लगता नहीं है दिल मेरा…: प्रकाशप्रसाद उपाध्याय

prakash upadhya

प्रकाशप्रसाद उपाध्याय

पिछले कई महीनाेंं से पर्यटन स्तम्भ के लिए चलायमान मेरी लेखनी कुछ दिनों से उस विषय पर कुछ लिखने के लिए अग्रसर नहीं हो रही है और इस सोच मेंं डूबा हूँ कि क्या लिखूँ ? उसके कारणों में प्रमुख रहे –विगत बैशाख १२ और १३ गते (२५ और २६ अप्रील) और २९ गते के दिन आए दिल दहलाने वाले भूकंप के विनाशकारी झटकों से देश के विभिन्न भागों में जानमाल और राष्ट्रीय संपदाओं को पहुँची अपार क्षति और उससे व्याप्त दुःख और अवसाद के भाव । एक ओर विध्वंस के हृदय विदारक दृश्य और दूसरी ओर त्रास और भय का वातावरण ।
दिल इस त्रासमय वातावरण से अभी भी मुक्त नही हो रहा है पर कल्पनाशील मस्तिष्क के एक कोने से भारत के अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर का वह कालजयी गीत, ‘लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में………..’ की गूँज सुनाई पड़ने लगती है । विपदा की इस घड़ी में जब दिल और दिमाग दोनों भय, त्रास, खिन्नता और अवसाद से भरे हों तो कभी ईश्वर याद आते हैं, कभी प्रार्थना के शब्द होठों पर उभरते हैं तो कभी ऐसे गीतोंं की गूँज कानों में आने लगती हैं, जो हमें दर्द से राहत देते हैं, भले ही ऐसे गीतों में गम और उदासी के भाव ही भरे हुए क्यों न हो ।
जब मैं सार्क सम्मेलन के दिनों में सजाए और सँवारे हुए राजधानी काठमांडू की सड़कों की अगल–बगल के दीवारोंं को भूकंप से क्षतिग्रस्त होकर भग्नावशेष के रूप में बिखरा हुआ पाता हूँ या राजधानी के सुंदर ऐतिहासिक एवं पर्यटकीय महत्व के बसंतपुर दरबार क्षेत्र के इमारतों या महल को क्षतिग्रस्त देखता हूँ या सुनधारा अवस्थित ऐतिहासिक धरहरा को भग्नावशेष के रूप में पाता हूँ या टेलिविजन के पर्दे पर पाटन दरबार या भक्तपुर दरबार चौक के भग्नावशेष और देशव्यापी विनाश लीला के चित्रों को देखता हूँ तो मेरे व्यथित हृदय में इस गीत के शब्द उभरने लगते हैं – ‘लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में………..।’
बहादुर शाह जफर ने जब इस गीत की रचना की थी तब उनके सामने भूकंप की विनाश लीला के समान हृदयविदारक चित्र निश्चित ही नही था, लेकिन अवसाद की घड़ी जरूर उत्पन्न हुई थी, जब उन्हें तख्तोताज से हटाकर लाल किले से निकाला गया था और उनका शायर हृदय भावुकता से भर कर अपने ‘उजड़े हुए दयार’ को याद करते हुए इसे लिखने को मजबूर हुआ होगा, जो आज भी हजारों लोगों के दिलोदिमाग में छाया हुआ है । किसी हिंदी फिल्म निर्माता के फिल्म के लिए तो यह गीत छायांकन का विषय के लायक ही बन उठा ।
भूकंप से क्षतिग्रस्त इस वातावरण में जहाँ लाखों लोग हताहत हुए हैं, घरवार विहीन होकर ‘उजडेÞ हुए दयार’ में शोक और अभाव का जीवन बिता रहे हैं, उनके प्रति दया, सहानुभूति और सहायता के भाव के साथ हमें जीवन बितानी पड़ रही है । एक ओर घर से बाहर निकलने की आवश्यकता हमें घर के अंदर चैन से रहने नही देती तो बाहर निकलने पर निरंतर बना रहने वाला यह भय कि कौन सी दीवार या क्षतिग्रस्त घर का कौन सा हिस्सा या टुकड़ा रुक–रुककर आने वाली भूकंप के झटकाें से चरमराकर सिर और शरीर को अपने सिकंजे में न जकड़ ले, हमें त्रासमय जीवन बिताने को मजबूर करता है । काम के सिलसिले में घर से निकलने वालों को यह डर, तो घरवार विहीन लोगों को अपने सिर के ऊपर के सायों और प्रियजनों से बिछुड़ने का अपार शोक और दुःख, तंबू के नीचे रहते हुए दिन में तपती धूप का सामना और बारिश या संक्रामक रोगों की चपेट में आने का खतरा । इस प्रकार पीडि़त वर्ग एक ओर खाई तो दूसरी ओर कुएँ के त्रास के वातावरण में दिन गुजार रहे हैं । भय और त्रास के माहौल ने सभी वर्गो के जीवन को अपने पंजे में जकड़ रखा है ।
सामान्य दिनों में देश की राजधानी के अंदर के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और पर्यटकीय महत्व के स्थलों के अलावा देश के विभिन्न जिलों के परिभ्रमण के सिलसिले में अवलोकन किए गए महत्वपूर्ण इमारतों, ऐतिहासिक महत्व के शाही महलों (राजदरबारों) और विश्व संपदा की सूची मे समाहित मंदिरों और काष्ठमंडप एवं धरहरा जैसे ऐतिहासिक धरोहरों के उपर प्रकृति के द््वारा मचाई गई हुड़दंग से उन्हें पहुँची क्षति को याद करने पर अवसाद से भरा दिल प्रश्न कर बैठता है – राजधानी के अतिरिक्त देश के विभिन्न जिलोंं को सुंदरता से भरने, पर्यटकों को आकर्षित करने और स्थानीय लोगों को रोजगार का अवसर देने वाले स्मारकों और राष्ट्र की संपदाओं को अपने पुराने हालात में लौटने में कितना समय मिलेगा या इनकी भी नियति संविधान निर्माण के समान होकर रहेगी ?
