लम्बा आन्दोलन और असफल रास्ते

राज्य स्वयं जनता की आवाज चुप कराने के लिए तस्करी कराने लगी । कुछ लोगो को गोलियाँ दागकर मार भी दिया जाए ताकि लोग आन्दोलन में नहीं आएँ । लेकिन इससे आन्दोलन कमजोरी नही और सशक्त बन गया ।
फिलहाल सरकारी कार्यालय, यातायात खुल चुका है । जनता अब भी असमन्जस में है आखिर मोर्चा सहित के नेता करना क्या चाह रही है ?
प्रधानमन्त्री के मन्त्रीमण्डलगण सफेद झूठ में एमाले, एमाओवादी, राप्रपा नेपाल, फोरम लोकतान्त्रिक के नेता तथा कार्यकर्ता ने तत्काल तो यह कह दिया कि ‘हम भूखा रह सकते है किन्तु मधेशी नेता और भारत के आगे कदापि नहीं झुकेंगें ।

कैलास दास :धैर्य में मधेश आन्दोलन ने इतिहास कायम कर दिया है । साढेÞ पाँच महीनों से ज्यादा दिनो से भन्सार, सरकारी कार्यालय, न्यायालय, बजार तथा यातायात पर आन्दोलनकारियों ने अपना हुकुमत जमा रखा था । किन्तु लम्बा आन्दोलन के वावजूद भी अब आन्दोलन असफल रास्ते पर जा रहा है । फिर भी मधेश नेतृत्वकर्ताओं को सफलता की चिन्ता कम और हमारी जगह दूसरा न ले ले इसकी चिन्ता ज्यादा है । आज मधेश आन्दोलन

मधेश में रहने वाला ऐसा एक भी समुदाय नहीं होगा जो सरकार के विरोध में सड़क पर नहीं आई हो । ‘मधेशी एकता जिन्दावाद ! मधेश आन्दोलन जारी है । मधेशी की माँग पूरी कर ।’ ऐसी लहर चली कि हरेक बच्चा—बच्चा के लिए भी लब्ज बन गया । ऐसी स्थिति में राज्य को सहज होना चाहिए था किन्तु वह नही होकर गोलियाँ, लाठियाँ और अश्रु गैस को खजाना ही खोल दिया । मधेश के जिला में इस प्रकार द्वन्द शुरु हो गया कि आन्दोलनकारी अधिकार माँग रहे थे और राज्य के निर्देशन में पुलिस प्रशासन किसी बोर्डर पर युद्ध लड़ रहे है जैसा वर्ताव करने लगा ।
अभी तक सफलता नही पाया है या दिनप्रतिदिन कमजोर होता जा रहा है इसका मुख्य कारण भी मधेशी नेता में त्याग और इमान्दारी की कमी है ।
मधेश आन्दोलन की अगुवाई भले ही संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा के नेता तथा कार्यकर्ता ने किया होगा परन्तु इसकी सफलता और सरकार को दिखाने के लिए कि यह आन्दोलन केवल राजनीतिक दलों का नही सभी मधेशी जनता का है । सड़क पर घर—घर से जनता उतर चुकी थी । ऐसा एक भी दिन नहीं होगा जिस दिन मधेश के सैकड़ों समुदाय ने बैनर सहित सड़क नहीं भरा होगा । परन्तु आन्दोलन लम्बा होने के साथ ही नेतृत्वकर्ता में दायित्व और इमान्दारी की कमी होती गई और जनता साथ छोड़ने लगी । जबकि मधेश आन्दोलन से नेपाल के कोना—कोना में त्राहिमाम मच चुकी थी । सरकार की खिल्लियाँ उड़ने लगी थी । राजधानी की जनता खाद्यान्न सामग्री से लेकर पेट्रोलियम पदार्थ के लिए सड़क पर हपm्ताें लामबद्ध दिखने लगी थी । उस समय राज्य ने एक ही नीति अपनाई, वह थी आन्दोलनकारी के ऊपर दमन । राज्य स्वयं जनता की आवाज चुप कराने के लिए तस्करी कराने लगी । कुछ लोगो को गोलियाँ दागकर मार भी दिया जाए ताकि लोग आन्दोलन में नहीं आएँ । लेकिन इससे आन्दोलन कमजोरी नही और सशक्त बन गया । तब सरकार भारत पर नाकाबन्दी का दोषारोपण करने लगी ।
