” ले लो शरण, हम तेरी शरण में ” ..

” ले लो शरण, हम तेरी शरण में ” ..
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भटकत जग,
भटकावत मन रे,
सूझे ना कुछ,
बूझे ना रे।
कौन दिखाए,
राह तेरे बिन,
गुण-अवगुण,
समझाए रे।
सुख खोजत अरु,
दुःख भोगत हम,
कुछ न समझ में,
आवत रे।
हे सद्गुरु !बिन तेरी कृपा अब,
मन आकुल- व्याकुल,
आहत रे।
अब न रहा जाए, हे सद्गुरू !
अब न सहा जाए रे,
ले लो शरण, हम तेरी शरण में,
कुछ न कहा जाए रे।
★★ बुद्ध- पूर्णिमा ( गुरु-पूर्णिमा ) गुरु को समर्पित, कुछ पंक्तियाँ ★★
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° गंगेश मिश्र

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