पाटन का दरबार चौक हो या भक्तपुर या बसंतपुर क्षेत्र का दरबार चौक या काष्ठमंडप यह सभी ऐतिहासिक महत्व प्राप्त इमारतेंं हैं । जब तक इन सभी इमारतों का पुनर्निर्माण पुराने स्वरूप में पूरा नही होता यह बहादुर शाह जफर के उजडेÞ दयार की स्मृति स्थानीय जनता को कराते रहेंगे ।
प्रकृति ने नेपाल को विश्व के एक रमणीय देश के रूप में बनाने और सजाने में जो उदारता दिखाई थी, उसमें उसी के इस त्रूmर प्रकोप ने ऐसा दाग क्यों लगा दिया जिसे साफ होने में कई वर्ष लग सकते हैं । विपदा की इन घडि़यों में आरजू और इंतजार में बैठे देशवासियों को अब किसी ऐसी चमत्कार की भी आशा करनी पड़ रही है जो उनके इस घाव को जल्द से जल्द भर सके, वर्तमान को सँवार सके और भविष्य को सुरक्षित बना सके ।
प्रकृति ने लोगों के ऊपर कहर ढाने में तो कोई कसर नहीं छोड़ी, देवस्थलों को भी नहीं बख्शा । वह स्थल जो हजारों–लाखों लोगों को दुःख तकलीफ के दिनों में प्रार्थना करने का केंद्र होते थे, शांति और शीतलता प्राप्त करने की भूमि होती थी, अपनी आस्था को व्यक्त करने का देवालय होता था, प्रकृति के इस आक्रोष (प्रकोप) के सामने असहाय हो क्षत–विक्षत होने पर मजबूर हो गई है । पूजास्थल ही नही विद्या के मंदिर की नियति भी समान रही ।
दुःख और अवसाद भरे इस वातावरण में उस वक्त एक सकारात्मक चित्र भी देखने को मिली जब काँप रहे घरों से प्राणों की रक्षा के लिए भागते हुए लोग एक खुले मैदान पर एकत्र हो गए और किसी ने यह सोचने की जरूरत नही समझी कि इस खुले मैदान में एकत्र होने, एक साथ रात बिताने और मिलकर खाने वाले लोगों में कौन सा हिस्सा दलित का, कौन हिस्सा खस जाति का या कौन हिस्सा मधेशी मूल का है । सभी इस भावना को त्यागकर एक दूसरे के दुःख में अपना दुःख महसूस करते हुए एक ही त्रिपाल के अंदर समाविष्ट रहे और विपदा की इस घड़ी मेंं चीनी के साथ पानी के समान घुलकर मधुर वातावरण मे बने रहे । जात–जातियों की सांप्रदायिक भावना और पहाड़ और तराई की भौगोलिक दूरी को मिटाते हुए प्रकृति ने भूकंप के रूप में एक ऐसी इन्द्रधनुषी छटा बिखेर दी जिसमें विभिन्न रंग एकाकार हो गए । सात रंगों के एक साथ प्रकट होने का सुख कहर के इस क्षण ने अनुभव करा दिया । आज जबकि विभिन्न राजनीतिक दल विभिन्न सूबों के लिए दलगत हठ अपनाए हुए हैं प्रकृति ने देश के राजनीतिज्ञों को  इस इन्द्रधनुषी संदेश से अवगत कराने के लिए तो इस कहर का सहारा नहीं लिया ? मन में यह प्रश्न भी उठता है । इसके साथ याद आती है एनेकपा माओवादी के अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल प्रचण्ड की यह उक्ति कि इस भूचाल के कारण हमारे दिलोंदिमाग से लड़ने की भावना उड़ गई है, अब हम संविधान निर्माण के कार्य में जुट जाएँगे । संकट की इस घड़ी में देशवासी यह आशा करते हैं कि उनकी यह बातें उनकी आंतरिक हृदय से ही निकली होंगी ।
