लाल-आतंक का आतंक

रुचि सिंह:काबिलेगौर है कि इससे बडी बिडंबना और क्या हो सकती है कि नक्लवादी कांग्रेस और भाजपा को अपना विरोधी बता रहे है। ये दोनों दल आपस मे गुत्नमगुत्था हो रहे है। छत्तीसगढÞ में कांग्रेसी नेताओं के काफिले पर हुए हमले में राज्य सरकार की चूक के साथ साथ केन्द्र सरकार की चूक भी नजर आ रही है। बर्बरता से खेले गए खूनी होली की आग अभी भी धधक रही है। इन माओवादियों के सामने शासन लाचार सा ध्वस्त हो कर मूक पर भारी ही नहीं पडÞ रही है बल्कि गले की फाँस बन चुकी है। माओवादी वर्ग अन्याय के विरुद्ध ह,ै यह भूमिहिनों, कृषकों, मजदूरो के पक्षधर भी है। इनका शोषण महाजन, जमीन्दार नौकरशाही करती है। आदिवासियों के जैसे स्थानीय अधिकारों से बेदखली सामने आती जा रही है।

lal aatanka

लाल-आतंक का आतंक

वैसे-वैसे ही माओवादी की हिंसा करने की प्रवृत्ति बढÞती जा रही है। २००२ में नक्सलवादी हिंसा १४६५ घटनाएँ हर्ुइ, वही २००३ में, १५९७ और २००४ में १८०० हो गया है। २००९-२०१० में हिंसा में पाँच प्रतिशत की वृद्धि हर्ुइ है।
इंस्टीचयूट आँफ डिफेंस रिर्सच एण्ड एनालिसिस की रिपोर्ट यह भी बताती है कि नक्लसी हिंसा में मामूली कमी आई है लेकिन ऐसा नहीं हो सका है। फिलहाल देश के लगभग ५६ नक्सली गुट मौजुद हैं, जिन में ५०,००० से ज्यादा माओवादी सक्रिय हैं। २२,००० से अधिक आधुनिक हथियारों से लैस है। देश के वनों का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा इनके कब्जे में है। गरीबी रेखा से नीचे नक्सवादी, उद्योगपतियों, व्यापारियों, सरकारी अफसरों तक से वसूली करके सालाना ५ करोडÞ तक बनाते हैं। जिनसे हथियार, विस्फोटक सामग्री खरीद कर हिंसा की वारदात को अंजाम दे रहे है।
२८ मई २०१३ को गृहमन्त्रालय से जुडÞी संसद की स्थायी समिति ने भी साफ-साफ कहा है कि वामपंथी उग्रवाद भारत की आतंकी सुरक्षा के लिए सबसे बडÞा खतरा है। बेशक नक्सलियों ने छत्तीसगढÞ के दरमा घाटी में २७ कांग्रेसियों की नरसंहार की जिम्मेदारी क्यों न ली हो लेकिन सुरक्षा चूक की वजह ही इस खूनी खेल का हिस्सा बना। यह लोकतान्त्रिक राजनीति पर किया गया ऐसा आघात है, जो इतिहास के पन्ने में नक्सलियों के खूनी मानसिकता को दर्शाते हुए दर्ज हो गया है। इस हमले ने यह तो दर्शा दिया कि उग्रवादी संगठन व राजनीतिक दल विशेष के नेतृत्व का सफाया करने का दुस्साहस कदम उठा कर यह जता दिया कि नक्सलियों के कदम आंतकवाद से कम नहीं। उनका हर हमला यही साबित करता है कि दिन व दिन नक्सली हिंसक हो रहे है। माओवादी तत्व भारतीय संविधान, कानून पर यकीन करते ही नहीं है। दरमा में हुआ खूनी हमला अपने खिलाफ संगठित अभियान ‘सलवा जुडम’ छेडÞने वाले कांग्रेसी नेता महेन्द्रकर्मा की हत्या ही नहीं कि अपितु बातचीत के जरिए समस्या का समाधान खोजने वाले कांग्रेस नेता नंदनकुमार पटेल को उनके बेटे समेत हत्या कर डाली।
सवाल यह पैदा होता है कि आखिर बार-बार माओवादियों पर भरोसा कर उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने की योजना हर बार विफल क्यों हो जा रहे है। काबिले गौर है कि माओवादियों को ऐसे हथियार कौन मुहइया करा रहा है, जिनका इस्तेमाल १८ वीं सदी में यानि २०० साल पहले १९५७ के स्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेजों ने भरमार बन्दूक का इस्तेमाल किया था। आज नक्सली इसी भरमार बन्दूक का प्रयोग कर महेन्द्रकर्मा, नंदनकुमार पटेल की हत्या की है। भरमार बन्दूक में बारुद और र्छर्रर्ेेा प्रयोग कर सामने वालो को बचने का मौका ही नहीं मिल पाता है। माओवादियों ने रेड बेल्ट इलाके के जनजातीय वन क्षेत्रों में सरकार केन्द्र के साथ मिलकर न तो नक्सलवाद पर अपना नियन्त्रण कर पा रही है, ना ही उनके इलाकों में विकास को ही बैठा पा रही है। रेडर्-अर्लट में कई ऐसे मुकाम है, जहां कानून-व्यवस्था पूरी तरह से माओवादियों के रहमों करम पर चल रहे है।
चिन्ता तो इस बात की है कि माओवादियों की सत्ता के आगे पुलिस के साथ-साथ केन्द्र की खुफिया एजेंसिया भी नाकाम है। छत्तीसगढÞ की घटना ने यही साबित किया है कि नक्सलियों को परखने में हमेशा से ही भूल होती रही है। कमोवेश पूरा नक्सलवाद से ग्रस्त हो चुका है। विगत ३० साल से माओवादी समस्या छत्तीसगढÞ खनिज संपदा से ओत-प्रोत से धनी इस प्रवेश की हालत को बद से बदतर करने में अपनी अहम् भूमिका निभा रहे है। दाँतेवडÞा, काकेर बस्तर, कवर्धा, बलरामपुर, नारगुजा जिलों में माओवादी ने अपनी जडÞो को मजबूती से गाडÞ रखा है।
दरअसल १९६७ में पश्चिम बंगाल के नक्सलवाद से पैदा हर्ुइ वामपंथी उग्रवाद की पिथबेल के जडÞो ने देश के १०६ जिलों को अपने लपेट में ले लिया है। देश के भीतर २२ हजार से ज्यादा सशस्त्र कैडर काम कर रहे है।
छत्तीसगढÞ में कांग्रेस के सुपाडेÞ को साफ करने का प्रयोजन ठीक वैसा ही है, जैसे लिट्टे ने १९९१ में पर्ूव प्रधानमन्त्री राजीवगांधी की हत्या को अंजाम देकर लोकतन्त्र को आहत किया था। नक्सलियों के लिए यह पहली घटना नहीं है, जिसे उन्होंने अंजाम देने की कोशिश की है। गौरतलब है कि अप्रील २०१० में इन्हीं माओवादियों ने घात लगाकर छत्तीसगढÞ में ही केन्द्रीय रिर्जव पुलिस बल के ७५ से ज्यादा जवानों की हत्या कर अपनी बर्बरता को साबित कर दिया था। राजनीतिक नेतृत्व के हलको में उसी वक्त यह मान लिया जाता कि यह हमला लोकतन्त्र पर हमला है, साथ ही कडÞे कदम उठा लिए होते तो २५ मई की घटना शायद न होती। इस में कोई दो राय नहीं कि नक्सलियों ने उन्ही राजनेताओं को अपना निशाना बनाया, जो उनके खिलाफ खडेÞ थे।
सरकार पहले भी नहीं चेती थी, ना ही अब चेतेगी। माओवादी ने विभिन्न संगठनों को एक जूट कर लिया था, तभी राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार को र्सतर्क हो जाना चाहिए था। दरअसल सरकार ने तब भी कारगर कदम नहीं उठाये थे, जब नक्सलियों ने केन्दीय रिर्जब पुलिस बल के ७५ से ज्यादा जवान मारे गए थे। अब दरअसल मामला राजनेताओं से जुडÞ गया है तो सरकार थोडÞी देर के लिए नींद से जाग उठी है।
