लुम्बिनी मधेश का है, हम अखण्ड भाग्य चाहते हैं : कैलाश महतो

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कैलाश महतो, परासी, १६ दिसिम्बर | राष्ट्र एक भावना होता है जो किसी विशेष संस्कृति से, संस्कार से, भाषा से, विचार से, सभ्यता से, पहिचान से, परम्परा से, खानपान से, रीतिरिवाज से और समग्र में जीवनशैली से जुडा होता है । नेपाल राष्ट्र के परिधी में अगर मधेश होता तो नेपाली और मधेशी दोनों की परम्परा, रीतिरिवाज और संस्कृति आदि भी एक या एक सी होतीं । हमारा समस्या एक होता । उसका समाधान भी एक होता । भावना एक होती और विकास तथा अवसर के दरबाजे भी एक होते । न मधेश संघीय अधिकार का बात करता न आजाद मधेश का डंका बजता । नेपाली बनने के लिए लालयित रहे डा.सि.के स्वतन्त्र मधेश का पैगाम ही क्यूँ लाता ? इस विषय पर अब नेपालियों को नहीं, मधेशियों को विचार करना होगा ।

(मधेशवाणी में पूर्व राजदूत विजयकान्त कर्ण का अन्तरवार्ता पढने से यह लगने लगा है कि मधेश के बुद्धिजिवी अब नेपाली शासकों का नश्लिय पेटभक्ति को राष्ट्रभक्ति नहीं मान सकते । )
भारतीय संविधान ड्राफ्ट कमिटी के अध्यक्ष रहे डा.भिमराव अम्बेडेकर ने सन् १९५३ में भारतीय संसद में ही कहा था, “मुझे अनुमति मिले तो भारत के संविधान कोे मैं ही जला डालूँगा ।” डा.अम्बेडकर के ही नेतृत्व में निर्मित संविधान को उन्होंने ही जलाने की बात क्यूँ कही ? दुनियाँ के सबसे बडा और मोटा संविधान बनाने में सिर्फ ११ महीने और १८ दिन ही लगे थे जो भारत जैसे विशाल देश के सैकडों जाति एवं संस्कृतियों के भावनाओं को समेटने के लिए वो अवधि पर्याप्त नहीं था । मगर हुआ वही जो अम्बेडकर लगायत के देशभक्त राजनेता नहीं चाहते थे । क्यूँकि भारत का संविधान भारतीय नेताओं ने नहीं बना पाये । परिस्थिति कुछ ऐसी थी कि ईष्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा निर्मित इण्डियन गवर्नमेण्ट एक्ट १९३५ को ही ब्रिटीशों के हुकुमत से आजाद भारत का संविधान के रुप में देश को दान किया गया । और ताज्जूब की बात यह है कि सन् २०१३ में अंग्रेजी महारानी एलिजाबेथ की भारत की राजकीय भ्रमण बिना भिजा की हुई थी जो एक आजाद देश के लिए बहुत बडा सवाल खडा होता है । भारत के लोगों ने इसका विरोध भी किया था । लेकिन हुआ वही जो ब्रिटेन ने चाहा ।
सवाल यह उठता है कि १०,५२० कि.मी के समुद्री राह से भारत आये अंग्रेज आज भी भारत पर अपना शासन बरकरार के नजर से घनीभूत होकर ७,९७१.०३ कि.मी (४,९५२.९७ माइल) के हवाई रास्ते बिना भिजा भारत आने का औकात रखता है तो संविधान में मधेश का थोडे से चुक के कारण मधेश में नेपालियों को पैर रखने में जहाँ एक सेकेण्ड की भी दुरी नहीं हों, मधेश को उपनिवेशों का उपनिवेश बनाने में भला उन्हें कितने समय लगेंगे ? मधेशी दल और नेताओं का अपनी अडान और माँगे हैं । मगर मधेशी जनता को दल के अतिरिक्त भी स्वतन्त्र अस्तित्व के लिए तैयार रहना होगा ।
आजकल नेपाली नेता, बुद्धिजिवी और उसके सारे आयामों का एक ही लुभावनी भाषा है, “हिमाल, पहाड, तराई–कोही छैन पराई । पहिला हामी नेपाली, अनि मात्र मधेशी र पहाडी । हामी शदियौंदेखि मिलेर बसेका छौं । हामीबीच मेलमिलाप छ । हामी अखण्ड नेपाल चाहन्छौं । हामी अखण्ड लुम्बिनी चाहन्छौं । अखण्ड ५ नं. प्रदेश चाहन्छौं ।”
मीठे जहरों को पहचान ली है मधेश ने अब । मधेशी जनता अब यह कहती है, “हिमाल भी तेरा, पहाड भी तेरा–शदियों तुमने उल्ल बनाये, हटाओ अब अपनी परछाई । शदियों से मिलकर नहीं, लूटकर बैठे हो । हमारे बीच मेलमिलाप नहीं, हमारे खिलाफ रहे हो । तुम अखण्ड नेपाल में रहो, हम अखण्ड मधेश चाहते हैं । लुम्बिनी मधेश का है । हम अखण्ड भाग्य चाहते हैं । तुम अखण्ड ५ नं.प्रदेश नहीं, पैक्षेत्र (पैसों का क्षेत्र) चाहते हो । देखें इस क्षेत्र का आय ः
Madheshi Nagrik Samaj with Dinesh Gautam
प्रदेश न। ५ मा पहाडी जिल्ला यस कारण राख्न खोजेका छन् शासकहरु ः