देश में विभिन्न जात–जातियों के लिए अलग–अलग प्रदेशों की माग उठाकर उन्हें विभाजित करने की कोशिश करने वाली राजनीतिक पार्टियाँ ही है, अन्यथा अतीत में भी जनता एक दूसरे के साथ कंधे में कंधे मिलाकर चल रही थी, दुःखसुख के सहभागी बने रहते थे और आज भी रहने को तैयार है । आशा की जाती है कि राजनीतिक पार्टियाँ नए वर्ष के पहले महीने की इस त्रासदीपूर्ण घटना से उत्पन्न इस सद्भावनापूर्ण वातावरण में पुनर्निर्माण की बातें करते हुए इस सकारात्मक संदेश को आत्मसात करेंगे और जनता को एकतावद्ध रखते हुए उनकी खुशहाली के लिए काम करने की दिशा में अग्रसर होंंगे ।
मुझे दुःख की इस घड़ी में यह लिखते और सप्तरी जिले के मेरे उन मुस्लिम और मधेशी मूल के मित्रों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए अपार हर्ष भी हो रहा हैं जिन्होंने मुझे विपदा की इस घड़ी में काठमांडू छोड़कर सपरिवार उधर आने और उनके साथ दिन बिताने का आग्रह कर भावविभोर बनाया । उनके इस निमंत्रण से मुझे  मधेशी मूल के लोगों में पहाड़ी लोगों के प्रति अभी भी सदभाव विद्यमान होने, सुरक्षा की कामना करने और संकट के दिनों में सहारा बनने की चाह बरकरार रहने का आभास मिलता है । समान रूप से, राजधानी में रहने वाले मेरे मधेशी मूल के मित्रों ने भूकंपन और पराकंपन की स्थिति में कुशलक्षेम पूछकर जो सद्भावना व्यक्त की वह तारीफ के लायक तो है ही, सामाजिक प्रेम और आपसी स्नेह के मजबूत वातावरण को भी ईंगित करता है । अतः देश के विभिन्न राजनीतिक सिद्धांतों को अंगीकार कर चलने वाले नेतागण, जो अपने को जनता के सेवक कहलाने में गर्व करते हैं, संकट के इस क्षण में उत्पन्न सांप्रदायिक एकता के इस संदेश को आत्मसात करें तो जनता के ऊपर असीम कृपा तो होगी ही, देश में सामाजिक सद्भाव को भी बढ़ावा मिलेगा । साथ ही राष्ट्र निर्माण में बंधुत्व और मिलकर आगे बढ़ने की भावना को भी सहयोग पहुँचेगा ।
मुझे याद है, मेरे चार दशकों के प्रवास काल में भारत में तीन बार राष्ट्रीय संकट की स्थिति उत्पन्न हुई । पहली बार सन् १९६२ में, जब भारत के ऊपर चीन का आक्रमण हुआ था, दूसरी बार सन् १९६५ में, जब भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई हुई थी और तीसरी बार सन् १९७२ में बांगला देश युद्ध के दिनों में । राजनीतिक सिद्धांतों पर विभाजित वहाँ के विभिन्न दल राष्ट्रीय संकट के इन तीनों अवसरों पर जिस प्रकार एकजुट हुए और राहत के कार्य में एक साथ अग्रसर हुए, उसे देखकर आक्रमणकारियों के पसीने छूटने लगे और भारत की राष्ट्रीय एकता पर कोई आँच नहीं आई । आज हमारे देश के सामने राष्ट्र निर्माण का भीमकाय कार्य विद्यमान है । इस अवसर पर यदि सभी पार्टियाँ संकुचित विचारों को त्यागते हुए देश निर्माण के कार्य में एकजुट हो सकें और उजड़े हुए दयार को पुनर्निर्माण से सँवार सकें तो  निश्चित रूप से नेपाली जनता का भाग्योदय होगा, सामाजिक सद्भाव की सुवासित हवा देश में प्रवाहित होने लगेगी और राजनीतिक दलों के प्रति जनता में विश्वसनीयता का भी संचार होगा । लेकिन आवश्यकता है उजड़े हुए दयार को सँवारने के लिए दृढसंकल्प करने और निर्मल मन के साथ मिलकर हाथ बढ़ाने की ।

loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz