लक्ष्यविहीन मधेशवादी राजनीति

-कुमार सच्चिदानन्द सिंह

लगभग सात महीने की प्रसव वेदना के बाद आखिरकार नेपाल को बहुमत की सरकार मिली । श्री झलनाथ खनाल राष्ट्र के ३५वें प्रधानमंत्री नियुक्त हुए । इस तरह उन्होंने इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया । वैसे भी किसी राष्ट्र का कार्यकारी प्रमुख बन जाना अति महत्वपर् बात तो होती ही है लेकिन विगत एक साल में सारे राजनैतिक समीकरणों को अपने पक्ष में मोडने के लिए जो कठिन अभ्यास उन्होंने किया, उसके मध्येनजर उनकी यह उपलब्धि उनके लिए तो महत्वपर् है ही, राष्ट्र के लिए यह कितनी विधायी होगी इसका मूल्यांकन समय सापेक्ष है । लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि जितनी कठिनाइयाँ झेलकर उन्होंने प्रधानमंत्री पद को प्राप्त किया, शायद उससे अधिक कठिन आगे की डगर है । यही कारण है कि शपथ ग्रहण की शुभ सन्ध्या में ही सबसे बडे र्समर्थक द्वारा र्समर्थन वापसी की धमकी उन्हें मिलने लगी और एक सप्ताह के बाद भी  विकसित मंत्रीमण्डल का गठन नहीं हो पाया । यह विश्वास तो किया ही जा सकता है कि जिस तरह सात महीने के बाद प्रधानमंत्री का चयन हुआ, उसी तरह आठ या अठ्ठारह दिन बाद मंत्री परिषद का गठन भी हो तो जाएगा । आम लोग इस सरकार से भी बुहत गतिशील परिवर्तन की आशा तो नहीं कर रहे हैं । चलने के लिए यह सरकार भी चलेगी ही चाहे जितना दिन भी चले । लेकिन इस संपर्ूण्ा प्रक्रिया में जो नया राजनैतिक ध्रुवीकरण हुआ हे, उसका प्रभाव दर्घकालीन रूप में देश पर पडेÞगा और मधेश की राजनीति तो इस ध्रुवीकरण के कारण झंझावात से गुजर ही रही है, दर्ीघकालीन रूप में भी मधेश उससे अछूता नहीं रहेगा ।
एक बात तो निश्चित है कि जिस तरह माओवादियों की सरकार के गिरने के बाद निवर्तमान प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल गैरमाओवादी राजनैतिक शक्तियों का मोहरा बने थे उसी तरह मौजूदा प्रधानमंत्री उस समय की पराजित शक्तियों की राजनैतिक विसात हैं । एक ओर उनकी महत्वाकांक्षा को पूरा करना उनकी मजबुरी है, दूसरी ओर पार्टर्ीीे भीतर भी भयानक अन्तरसंर्घष्ा से उन्हें गुजरना ही होगा । जिस तरह श्री नेपाल को पदमुक्त कराने में उनकी भूमिका महत्वपर्ूण्ा रही, पार्टर्ीीे भीतर भी उसी तरह की भूमिका का प्रतिरोध करते हुए उन्हें आगे बढÞना होगा । क्योंकि शूल बिछाने वालों के लिए फूल बिछाने का काम अवसर की राजनीति में नहीं होती, इन सारी बातों के बावजूद एक महत्वपर्ूण्ा यह है कि जिस राजनैतिक गणित के आधार पर यह सरकार बनी है, उसके अनुसार बाम और लोकतांत्रिक शक्तियाँ दो अलग-अलग धाराओं में विभाजित नजर आती है । उससे पर्ूव की सरकार वाम और लोकतांत्रिक गठबन्धन की सरकार थी । यह सरकार वाम और अतिवाम गठबंधन की सरकार है । यद्यपि लोकतंत्र के पृष्ठ-पोषक इस गठबंधन के भीतर भी मौजूद है लेकिन लोकतांत्रिक शक्तियाँ एक तरह से हाशिये पर नजर आती है । आज मधेशी राजनीति में जो उथल-पुथल देखी जा रही है उसके मूल में सत्ता और अवसर की साधना के साथ-साथ सैद्धान्तिक और वैचारिक ऊहापोह भी है ।
