लाशों की ढेर को सीढी मत बनाइए ! मौत से अब मधेशी डरता नहीं : श्वेता दीप्ति

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बूट और लाठी से निहत्थी जनता को घेर कर ऐसे मार रहे थे मानो वो इंसान नहीं भेड़ बकरी हो । उफ ! इतनी विभत्स मौत, कि स्वयं मौत की भी रुह काँप जाए किन्तु नहीं काँपती तो सत्ता और सत्तासीन की आत्मा । सरकार सीडीओ, प्रहरी सशस्त्र को निलम्बित नहीं करती बल्कि उनकी सुरक्षा के लिए उनका तबादला करती है ।
श्वेता दीप्ति, काठमांडू, ८ मार्च | हर बात की कोई सीमा होती है, शायद धैर्य की भी किन्तु हमारे मधेशी नेताओं में इसकी सीमा अनन्त है । सही मायने में ये बुद्ध की संतान हैं । इतना धैर्य तारीफे काबिल है, जहाँ इनका खून नहीं उबलता, जहाँ इन्हें अपनी जनता के मरने का गम नहीं होता । हाँ ये दो काम जरुर करते हैं आन्दोलन की अग्नि में मधेशी जनता की आहुति देना और अल्टीमेटम की आड़ में अपनी स्वार्थ की पूर्ति करना । इस नीति में ये पूरी तरह से परिपक्व हैं । सत्ता नहीं छूटनी चाहिए, काठमान्डू नहीं छूटना चाहिए । लगे रहिए अपनी गलत राजनीति में, बेवकुफ जनता तो आपके साथ है ही मरने के लिए ।
काश जो धैर्य इन नेताओं में है उसी धैर्य की शिक्षा नेपाल के प्रहरियों को भी दी जाती तो, आज इतने घरों के दीए नहीं बुझते । पिछले मधेश आन्दोलन में बार बार यह बात सामने आई कि गोली कमर से उपर नहीं चलाई जानी चाहिए किन्तु आज एक बार फिर उसी की पुनरावृत्ति हुई है । निहत्थों पर इतनी बर्बरता से लाठी चार्ज और गोली चलाने के दृश्य सामने आ रहे हैं जो वहाँ की वस्तुगत सच्चाई बयान कर रहे हैं । भीड़ को तितरबितर नहीं किया जा रहा था बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे प्रहरी अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी निकाल रहे हैं । बूट और लाठी से निहत्थी जनता को घेर कर ऐसे मार रहे थे मानो वो इंसान नहीं भेड़ बकरी हो । उफ ! इतनी विभत्स मौत, कि स्वयं मौत की भी रुह काँप जाए किन्तु नहीं काँपती तो सत्ता और सत्तासीन की आत्मा । सरकार सीडीओ, प्रहरी सशस्त्र को निलम्बित नहीं करती बल्कि उनकी सुरक्षा के लिए उनका तबादला करती है । सड़क से लड़ने का दावा करने वाले संसद का मोह नहीं त्याग कर पा रहे इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता । मधेशियों को किसी भी प्रकार के बन्द का आह्वान जो मोर्चा की तरफ से आता है उसका बहिष्कार करना चाहिए तब तक जबतक उसका नेता उसके बीच नहीं पहुँच जाता । किस बात का इंतजार है इन्हें ? क्या इन सात दिनों में कोई अलादीन का जिन आने वाला है, जो सात दिनों के भीतर मधेश की कायापलट कर देगा ? 
मधेश का असंतोष सत्ता को पता था जिसकी वजह से एमाले ने सरकार को अल्टीमेटम दिया था और सुरक्षा की माँग की थी । उनकी सुरक्षा हेतु मधेश को छावनी में बदल दिया गया । ऐसा पहली दफा नहीं हुआ है जब मधेश की जनता को उकसाया गया हो । राष्ट्रपति का जनकपुर भ्रमण भी इसी शक्ति का प्रदर्शन था । उस वक्त एमाले ने सरकार में रहकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया और आज बाहर रहकर । क्या यह बात यह साबित नहीं करती कि ये तीनों दल एक ही हैं ? सरकार कहती है कि गोली चलाने का आदेश नहीं था । तो क्या यह माना जाय कि प्रशासन सरकार के हाथों में नहीं है ? अगर ऐसा है तो फिर सरकार किस बूते पर चुनाव कराने की सोच रही है ? बन्दुक और बल पर अगर सरकार की पकड़ नहीं तो अच्छा हो कि सैनिक शासन ही लागू कर दिया जाय ।  निर्वाचन में जनता चाहिए या प्रहरी ? जो तस्वीर सामने आ रही है उससे तो स्पष्ट जाहिर है कि निष्पक्ष चुनाव की कल्पना भी बेकार है । मधेश की जनता अपना मत दे चुकी इसे सरकार को समझना होगा । या फिर मधेश को उसके मत के अधिकार से भी वंचित करने की सोच तो नहीं है ? क्योंकि एमाले अध्यक्ष पहले ही जता चुके हैं कि मधेशी नेता के बिना भी निर्वाचन सम्भव है । लोकतंत्र का इतना भद्दा मजाक शायद कहीं ना मिले । जहाँ न तो मानव अधिकार है, न अभिव्यक्ति स्वतंत्रता है और न ही अपने अधिकार को माँगने का वातावरण ।
एक पक्ष यह कहने से नहीं चूकता कि मधेश सिर्फ मधेशियों का नहीं है वहाँ एमाले को जाने का हक है । बिल्कुल सच है यह । किन्तु जिस सद्भाव और राष्ट्रीयता के नारे के साथ अभियान चलाया जा रहा है अगर वही सम्भव होने की सम्भावना नहीं तो क्या उसे कुछ समय के लिए स्थगित नहीं कर देना चाहिए था ? अगर मधेश की जनता की भावनाओं का खयाल नहीं तो सद्भावना की उम्मीद किससे करते हैं । क्या सिर्फ एक वर्ग विशेष को साथ लेकर चलने की नीयत ही राष्ट्रीय सद्भावना है और उसी को लेकर सत्ता चलाने की सोच है ? तो उन्हें यह समझना होगा कि विश्व परिदृश्य बहुत तेजी से बदल रहा है । दमन और दवाब की राजनीति की उम्र बहुत लम्बी नहीं होती । लाशों की ढेर को सीढी मत बनाइए क्योंकि यह स्थाई तो कभी नहीं होगी । अपनी सदाशयता का परिचय दीजिए तो कभी भी रातों रात मधेश की गलियों से भागने की नौबत नहीं आएगी । इतना तो समझ आ गया होगा कि मौत से अब उन्हें डर नहीं । डर होता तो यह सैलाब नहीं आता, यह रोष प्रकट नहीं होता । देश जनता का है, जनता के लिए है चाहे वो जनता पहाड़ की हो, तराई की हो या फिर हिमाल की उन्हें स्वीकारना ही होगा, वर्ग विशेष को लेकर चलने वाली राजनीति अब स्वीकार्य नहीं हो सकती ।
 
 
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