इधर आन्दोलन उत्कर्ष पर पहुँचने लगा तो मोर्चा को भी अहं हो गया । एक ओर राज्य तस्करी करबाने लगी थी तो दूसरी ओर मोर्चा द्वारा दिन में आन्दोलन और रात में तस्करी के साथ मिलकर पैसा असुली करना दिनचर्या बना लिया । आन्दोलनकारियों ने नाका पर पैसा असुली और शहर के कुछ क्षेत्र में मात्र नारा जुलुस और तोड़फोड़ करने लगे । राजमार्ग बन्द कराने में पूर्णतः असफल होने लगे । मोर्चा के शीर्ष नेता के बीच मत भिन्नता ही नहीं एक दूसरे का अस्तित्व स्वीकार करना भी नही चाह रहे हैं । मधेश केन्द्रित सभी दलों ने अपने—अपने तरीके से बाहुबली जमाने में लग गये । अनावश्यक रूप में विद्यालय बन्द कराकर विद्यार्थियों को आन्दोलन में उतार दिया । मधेश का एक मुद्दा और एक प्रश्न के बावजूद भी अलग—अलग आन्दोलन के कार्यक्रम की घोषणा करने लगे, एक दल दूसरे दल के बीच असहयोग की भावना आ गई । एक तरफ राज्य पक्ष द्वारा हत्या हिंसा और दूसरी ओर बारबार सरकार—मोर्चा के बीच वार्ता निष्कर्षविहीन होती गई । सर्वसाधारण को राज्य द्वारा हत्या के वावजूद भी राजनीतिक दल खास गम्भीरता नही दिखा पायी । कहीं पर आन्दोलनकारी ने तोड़फोड़ एवं पूर्ण बन्द किया और कहीं पर खुलेआम तस्करी और प्रभावविहीन बन्द रखा । उदण्डता के कारण ही आन्दोलन समर्थन का हाथ पीछे हटता गया । आन्दोलन लम्बा होने के बावजूद भी राजधानी का वातावरण सहज और तराई का वातावरण सबसे ज्यादा प्रभावित होने लगा । अर्थात आन्दोलन का प्रभाव उल्टा ही पड़ा । जहाँ का दानापानी बन्द करने के उद्देशय से नाका अवरुद्ध किया गया वहाँ का वातावरण सहज और तराई का वातावरण असहज बनता गया । इसकी चिन्ता मधेशी दलों को होनी चाहिए लेकिन वह अब भी बेफिक्र है ।
फिलहाल सरकारी कार्यालय, यातायात खुल चुका है । जनता अब भी असमन्जस में है आखिर मोर्चा सहित के नेता करना क्या चाह रही है ? देश का कमर ही नही मधेशी जनता की भी कमर टूट चूकी है ? सरकारी कार्यालय खुलते ही व्यापारी चिन्तित बने हंै, कहाँ से बैंक का ब्याज और टैक्स चुकाएँगे ? सरकार समय पर समय दे रही है कि अगर इस दरमियान ऋण चुक्ता नहीं किया तो दुगुना तिगुना जुरवाना देना पड़ेगा । इधर मोर्चा के नेता तथा कार्यकर्ता स्वार्थपूर्ण आन्दोलन की दुकान चलाने में लगी है । सर्वसाधारण जनता बन्द हड़ताल की पीड़ा में तो है ही उसमे भी दल में इमान्दारी की कमी देखने लगी और धीरे धीरे अपने व्यवसाय में लग गए । आन्दोलन लम्बा होने के बाद भी अभी तक सफलता न पाना मधेश केन्द्रित दल इसका प्रमुख दोषी है । मधेश का व्यापार व्यवसाय शून्य हो चुका है । सरकार टैक्स तो क्या जुरवाना सहित असूल करने में लगी है । क्या इससे आन्दोलन सफल हो पायेगा सभी के सामने यह सवाल है । अगर आन्दोलन को सफलता नहीं मिली तो हम कितने पीछे होंगें किसी ने चर्चा का विषय नही बनाया है । यहाँ का कलकारखाना, व्यापार व्यवासय का क्या होगा ? आठ वर्ष से मधेश आन्दोलित है, लेकिन सफलता शून्य है । अगर इस बार भी सफलता नहीं मिली तो किसी में आन्दोलन करने की हिम्मत नही होगी । सफलता के लिए समय अभी भी है, आवश्यकता है तो इमानदारी पूर्वक आगे बढ़ने की । इसके लिए सभी मधेश नेतृत्वकर्ता दल को एक जगह होकर राजनीति करना पडेÞगा ।
मधेश में तीसरा आन्दोलन २०७२ श्रावण ३० गते मधेश का जिला बन्द कराया गया क्योंकि संविधान का प्रथम मसौदा के उपर विचार के लिए तत्कालीन सभासदों को मधेश के जिला में राय संकलन के वास्ते भेजा गया था । इधर मधेश नेतृत्वकर्ता का मानना था कि मधेशी जनता को अन्तरिम संविधान में दिए गए अधिकार से भी वञ्चित रखा गया है फिर इसमे विचार की कोई जरुरत ही नही है, जो बात भी सत्य थी । लेकिन सरकार ने उसपर मनन नहीं कर दमन की नीति अपनायी और दर्जनों आन्दोलनकारी को लाठी प्रहार कर घायल कर दिया । पहली बात कि संविधान का स्वरुप ही विवदित था और दूसरी कि इसे कार्यान्वयन के लिए तावरतोड़ सरकारी दमन बढ़ता गया । तभी से एक ओर सरकार की शक्ति और दूसरी ओर सशक्त आन्दोलन उच्चाई पकड़ने लगी ।