यह सच है कि मधेश आन्दोलन के बाद मधेश की महत्वाकांक्षाएँ बढÞी है लेकिन मधेश के मुद्दो के आधार पर राजनीति कर रहे किसी भी दल के नेतृत्व ने जनता की कसौटी पर खडÞा उतरने का प्रयास नहीं किया । संविधान सभा के बाद देश में सरकारे बदली, समीकरण बदले और प्रत्येक समीकरण में मधेश के हितचिंतक दल सत्ता के विपक्ष में बैठे नजर आए । मधेशी दलों के इस विखराव से यह स्पष्ट लक्षित किया जा सकता है कि मुद्दे उनके लिए साधन मात्र हैं । इन मुद्दों को उन्होंने अपनी स्वार्थ साधना के लिए उपयोग किया  है । यही कारण है कि आज हर मधेशी दल या तो विभाजन की त्रासदी झेल रहा है या विभाजन की आशंका से विचलित है । इसका मूल कारण मुद्दों की जमीन छोडÞना है ।
आज मधेश ने प्रधानमंत्री के पद की उम्मीदवारी दी । देना भी चाहिए क्योंकि देश की आधी आबादी मधेशी है और वह अगर सत्ता के शर्ीष्ा पर पहुँचना चाहता है तो यह गुनाह नहीं है लेकिन ६०१ सदस्यों वाली संविधान सभा में महज एक दो दर्जन सभासदों का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति यदि मधेशी के नाम पर मैदान में उतर जाता है तो उसे किस मानसिक अवस्था का व्यक्ति कहा जा सकता है उसका अन्दाजा पाठक स्वयं लगा सकते है । विडम्बना यह है कि मधेशी के नाम पर राष्ट्र की चौथी राजनीतिक शक्ति होने के नाते अपनी दावेदारी तो प्रस्तुत करते हैं लेकिन सारे मधेशी दलों को भी एक सूत्र में बाँधने में अर्समर्थ रहते हैं । श्री विजय कुमार गच्छेदार को इस निर्वाचन में सहयोग देने वाले सारे दलों ने मौजूदा सरकार में नजाने का निर्ण्र्ाालिया । वस्तुतः इस रणनीति को किसी रणनीति का नतीजा नहीं माना जा सकता क्योंकि इस असहयोग से मधेश के मुद्दे का कोई सीधा सरोकार नहीं । यह तो नैतिक दवाब की वजह से लिया गया निर्ण्र्ााहै । जिसके अर्न्तर्गत इन लोगों ने भी खनाल के विपक्ष में मतदान किया था, इसलिए जब वे विजयी हुए तो उनकी सरकार में तत्काल जाना थोडÞी विचित्र सी बात होती । मधेश की सम्पर्ूण्ा राजनीतिक दृष्टि इसे एक आशावादी कदम माना जाना चाहिए क्योंकि नैतिकता की लेश तो नजर आयी लेकिन अब तक की मधेशी राजनीति की जो चारित्रिक विशेषता रही है उसके मद्देनजर इस बन्धन के जीवन पर तो प्रश्चचिन्ह उठाया ही जा सकता है ।
