा को पढÞना भूल जाते हैं, जो उनकी मुस्कान को स्निग्धता तथा उनकी आकृति को रुचि देती है।
स्मरणीय है, आग-र्सर्ूय और चन्द्रमा के प्रकाश से दीप की ज्योति को श्रेष्ठ कहा गया है-
अग्निज्योतिः रविज्योतिचन्द्रज्योतिस्तथैवच।
उत्तमर्ःर्सवज्योतीनां दीपो˜यं प्रतिगृह्यताम्।।
क्यों – इसीलिए न कि दीपक की ज्योति पर स्नेह की करुणा की नमी है। तर्सथ हम दीपावली को करुणा से देखें, महज विनोद से नहीं। तमसो मा ज्योतिर्गमय।
र्सर्य षष्ठी व्रत-छठ
हिन्दू समुदायों में कार्तिक शुक्ल षष्ठी को छठी माता का व्रत और पूजन होता है। वास्तव में यह र्सर्ूय का ही व्रत है। इसे र्सर्ूय षष्ठी व्रत भी कहते हैं। भविष्य पुराण में लिखा है कि धौम्य ऋषि ने द्रौपदी को बतलाया था कि सुकन्या ने पहले इस व्रत को किया था। द्रौपदी ने भी इस व्रत को किया, जिसके फलस्वरुप उन्होंने वनवास की अवधि में हजारों ऋषियों का स्वागत कर पति धर्मराज की मर्यादा रखती हर्ुइ शत्रुओं को समूल नष्ट करके विजय प्राप्त की। कहीं षष्ठी व्रत केवल स्त्रियाँ करती है, कहीं पर स्त्री पुरुष दोनों करते हैं।
जिस किसी स्त्री के पुत्रादि होते हैं, चाहे वह महादर्रि्र ही क्यों न हो, एक-एक पैसा बचाकर भी षष्ठी माता की पूजा करती है। क्योंकि वह अपनी सन्तान को प्रसन्न देखना चाहती है, उसकी खुशी के लिए सब कुछ बलिदान करने के लिए तैयार रहती है। प्रचलन अनुसार स्त्रियाँ पूजा करने के लिए किसी जलाशय के किनारे जाती हैं। पति-पत्नी पीले वस्त्र पहनकर र्सर्ूय भगवान् को अर्ध्य प्रदान करते हैं। पहले दिन अस्ताचलगामी र्सर्ूय को और दूसरे रोज प्रातःकाल में उदीयमान र्सर्ूय को अर्घ्य अर्पण किया जाता है। यह व्रत बहुत कठिन होता है। इस व्रत में शुद्धता को विशेष महत्त्व दिया जाता है।
लोक विश्वास अनुसार षष्ठी माता -छठी मैया) सभी व्रती चाहे वह स्त्री हो वा पुरुष की मनचाही इच्छा पर्ूण्ा करती हैं। किसी को सुन्दर शरीर, किसी को धन, किसी की और इच्छा पर्ूण्ा कर सब को खुश और तृप्त कर देती है, छठी माई।
मत्स्यपुराण में कहा गया है- ‘आरोग्यं भास्करादिच्छेत्।’ अर्थात् आरोग्य चाहिए तो भगवान् भुवनभास्कर र्सर्ूयदेव की पूजा अर्चना करो। वास्तव में षष्ठी व्रत भगवान् र्सर्ूय का व्रत है। उस दिन छठी माता को चढाने के लिए जो पकवान बनाए जाते हैं, उन पर भी र्सर्ूय भगवान का चित्र बनाया जाता है। भारत के मगध, बिहार, मिथिला आदि क्षेत्रों के अतिरिक्त राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र में भी र्सर्ूय की पूजा माघ सप्तमी, रथसप्तमी, अचला सप्तमी, पुत्र सप्तमी आदि नामों से की जाती है। नेपाल में भी इस व्रत का प्रचलन दिनानुदिन बढÞ रहा है। अब तो गाँव-गाँव, नगर-नगर में षष्ठी पूजा के लिए अनेकों समितियाँ बनती हैं। घाट की सर-सफाई, सजावट, विद्युतीकरण एवं अन्य व्यवस्था के लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर अनेक कमिटियों का निर्माण होता है। लाखों रुपये खर्च किए जाते है। लगता है, दिखावे के लिए हम फिर अपनी सीमा को पार कर रहे हैं। दिखावे से बचें और शुद्ध पवित्र भावना से भगवान् भुवनभाष्कर की पूजा करें। यही हमारे हित में होगा।
यहां एक शंका-समाधान करना जरुरी लगता है। मूलतः छठ तो भगवान र्सर्ूय की उपासना है। षष्ठी तिथि स्वयं में स्त्रीलिंग होने से छठी माई हो जाना स्वाभाविक लगता है। प्रचण्ड र्सर्य की अपेक्षा माता षष्ठी को मनाना आसान लगता है। एक पौराणिक आख्यान के अनुसार भगवान् नारायण ने नारद जी को कहा था- मूल प्रकृति के छठे अंश से जिस देवी का प्राकाट्य हुआ  था, वही षष्ठी देवी कहलाती हैं। बालकों की ये अधिष्ठात्री देवी हैं। इन्हें विष्णुमाया और बालदा -पुत्रदा) भी कहा जाता है। मातृकाओं में ये देवसेना नाम से प्रसिद्ध हैं। उत्तम व्रत का पालन करनेवाली इन साध्वी देवी को स्वामी कार्तिकेय की पत्नी होने का सौभाग्य प्राप्त है। बालकों की दर्ीघायु तथा उन का भरण पोषण रक्षण करना यिन का स्वाभाविक गुण है। यह पौराणिक आख्यान भी लोक में बहुत प्रचलित है।
गोस्वामी तुलसी दास जी कहते है, हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहिं सुनहिं बहुविधि सब सन्ता। भगवान् किस प्रयोजन के लिए कब, कहाँ, किस रूप में अवतरित हो कर क्या-क्या करते हैं- वह सब समझना हम लोग जैसे मन्दमतियों के लिए कदापि सम्भव नहीं है। तर्सथ षष्ठी पूजा को हम भगवान् र्सर्ूय की आराधना मानें अथवा षष्ठी देवी मानकर व्रतपूजा करें, कोई खास र्फक नहीं पडÞता। श्रद्धा-विश्वास ही फलदायी होते हैं। अस्तु।

-मुकुन्द आचार्य

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