प्रधानमन्त्री मनमोन सिंह कई बार यह राग अलाप चुके है कि ‘नक्सलवाद’ आतंरिक-सुरक्षा का सबसे बडÞा खतरा है लेकिन अभी तक प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह लगान लगाने में क्यों नहीं सफल हो पाए – ‘आँपरेशन-ग्रीन हंट’ को राज्यों का ही अभियान कह के उस वक्त के गृहमन्त्री पी चिदंबरम् ने अपना पल्ला झाडÞ लिया था। फिलहाल ‘आँफरेशन- ग्रीनहंट’ दम तोडÞ चुका है। क्या राजनेताओं को अब भी एहसास होगा कि माओवादियों को समझा-बुझा कर मुख्यधारा में लाने की कवायद करना खुद से धोखा करना है। हालांकि हमारे नीति-नियंता हर बार की कोई ना कोई वीभत्स घटना को लेकर यह आभास कराते हैं कि अब वह चेत गए हैं। होता वही है, जो नहीं होना चाहिए यानि केवल कुछ कठोर प्रतिक्रिया तक ही सीमित रखते है। सवालों के घेरे में उंगलियां सुरक्षा चूक पर उठेगी, उठना भी चाहिए। कांग्रेस की परिर्वतन रैली के काफिले को जगदलपुर सरीखे माओवादियों के गढÞ से गुजरना था, तो क्यों नहीं सडÞको की जाँच हर्ुइ, बारुदी सुरंगे, अवरोध, गुरिल्ला हमलों की आशंका को रमन सिंह की सुरक्षा व्यवस्था ने क्यों नजरअंदाज कर डाला। बिना जाँच हुए गुजरने की इजाजत दे डाली। ताज्जुब है कि कांग्रेस पार्टर्ीीी इस बात को नहीं समझ पायी की नक्सलियों का मुख्य लक्ष्य महेन्द्रकर्मा थे, उनसे बदला लेने के लिए र्सार्वजनिक ऐलान किया था। यह सुरक्षा चूक के पहलू को दर्शाता है। बेशक छत्तीसगढ में नक्सली हमले की जाँच राष्ट्रीय ऐजेंसी को सौंप दी गई है लेकिन क्या होगा – राज्य और केन्द्र के बीच आरोपों-प्रत्यारोपों का एक दौर शान्तिपर्ूवक गुजर जाएगा। माओवादियों से निपटने की मौजूदा स्थिति को नए सिरे से विचार करना ही होगा। केवल मुख्यमन्त्रियों के दौरा करने से नहीं होगा कि नक्सलवाद की चर्चा की और फिर वही हुआ, जो नहीं होना चाहिए।
नक्सलवाद को जडÞ से उखाडÞ फेकने की नीति का ‘ब्लू-प्रिंट’ अभी तक नहीं बना हुआ है। सवाल यह पैदा होता है कि विगत ३० सालों से नक्सलियों को केवल मुख्यधारा में लाने की कवायद से अभी तक क्या हासिल हुआ है – क्या सरकार केवल इंतजार-इंतजार सब्र-सब्र का राग अलापती ही रहेगी – केन्द्र सरकार भी यह बता पाने की स्थिति में नहीं है कि माओवादियों को आधुनिक हथियारों के अलावा स्वतन्त्रता संग्राम में उपयोग में लाई गई बन्दूकें उन्हें कौन मुहैया करा रहा है। क्या खुफियातन्त्रत्र भी नक्सलियों के आगे फेल है – सुलह और समझौते के आसार दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे है। मुख्यमन्त्रियों के लापरवाही का नतीजा ही सामने आ रहा है कि ‘कुछ अपने ही लोग हैं, जो भटक गए है, समझा-बुझा कर ले आएंगे’ आखिर हुआ क्या – आज देश के सात सौ जिले में से दो सौ जिलों मे नक्सली फैल चुके है। बहरहाल यदि नक्सलवाद फलता-फुलता गया है तो उसके लिए राज्य सरकारों के साथ साथ केन्द्र सरकार भी हिस्सेदार है। उनका शोषण करने के लिए जिम्मेदारी वहन करना ही होगा। फिलहाल अब वह वक्त आ गया है कि राष्ट्रहित के लिए कडÞे से कडेÞ कदम उठा कर नक्सलवाद के नाक में नकेल कसनी ही होगी। साथ ही आदिवासियों समाज के दबे लोगों के लिए इमानदारी के साथ इनके विकास के कार्यों को तब्बजो देना ही होगा, केवल आकडÞो की पर्ूर्ति से काम नहीं चलेगा। सरकार को इस ओर र्सतर्कता के साथ ध्यान देना ही होगा। वर्ना कत्लेआम हो रहे है, आगे भी कत्लेआम होते रहेगे। कांग्रेस और भाजपा को भी सोचना होगा कि नासूर बन चुके नक्सलवाद से कैसे निपटा जाए। दोनों दलों की तकरार का फायदा नक्सलवादी ही उठायेंगे। अतः इन मुद्दों से ऊपर उठ कर सोचना होगा। त्र

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