मधेश में रहने वाला ऐसा एक भी समुदाय नहीं होगा जो सरकार के विरोध में सड़क पर नहीं आई हो । ‘मधेशी एकता जिन्दावाद ! मधेश आन्दोलन जारी है । मधेशी की माँग पूरी कर ।’ ऐसी लहर चली कि हरेक बच्चा—बच्चा के लिए भी लब्ज बन गया । ऐसी स्थिति में राज्य को सहज होना चाहिए था किन्तु वह नही होकर गोलियाँ, लाठियाँ और अश्रु गैस को खजाना ही खोल दिया । मधेश के जिला में इस प्रकार द्वन्द शुरु हो गया कि आन्दोलनकारी अधिकार माँग रहे थे और राज्य के निर्देशन में पुलिस प्रशासन किसी बोर्डर पर युद्ध लड़ रहे है जैसा वर्ताव करने लगा । यह तो हुआ आन्दोलनकारी और प्रशासन की बात । दूसरी बात कि राज्य का प्रमुख निकाय प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली जिन्हे समाधान का रास्ता चलना चाहिए था वह भी प्रधानमन्त्री की मर्यादा को भूलकर ‘वाकयुद्ध’ में लगकर समुदायिक राजनीति में सीमित हो गए ।
करीबन दो महीनों से ज्यादा मधेश में आन्दोलन चला जिसमें तीन दर्जन से ज्यादा आन्दोलनकारी की मौत हो गयी । तत्पश्चात् भी सरकार गम्भीरता की जगह उदण्डता का रास्ता अपनाती रही । इधर संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा ने सोचा कि कार्यकर्ता के बलिदानी के वाद भी सरकार गम्भीर नहीं है तो उन्होंने आन्दोलन को और कड़ा रूप देने के लिए नाका अवरुद्ध करने की घोषणा की और नाका पर जाकर बैठ गए । नाका अवरुद्ध के कारण मुल्क में पेट्रोलियम पदार्थ, एलपी ग्यास, दाल चावल ही नही जीवन रक्षक औषधि का भी हाहाकर मच गया । फिर भी सरकार को इसकी चिन्ता नहीं रही । उन्होंने आन्दोलनकारी उपर एक से एक दमन किया । कुछ सीमित समुदाय को खुश रखने के लिए पड़ोसी मुल्क भारत के उपर दोषारोपण करने लगा । आन्तरिक समस्या का समाधान नहीं खोजकर चीन, पाकिस्तान, वर्मा, श्रीलंका सहित के राष्ट्र प्रमुख के साथ पेट्रोल, डीजल, गैस और औषधि सहित किस प्रकार सहज बनाया जा सकता है आहार गुहार की । सबसे पहले तो प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली ने जनता में सफेद झूठ बोलकर भ्रम में रखा । लेकिन जहाँ पर राज्य सक्षम बनने का उम्मीद ही नही है वहाँ का भ्रम कितने दिनो तक टिक सकता है ।
प्रधानमन्त्री के मन्त्रीमण्डलगण सफेद झूठ में एमाले, एमाओवादी, राप्रपा नेपाल, फोरम लोकतान्त्रिक के नेता तथा कार्यकर्ता ने तत्काल तो यह कह दिया कि ‘हम भूखा रह सकते है किन्तु मधेशी नेता और भारत के आगे कदापि नहीं झुकेंगें ।’ सरकार की यह भी नीति सफल नही हुई । देश भर की जनता पेट्रोल, गैस और डीजल के लिए सरकार पर दवाब सृजना किया तो उन्होंने मधेश नेतृत्वकर्ता दल के साथ वार्ता के लिए आव्हान किया । जब–जब वार्ता का वातावरण सहज और निष्कर्ष पर जाने की उम्मीद जनता ने देखा तो राज्य ने फिर से साजिश के अन्तरगत आन्दोलनकारी पर बन्दूक की गोली दागने लगी । वीरगञ्ज, सप्तरी का भारदह और विराटनगर का रंगेली इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है । जबकि प्रशासन और आन्दोलनकारी की ओर से ६० लोगों की मौत हो चुकी है । इससे पहले २०६३÷०६४ का मधेश आन्दोलन में ५२ लोगो की मौत हुई थी ।

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