विगत प्रधानमंत्री के चुनाव में दूसरा पक्ष भी उभरकर सामने आया कि कुछ मधेशी दल ऐसे भी हैं कि प्रधानमंत्री निर्वाचन में तो वे अनुपस्थित रहे । उनकी यह अनुपस्थिति सामान्य तौर पर यह संदेश देती है कि प्रधानमंत्री के तीनों ही प्रत्याशी से वे असंतुष्ट हैं और कुछ खास उनका लक्ष्य है । लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में श्री खनाल की विजय उनकी तथाकथित राष्ट्रीय सहमति के नाम पर विपक्षियों को समेटने का जो आधारहीन अडान हुआ, उसके बाद उनमें सरकार में जाने की कवायद और छटपटाहट प्रारम्भ हर्ुइ । यह पार्टर्ीीा आन्तरिक अन्तर्विरोध और मंत्री पद की आशा न करने वाले सभासदों की सुबुद्धि का परिणाम है कि अब तक की स्थिति में श्री खनाल की रीढÞविहीन सरकार में वे अपनी सहभागिता नहीं दे सके । दूसरा इस बात को भी रेखांकित किया जा सकता है कि जो नेतृत्व अपने दल और र्समर्थक दलों में संतुलन बैठाने में अर्समर्थ हैं, उस सरकार में शामिल होकर जाति गंवाने का अर्थ भी क्या है ।
आज मधेशी राजनीति की सबसे बडÞी बिडम्बना यह घटित हर्ुइ है कि सद्भावना पार्टर्ीीो छोडÞ आज मधेश को नेतृत्व दे रहे जितने भी दल हैं, वे विभिन्न विचारों के प्रतिनिधित्व करने वाले कुनबे की तरह है और जब-जब उनमें पुरानी विचारधारा और सोच हिलोरे मारती है । राष्ट्र की राजनीति तो स्पष्टतः दो धाराओं- वाम और लोकतांत्रिक खेमा में विभिाजित है । माना जा सकता हैं कि इन्हीं पृष्ठभूमियों में मधेशी राजनीति में अधिकांश नेताओं का आगमन हुआ है और जब कभी अपनी पुरानी सोच के समीप जाने पर लाभ की संभावना उन्हें दिखलाई देती है तो वे अपने वर्तमान घर में भी आग लगाने के लिए तैयार हो जाते हैं । आज मधेशी राजनीति के मूल में जो विचलन देखा जा रहा है, उसका एक कारण यह भी है ।
लेकिन मधेशी राजनीति में आज जो बिखराव देखा जा रहा है, उसका सबसे बडÞा कारण सत्ता के र्इद-गिर्द इसका केन्द्र माना जा सकता है । आज सद्भावना पार्टर्ीीे जो अनेक चेहरे देखे जा रहे हैं, उसका मूल कारण सत्ता फैक्टर ही है । मधेशी राजनीति का सबसे प्रबल दल मधेशी जनाधिकार फोरम के जितने भी विभाजन और उपविभाजन हुए उसके मूल में भी सत्ता केन्द्रित राजनीति को ही ठहराया जा सकता है । मधेशी समझा जाने वाला तमलोपा भी अन्ततः विभाजित हर्ुइ, उसके मूल में भी सत्ता केन्द्रित राजनीति ही है । इससे बडÞी बिडम्बना और क्या हो सकती है कि इतने विभाजनों के बावजूद विभाजन के मूल कारण को हम समझ नहीं पा रहे या समझकर भी अनजान बनने की कोशिश कर रहे हैं ।
आज मधेश में राजनैतिक दलों के क्रियाकलापों से निराशा की स्थिति है क्योंकि आज फिर से मधेश विरोधी सोच, चिन्तन और शक्तियाँ सिर उठाने लगी है । एक बात तो नेतृत्व वर्ग को स्वीकार करना ही चाहिए कि जब मधेश आन्दोलन प्रस्फुटित हुआ और गति पकडÞा, उस समय सम्यक नेतृत्व उसे नहीं मिल पाया था । स्वतः स्फर्ूत रूप में लोग सडÞकों पर आए विरोध पर््रदर्शन किया और अपनी शहादत भी दी । आज मधेश ने अपना भाग्य सँवारने के लिए अनेक नेताओं को अवसर दिया लेकिन उन्होंने अन्ततः उनकी इच्छाओं और आकांक्षाओं पर कुठाराघात किया है । मधेश आन्दोलन में लोगों का सैलाब अनामंत्रित और बिना प्रयास उभडÞता था लेकिन इतना तो दावा के साथ कहा जा सकता है कि आज कोई भी नेता ऐसा नहीं जो बिना प्रयास किए इस हजार की भीडÞ जमा करा ले । इससे बडÞी निराशा और क्या हो सकती है और इसका जिम्मेवार हमारा नेतृत्व वर्ग है । इस दृष्टि से एक तरह से सभी जनता के कठघरे में हैं । वस्तुतः अब तक मधेशी नेतृत्व ने जो छवि प्रस्तुत की है, उसके अनुरूप उनकी छवि तो कालिदास की तरह है जो जिस पेडÞ पर बैठा है, उसी को काटता है ।
मुद्दो की राजनीति और सत्ता की राजनीति- ये दोनों राजनीति की दो पृथक-पृथक धाराएँ है । ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मधेश की राजनीति कर रहे दल या उनके नेतृत्व ने मुद्दों को छोडÞ दिया । वस्तुतः मुद्दे हैं, इसलिए उनका अस्तित्व भी है और समय असमय मुद्दों की बात कर धीरे-धीरे अपने-अपने घटते प्राणतत्व को ऊर्जा प्रदान करते हैं, जो यह सिद्ध करती है कि उनमें जिजीविषा अभी शेष है । वस्तुतः वे अधिक व्यवहारवादी हैं । इसलिए मुद्दे के सोने में सत्ता की चाँदी मिलाकर उसका मूल्य जाने-अनजाने कम कर देते हैं और मजबूती का दंभ भरते हैं । अब तक यह तर्क दिया जाता रहा है कि सत्ता में पहुँचकर मधेश के प्रति होने वाली नीतिगत असमानता, अन्याय, विभेद आदि को रोका जा सकता है । लेकिन अब तक की सरकार साधना में इन दलों ने कितना खोया और कितना पाया, यह आत्मचिंतन की बात है । यद्यपि तर्क-कर्ुतर्क का हथियार उनके पास है । जिसके बदौलत वे जनता को गुमराह कर सकते हैं और करते हैं । लेकिन भ्रम का यह परदा बहुत अधिक टिकाऊ नहीं होता । वे माने न माने आम लोक के सामने से यह भ्रम का परदा हटने लगा है और उनकी सिद्धान्तविहीन महत्वाकांक्षाओं की नग्नता उभरकर सामने आने लगी है ।
आज मधेशी नेतृत्व वर्ग से एक आवाज और आ रही है कि विगत संविधान सभा के निर्वाचन के बाद परिवर्तन की दो शक्तियाँ उनकी है- माओवादी और मधेशी । इसलिए परिवर्तन की आकांक्षा रखने वाले इन दो शक्तियों को मिलकर सरकार बनानी चाहिए । अगर इस तर्क को मान भी लिया जाए तो सवाल उत्पन्न होता है कि इस निर्वाचन के बाद जब माओवादियों के नेतृत्व में सरकार बनी तो सारे मधेशी दल उसमें सहभागी क्यों नहीं हुए । आज जब इतना समय गुजर गया तो फिर उस समीकरण में संभावना तलाशने का औचित्य क्या है । मधेशवादी दलों का एक बडÞा समूह क्यों प्रधानमंत्री के विगत चुनाव में माओवादी समर्थित उम्मीदवार का क्यों विरोध किया । क्यों माओवादियों ने मधेशवादी दलों को समेटकर बहुमत का अभ्यास नहीं किया और उन्हें तरजीह नहीं दी । ऐसे अनेक सवाल हैं जिसके आधार पर मधेशी नेतृत्व अपनी सही जमीन की तलाश और पहचान कर सकते हैं ।
एक बात तो हमें स्वीकार करना ही चाहिए कि मधेश की राजनीति में जो बिखराव देखा जा रहा है, उसके मूल में सत्ता फैक्टर ही है । संविधान सभा के निर्वाचन के बाद हर पार्टर्ीीकसी न किसी रूप में सरकार के र्समर्थन और विरोध में रही है लेकिन उनके टूटने बिखरने का क्रम भी लगातार जारी रहा है । दूसरा यथार्थ यह है कि देश की तीन बडÞी शक्तियाँ जिनके साथ मधेशी दल वैचारिक संर्घष्ा की स्थिति में है, लाख सिर फूटौवल के बाद भी संगठित है । प्रत्येक पार्टर्ीीें दो-तीन धाराएँ स्पपष्ट दिखलाई देती है फिर भी वे एक है और मधेशी दल इतने अधिक बिखडेÞ है कि उनकी पहचान भी मुश्किल होने लगी है । आज हमें स्वीकार करना चाहिए कि मुद्दे हमें एक सूत्र में बाँध सकते हैं और सत्ता हम में बिखराव पैदा करती है । इसलिए सत्ता के समीकरण से कुछ दिनों तक तौबा करने का मनोविज्ञान हो मधेशी दलों को विकसित करना ही चाहिए ।
अब तक की देश की जो राजनैतिक परिस्थिति है, उससे जाहिर है कि निर्धारित समय तक देश को संविधान मिलने वाला नहीं है और अगर मिलेगा भी तो संक्षिप्त संविधान ही जिसमें संघीयता जैसे जटिल मुद्दों को तत्काल जहाँ का तहाँ छोडÞ दिया जाएगा । यह भी निश्चित है कि आगामी संविधान में संघीयता के व्यावहारिक पक्ष को नहीं अपनाया गया तो मधेश का इतना बडÞा आन्दोलन और इतनी शहादतें औचित्यहीन हो जाएंगी और तब जो निराशा की धूँध मधेश पर मंडराएगी उसमें सारे मधेशवादी दल और उसका नेतृत्व अपनी पहचान खोए नजर आएंगे और मधेश की समस्याओं के समाधान की आशा कम से कम इस पीढÞी के नेताओं के हाथ से निकल जाएगा ।
आज संविधान सभा में मधेश का प्रतिनिधित्व करने वाले जितने भी दल हैं उन्होंने आम लोगों में अपना विश्वास गुमाया है । यह सच है कि उन पंक्तियों के लिखे जाने तक कोई भी मधेशवादी दल सरकार में शामिल नहीं है । लेकिन उनके इस तिरस्कार को मूँह र्छर्ुइ भक्ति ही मानी जा सकती हैं क्योंकि कब वे उस ओर चल पडेÞंगे कहना मुश्किल है । आज समय का तकाजा है कि मुद्दों के आधार पर मधेशी जनता की संवेदना के आधार पर एक सूत्र में आबद्ध हो और संविधान सभा के बाहर भी जो दल, व्यक्ति या नेता मधेश मुक्ति की बात कर रहे उन्हें समेटकर कम से कम संविधान के निर्माण और घोषणा तक सत्ता का तिरस्कार करें और एकजूट होकर संविधान निर्माण और कार्यान्वयन के लिए निर्ण्ाायक भूमिका खेलने वाले दलों पर दबाव बनाएँ । अन्यथा संविधान सभा में प्रतिनिधित्व करने वाले दल और नेता तो अपना विश्वास गुमाते ही जा रहे हैं, निराश जनता विकास तिवारी -नेसपा) जैसे पहचान के लिए संर्घष्ा कर रहे नेता की बातों से सहमत नजर आती है कि सत्ता से निवृति की सिजिनल वैष्णवों की साधना से राम का मिलना असंभव है । अगर हम मधेश के हित में नव संविधान चाहते हैं तो हमें इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रतिबद्ध होकर बढÞना पडÞेगा ।

loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz