लिम्बुवान ने आम हड़ताल की घोषणा, फिर बन्द की राजनीति

limbuanनेपाल की नियति : बन्द की राजनीति – श्वेता दीप्ति,
संघीय लिम्बुवान राज्य परिषद् ने २०७१ जेठ ४ गते ताप्लेजुंग जिला, २०७१ जेठ ७ गते मेची राजमार्ग यातायात बन्द और जेठ ११ गते नौ जिला मे लिम्बुवान ने आम हड़ताल की घोषणा की है । उनकी माँग है कि २०६४ फाल्गुन १८ गते को हुए समझौते के अनुसार अरुण सप्तकोशी पूर्व के नौ जिलों को लिम्बुवान स्वायत्र राज्य घोषित किया जाय । बन्द का तो ये सिर्फ एक उदाहरण है ।

माँग चाहे किसी की भी हो, कुछ भी हो, पर क्या बन्द ही अपनी बात मनवाने का अंतिम विकल्प है ? सरकार तक अपनी बात पहुँचाने का या मनवाने का यह तरीका फिलहाल नेपाल में हिट है । ये और बात है कि यह कारगर कितनी है, यह किसी को पता नहीं हाँ यह रास्ता सहज अवश्य लगता है । सही ही तो है ‘हर्रे लगे ना फिटकरी रंग चोखा हो जाय ।’ माँग चाहे जो भी हो, जैसी भी हो बस बन्द होना ही चाहिए । सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता मरती तो आम जनता है न । किन्तु नक्कार खाने में किसकी तूती सुनाई पड़ती है । बेचारी जनता उसकी परवाह भला किसे है आखिर ये बन्द भी तो उसके भविष्य के लिए ही हो रहा है । ये कौन जानता है कि आम जनता शांति और समाधान चाहती है पर बन्द के रास्ते पर चल कर तो कदापि नहीं । किन्तु यक्ष प्रश्न यह है कि जनता बेचारी अपनी बात कहाँ रखे । नेता सुनना नहीं चाहते, क्योंकि उनकी दलील होगी कि यह जनता के लिए ही है, सरकार से क्या उम्मीद की जाय वो तो संविधान के ‘स’ शब्द पर ही उलझी है, विधान तक तो आते–आते शायद जनता संविधान को भूल जाय । खैर, पूर्वानुमान है कि बन्द के मौसम की शुरुआत हो चुकी है, कौन सी हवा किधर से गुजरेगी वह वक्त बताएगा । क्या फर्क पड़ता है कि इसका असर बच्चों, बूढ़ों, असहाय, दिहाड़ी मजदूर या बीमारों पर क्या पड़ेगा । दुनिया जाय भाड़ में इन्हें क्या पड़ी ये तो बन्द करेंगे और तमाशा देखेंगे ।

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