– पहिलो कारण हो –प्रदेशमा खसहरुको बाहुल्यता कयम राख्न ।
– दोस्रो कारण – मधेशको ६ ( नवलपरासी देखि बर्दिया ) जिल्लाको आम्दानी ४२।६२ अर्ब र पहाड को ६ ( पाल्पा , अर्घाखाँची , गुल्मी ,रुकुम १र२ ,रोल्पा र प्यूठान ) जिल्लाको ०।४२ अर्ब यानी तल्लो आम्दानी माथी माथिल्लो भेगको खस समुदायको रजाइँ को लागि ।
– तेस्रो कारण – लुम्बिनी नेपालको मुख्य पर्यटक गन्तव्यको रूपमा रहेको छ । सन् २०१५ मा कुल ७ लाख ४८ हजार २ सय ९४ जनाले त्यहाँ भ्रमण गरेका थिए । एक दिनमा एउटा बिदेशी पर्यटकले average मा ४ ठण् खर्च गर्छ र प्रत्येक पर्यटकले average मा ३ दिन रहने गरेको छ । यसमाथि जुन खस शासकहरुको रजाइँ छ त्यसको निरन्तरता को लागि ।
यी र यस्ता दर्जनौं भित्री रहस्यहरुका कारण ५ न। प्रदेशमा पहाडी जिल्लाहरु राख्न खोजिएको छ ।

नेपालियों के दाबे को मान लिया जाय तो ५ नं. प्रदेश में १५–२० साल के भितर किसी मधेशी को पान का भी दुकान खोलने नहीं दिया जायेगा । उनका दाबा है कि मधेश में वे आ चुके हैं और उनके रिश्तों का सम्बन्ध पहाडों में कायम है और दोहन का सम्बन्ध मधेश में । वे दोनों को कायम रखना चाहते हैं । मगर मधेशी हाथ और लात दोनों को छोडकर या तो थारु और सन्थाल मधेशियों के तरह पलायन हो जायें या उनके दास हो जायें ।
उनके दाबों को ही अगर मान लें तो रोजीरोटी के लिए बाहर से कतार गये हुए लोग कतार में मूल कतारियनों से ज्यादा हैं । अमेरिका में मूल अमेरिकनों से ज्यादा बाहरी लोग हैं तो क्या वहाँ बाहर के लोग दाबा कर सकते हैं कि वह देश उनका हो गया ? डोनाल्ड ट्रम्प घोषणा कर चुके हंै कि दोहरी नागरिकता अमेरिका में अब नहीं चलेगी । तो क्या रोजी रोटी के लिए मधेश में आये नेपालियों का यह दाबा जायज है कि पहाड भी उसका, मधेश भी उसका और मधेश का कमाई और विकास भी उसीका हो ? मधेशी कहाँ जायेंगे ? क्या करेंगे ?
पदेश नं. ५ के मधेशी जिलों की सरकारी कार्यालयों के अधिकारियों की पोस्टिंग पर नजर डालें ः
हाकिमों की पोस्टिङ्ग
मुख्य कार्यालय
जिला प्रशासन कार्यालय
नवलपरासी                                रुपन्देही                                              कपिलवस्तु
नेपाली ४३ मधेशी १             नेपाली ४२ मधेशी २                                नेपाली ४३ मधेशी ५
जिला प्रहरी कार्यालय
नेपाली ४७ मधेशी २      नेपाली ४२ मधेशी १                                   नेपाली ५७ मधेशी ४
जि.वि.स कार्यालय
नेपाली २७ मधेशी २                   नेपाली २८ मधेशी २                       नेपाली ४१ मधेशी ३
शिक्षा कार्यालय
नेपाली ३३ मधेशी ३              नेपाली ४२ मधेशी २                      नेपाली ५७ मधेशी ८
जिला अदालत
उपलब्ध नभएको                 नेपली ७६ मधेशी १                        नेपाली ५३ मधेशी २
जिला वनकार्यालय
नेपाली २० मधेशी ४ उ               पलब्ध नभएको                    उपलब्ध नभएको
(उपलब्ध विवरण अनुसार)
क्या यही है मिलकर रहने का आधार और प्रमाण ?

भगवान् बुद्ध तो इनके वंश के हैं नहीं । मगर उन्हें भी वे कब्जा कर चुके हैं । वह कब्जा भी कोई श्रद्धा के कारण नहीं, पैसों के कारण है । कल्ह ही अन्तर्राष्ट्रिय समुदाय बुद्ध के नाम पर पैसे देना छोड दें तो वे बुद्ध को भी भूल जायेंगे । वे बुद्ध को मानते हैं नहीं, पैसों का श्रोत मानते हैं । क्या हम भी अपने बुद्ध को, अपने कृष्ण को, अपने राम को, अपने महादेव को भूल सकते हैं ?
देउवा, ओली, प्रचण्ड, रावल, सिटौला, चन्द्र, रायमाझी, विष्णु पौडेल आदि अगर मधेशी को भी नेपाली मानते तो सारे मधेश को दिल से नेपाल मानकर बिना कोई शंका मधेशी, आदिवासी, जनजाति, दलितों को उनके तत् तत् उपस्थिति के तत् तत् प्रदेश दे देते ये मानकर कि वे भी नेपाली हैं । हम उनके साथ रहे हैं, मत लिए हैं । हम तो नेता सदा बहार ही रहेंगे । वैसे भी मधेशी इतने धोखा खाने के बावजुद उन्हें ही मत देते रहे हैं । मधेशियों की बात भी वे अच्छे से सुन दें । क्यूँकि मधेशी तो उन्हें अपना नेता मानते ही आ रहे हैं न †

वे मधेशियों के प्रति इमानदार न हैं, न हो सकते ।

अब तो क्यालिफोर्निया भी अमेरिका से भद्र ढंग से अलग होने की प्रकिया आगे बढा चुका है । अमेरिका के महान्यायाधिवक्ता के कार्यालय में जनमत संग्रह के लिए आवेदन दाखिल भी कर चुका है जहाँ अमेरिका से अलग होने के लिए ५,८५,४०७ मत की आवश्यकता होगी । वहाँ की कूल जनसंख्या ४ करोड है ।

मधेश गंभीर हों और ठोस निर्णय के लिए संगठित हों, आगे बढें ।

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